पाकिस्तान के शहर कराची में इन दिनों "निर्भया'' छाईं हुई हैं। ये वही निर्भाया है जिसकी 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में इज़्ज़त लूटी गई थी और जिसने बाद में इलाज को दौरान दम तोड़ दिया था। निर्भया भले ही ही आज इस दुनियां में नहीं है लेकिन उसने लाखों-करोड़ों निर्भया को जन्म दे दिया वो भी भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी।
पाकिस्तानी न्यूज़ साइट डॉन के अनुसार दरअसल सरहद पार निर्भया की गूंज के पीछे है मेहनत है भारतीय आर्टिस्ट शिलो शिव सुलेमान और पाकिस्तान की कुछ महिला एक्टिविस्ट की। शिलो को सेक्शुअल राइट ऐक्टिविस्ट और पेशे से वकील निदा मुश्ताक़ ने कराची बुलाया था। निदा निर्भया कांड के बाद शिलो के पोस्टर कैम्पेन से इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने अपने देश में ये मुहिम शुरु करने की ठान ली और इसमे उन्होंने मदद ली शीलो की।
शिलो को वीज़ा मिलने में हालंकि 11 महीने लग गये लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से वह निदा और पाकिस्तानी फ़िल्ममेकर हया फ़ातिमा के साथ लाहोर, रावलपिंडी और कराची में ये पोस्टर के ज़रिये ''दबंगों'' को संदेश दे रही हैं कि वे (महिलाएं) भी दबंग हैं।
बुधवार को उन्होंने इन तीनों शहरों में वर्कशॉप की और पोस्टरों की नुमाइश लगाई।
ऐसे शुरु हुआ Fearless Collective

बैंगलुरु की रहने वाली शिलो ने बताया: "इसकी शुरुआत मैंने 2012 के निर्भया कांड के बाद की थी। उस समय मैं एक शादी के लिये दिल्ली में ही थीI इस कांड के ख़िलाफ़ जनसमुह देखकर मैं दंग रह गई। "
शिलो का कहना है कि विरोध की वजह से जहां महिलाओं में हिम्मत बंधी वही ख़ौफ़ पी पैदा हो गया। "लोग कहने लगे कि बस में मत जाओ, तुम्हारा बलात्कार हो सकता है, या कि 'ज़ोर से मत बोलो, तुम्हारा बलात्कार हो सकता है, और तब मुझे लगा कि विरोध का तो उल्टा ही असर हो रहा है। सो मैंने इंटरनेट पर एक पोस्टर लगाया जिस पर लिखा था ‘मैंने ये कभी नहीं चाहा।’
"मेरी तरह सोचने वाले लोगों से मैंने उनका आर्टवर्क भेजने को कहा और एक हफ़्ते के अंदर ही 400 से ज़्यादा पोस्टर आ गए।"
"पोस्टर में कितनी दम होती है ये हमें तब पता चला जब हमने इन्हें सड़कों पर लगाया और लोगों से बात की।"

शिलो ने बताया कि उन्होंने पहली बार बनारस में दीवार पर पेंटिंग बनाई थी जिसमें देवियों को दर्शाया गया था। हमें हमेशा अपनी दीवारों पर देवियों की पूजने को कहा जाता है लेकिन घर के अंदर हम महिलाओं का बलात्कार करते हैं। हमारा संदेश साफ था ‘नहीं, आपको मेरे साथ भी देवी की तरह बर्ताव करना पड़ेगा।’
तीन साल के बाद ये एक छोटी सी कोशिश एक बड़ा प्लेटफ़ार्म बन गाया। ''हम आर्ट थैरेपी और थिएटर का आयोजन करते हैं और अपने अनुभव बांटते हैं।"
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