Kashmir: बिन पैंदे के लोटे तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन नहीं आ रहे बाज, UN में फिर उठाया कश्मीर का मुद्दा, भारत-पाकिस्तान पर जमकर बोले

Turkey on Kashmir Issue: एर्दोआन ने शुक्रवार को उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी, जिसके बाद उन्होंने यह टिप्पणी की है।

Shilpa Written By: Shilpa
Updated on: September 21, 2022 14:07 IST
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Highlights

  • कश्मीर के मुद्दे पर बोले तुर्की के राष्ट्रपति
  • पाकिस्तान का करीबी देश है तुर्की
  • पहले भी भारत ने टिप्पणियों को किया अस्वीकार

Turkey on Kashmir Issue: आजकल बिन पैंदे का लोटा बने तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने अपनी हरकतों से बाज न आते हुए एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया है। वह मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान एक बार फिर कश्मीर पर बोले। पाकिस्तान के करीबी एर्दोआन ने महासभा परिचर्चा के दौरान कहा, ‘भारत और पाकिस्तान 75 साल पहले अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता स्थापित करने के बाद भी अब तक एक-दूसरे के बीच शांति और एकजुटता कायम नहीं कर पाए हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। हम कश्मीर में स्थायी शांति और समृद्धि कायम होने की आशा और कामना करते हैं।’

एर्दोआन ने शुक्रवार को उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी, जिसके बाद उन्होंने यह टिप्पणी की है। समरकंद में हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा करते हुए विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को प्रगाढ़ बनाने के तरीकों पर चर्चा की थी। हाल के वर्षों में, एर्दोआन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय सत्रों में संबोधन के दौरान कश्मीर मुद्दे का उल्लेख किया है, जिससे भारत और तुर्की के बीच संबंधों में तनाव पैदा हुआ है।

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भारत अस्वीकार कर चुका है टिप्पणी

भारत अतीत में उनकी टिप्पणी को “पूरी तरह से अस्वीकार्य” करार दे चुका है। भारत कहता रहा है कि तुर्की को अन्य देशों की संप्रभुता का सम्मान करना सीखना चाहिए और इसे अपनी नीतियों में अधिक गहराई से प्रतिबिंबित करना चाहिए। कश्मीर मुद्दे को लेकर तो बात हो गई। अब आप ये सोच रहे होंगे कि भला हमने एर्दोआन को बिन पैंदे का लोटा क्यों कहा है। तो इसके पीछे की वजह तुर्की के रुख में हाल में आया बदलाव आया है। रूस और यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में तुर्की यूक्रेन का समर्थन कर रहा था। वह पूरी तरह रूस के खिलाफ था। लेकिन अब अगर देखा जाए, तो वह रूस की तरफ झुक रहा है। वह रूस की तारीफ कर रहा है। साथ ही अमेरिका और यूरोपीय संघ पर रूस पर दवाब की नीति का पालन करने का आरोप लगा रहा है। 

डबल स्ट्रैटेजी अपना रहा तुर्की

आप ये कह सकते हैं कि तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयाब एर्दोआन डबल स्ट्रैटेजी अपना रहे हैं। तुर्की एक तरह से दोतरफा खेल खेल रहा है। इस खेल को देख ऐसा लगता है कि मानो तुर्की की पांचों उंगलियां घी में और सिर कढ़ाई में हो। अब इस पूरी कहानी पर शुरुआत से बात कर लेते हैं। रूस और यूक्रेन के बीच 24 फरवरी के दिन युद्ध शुरू हुआ। रूस ने कहा कि वह केवल विशेष सैन्य अभियान चला रहा है। इस वक्त तुर्की ने रूस का विरोध किया था। वह पश्चिमी देशों का सहयोगी भी था और साथ ही उसने क्रीमिया और डोनबास में यूक्रेन के दावे का समर्थन किया है। इन दोनों ही क्षेत्रों पर रूस समर्थित अलगाववादियों का कब्जा है, जिसे यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदिमीर जेलेंस्की ने आजाद कराने की बात कही है। इन सबके बीच तुर्की अब बदले रुख में दिखाई दे रहा है, वो रूस के करीब जाता नजर आ रहा है। तो इसके पीछे के क्या कारण हो सकते हैं?

एर्दोआन को दो चीजों से प्यार

रजब तैयब एर्दोआन को दो चीजों से प्यार है, पहली ताकत और दूसरा पैसा। लेकिन वो इस वक्त कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तुर्की की मुद्रा लीरा की कीमत बीते 12 महीनों में गिरकर आधी रह गई है और देश में महंगाई दर 80 फीसदी से अधिक हो गई है। विपक्षी पार्टियां चुनाव में अकेले उतरने के बजाय गठबंधन बना रही हैं और देश की आर्थिक स्थिति को प्रमुख मुद्दा बना रही हैं। इससे दो दशक से सत्ता में बने हुए एर्दोआन के लिए आगे भी सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है। इस मुसीबत से बचने के लिए उन्हें देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करना है। इसके लिए उन्हें बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद और विदेशी निवेश चाहिए।

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