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आखिर क्यों सभी देश नहीं रख सकते हैं परमाणु बम, ईरान की कोशिश पर अमेरिका और इजरायल ने कैसे फेरा पानी?

 Published : Jun 16, 2025 06:39 pm IST,  Updated : Jun 16, 2025 06:39 pm IST

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका क्यों लगातार उसके विरोध में है। अमेरिका क्यों चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाए, आखिर क्यों सभी देश नहीं रख सकते हैं परमाणु बम, ईरान की कोशिश पर अमेरिका और इजरायल ने कैसे फेरा पानी?...आइये सबकुछ आपको बताते हैं।

प्रतीकात्मक फोटो। - India TV Hindi
प्रतीकात्मक फोटो। Image Source : AP

Nuclear Weapons: हाल ही में इजरायल ने ईरान के आर्म्ड बेस और उसके परमाणु ठिकानों पर अब तक का सबसे भयंकर हमला किया है, जिसे उसने ऑपरेशन 'राइजिंग लॉयन' का नाम दिया। इजरायली सेना ने दावा किया कि इस हमले में उसने ईरान के परमाणु ठिकानों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। साथ ही ईरान के कई परमाणु वैज्ञानिकों को भी मार गिराया गया है। इजरायल ने ईरान पर यह हमला तब किया, जब अमेरिका बार-बार ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने की चेतावनी दे रहा था।

दुनिया के कितने देशों के पास हैं परमाणु बम?

अब  ईरान ने इस हमले के जवाब में इजरायल और अमेरिका को "गंभीर परिणाम" भुगतने की धमकी दी है। आपको बता दें, ये दोनों देश दुनिया के उन 9 मुल्कों में शामिल हैं, जो परमाणु शक्ति से संपन्न हैं।  

साथ ही इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है: आखिर दुनिया में केवल 9 देशों के पास ही परमाणु हथियार क्यों हैं? ये देश कौन-कौन से हैं? बाकी देश इस ताकत को क्यों नहीं हासिल कर पाते? और अगर कोई देश परमाणु बम बनाना चाहे, तो उसे क्या करना पड़ता है? आइए, इन सभी बातों को सरल और रोचक अंदाज में समझते हैं।

 
परमाणु शक्ति के 9 सुपरहीरो


 दुनिया में सिर्फ 9 देश ही ऐसे हैं, जो परमाणु हथियारों की ताकत से लैस हैं... और ये हैं: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, भारत, पाकिस्तान, इजरायल और उत्तर कोरिया। इनके पास कुल मिलाकर लगभग 12,121 परमाणु हथियार हैं। और मजेदार बात? इनमें से 90% सिर्फ अमेरिका और रूस के पास हैं! लेकिन बाकी देश इस सुपरपावर क्लब में क्यों नहीं शामिल हो पाए? आइए, इसके राज़ से भी पर्दा उठाते हैं। 
 

परमाणु बम बनाना कोई बच्चों का खेल नहीं

परमाणु बम बनाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह एक ऐसा साइंस है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन, परमाणु विखंडन और संलयन जैसे भारी-भरकम वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। जिसके लिए चाहिए ढेर सारा पैसा, हाई-टेक लैब्स, और सुपर-स्मार्ट वैज्ञानिक। कई देशों के पास तो इसकी शुरुआत करने का भी दम नहीं है। लेकिन कुछ देश, जैसे जापान और जर्मनी, इतने सक्षम हैं कि वे चाहें तो परमाणु बम बना सकते हैं। फिर भी, वे ऐसा क्यों नहीं करते? इसका जवाब है एक समझौता, जिसे कहते हैं न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफेरेशन ट्रीटी (NPT)।


 NPT: परमाणु हथियारों का गेटकीपर

1968 में दुनिया ने एक बड़ा कदम उठाया और NPT नामक संधि बनाई, जो 1970 में लागू हुई। इसका मकसद था परमाणु हथियारों को और फैलने से रोकना। इस संधि पर 190 देशों ने हस्ताक्षर किए। नियम था कि सिर्फ पांच देश—अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—परमाणु हथियार रख सकते हैं, क्योंकि इन्होंने पहले ही ये हथियार विकसित लिए थे। लेकिन फिर भारत, पाकिस्तान, इजरायल और उत्तर कोरिया ने परमाणु हथियार कैसे बना लिए? दरअसल, ये चार देश या तो इस संधि का हिस्सा नहीं बने या फिर परमाणु परीक्षण करके इससे बाहर हो गए।  

 
परमाणु बम बनाने की इजाजत कौन देता है?

सच कहें तो परमाणु बम बनाने के लिए किसी की "परमिशन" नहीं लेनी पड़ती। लेकिन हां, NPT का नियम तोड़ने की कीमत जरूर चुकानी पड़ती है। अगर कोई देश इस संधि को तोड़कर परमाणु हथियार बनाता है, तो उसे दुनिया भर से प्रतिबंध, आर्थिक पाबंदियां, और यहाँ तक कि सैन्य हमले झेलने पड़ सकते हैं। ईरान इसका ताजा उदाहरण है।
 
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) हर देश के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखती है। यह सुनिश्चित करती है कि परमाणु तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ बिजली बनाने जैसे शांतिपूर्ण कामों के लिए हो, न कि बम बनाने के लिए। अगर कोई देश बम बनाने की कोशिश करता है, तो IAEA और संयुक्त राष्ट्र उसकी तगड़ा एक्शन लेते हैं।  

 
मिडिल ईस्ट का भविष्य क्या है?

इजरायल का ईरान पर हमला इस बात का सबूत है कि परमाणु हथियारों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई। ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उस पर हमले ने मिडिल ईस्ट को बारूद के ढेर पर ला कर खड़ा कर दिया है। बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया कभी इस परमाणु खतरे से आजाद हो पाएगी? या फिर सुपरपावर का खेल यूं ही चलता रहेगा?
 
जब तक दुनिया के सभी देश NPT का पालन करते हैं और तकनीकी व आर्थिक चुनौतियां बरकरार रहती हैं, तब तक परमाणु हथियारों का दायरा सीमित रहेगा। लेकिन इजरायल-ईरान जैसे तनाव हमें एहसास दिलाते हैं कि यह परमाणु ताकत कितनी विनाशकारी हो सकती है।  मगर क्या दुनिया इस खतरे से बच पाएगी? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

 

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