इस्लामाबाद: पाकिस्तान की मुस्लिम महिलाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार मुस्लिम महिलाओं का "खुला" आगे भी कायम रहेगा। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक मील का पत्थर साबित होने वाले फैसले में महिलाओं के 'खुला' के माध्यम से वैवाहिक संबंध समाप्त करने के अधिकार को मजबूती से बरकरार रखा। इससे मुस्लिम महिलाओं में जश्न का माहौल है।
मुस्लिम महिलाओं का "खुला" क्या अहमियत रखता है?
'खुला' इस्लामी शरिया की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो महिलाओं को पति की सहमति के बिना विवाह विच्छेद का अधिकार देती है, जबकि 'तलाक' पुरुषों का विशेषाधिकार है। अदालत ने मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार को तलाक का वैध आधार मानते हुए इस्लामी कानून की व्याख्या में क्रांतिकारी बदलाव किया है। यह फैसला दो महिला न्यायाधीशों वाली बेंच ने सुनाया, जिसमें न्यायमूर्ति आयशा ए. मलिक ने मुख्य निर्णय लिखा। अदालत की वेबसाइट पर अपलोड इस ऐतिहासिक फैसले की सुनवाई एक महिला की याचिका पर हुई, जिसने पेशावर उच्च न्यायालय (पीएचसी) द्वारा उसके 'खुला' दावे को खारिज करने के आदेश को चुनौती दी थी। पीएचसी ने पति की सहमति अनिवार्य बताते हुए और सुलह प्रयासों की कमी का हवाला देकर याचिका खारिज कर दी थी। न्यायमूर्ति मलिक और न्यायमूर्ति नईम अफगान की दो सदस्यीय पीठ ने पीएचसी के फैसले को पूरी तरह गलत ठहराते हुए पारिवारिक न्यायालय के मूल आदेश को बहाल कर दिया।
"खुला" पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट
अदालत की पीठ ने स्पष्ट किया कि 'खुला' पत्नी का स्वैच्छिक और मौलिक अधिकार है, जिसे पति की सहमति या अदालती विवेक पर निर्भर नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति मलिक ने फैसले में लिखा, "पारिवारिक अदालत का उद्देश्य किसी महिला को बंधन में रखना नहीं है, जहां सौहार्द का कोई स्थान न हो। क्रूरता हमेशा शारीरिक हिंसा के रूप में प्रकट नहीं होती; अपमान, उपेक्षा, धमकियां और भावनात्मक दुर्व्यवहार भी उतने ही घातक हैं। "यह फैसला पाकिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा कदम है, जहां पारंपरिक व्याख्याओं के कारण तलाक के मामले लंबे समय तक अटक जाते हैं।
महिलाओं का होता था "खुला" उत्पीड़न
विशेषज्ञों का कहना है कि मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार को इस्लामी कानून के तहत वैध आधार मानना घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता बढ़ाएगा। पाकिस्तान में हर साल हजारों महिलाएं वैवाहिक उत्पीड़न का शिकार होती हैं, लेकिन कानूनी बाधाओं के कारण न्याय मिलना मुश्किल होता है। 2016 के 'खुला' सुधारों के बाद भी कई अदालतें पति की सहमति पर जोर देती रहीं, लेकिन यह फैसला उन सभी को रद्द कर देता है। महिला अधिकार संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है।
ऑल पाकिस्तान विमेंस एसोसिएशन (एपीडब्ल्यूए) की अध्यक्ष ने कहा, "यह महिलाओं को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है।" हालांकि, कुछ धार्मिक समूहों ने इसकी आलोचना की, दावा किया कि यह शरिया की मूल भावना के विरुद्ध है। आने वाले समय में ऐसे मामलों में तेजी से न्याय मिलने की उम्मीद है, जो लिंग समानता की दिशा में मजबूत कदम साबित होगा। (एपी)
यह भी पढ़ें
पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान की बहन की चुनौतियां और बढ़ीं, कोर्ट ने दिया ये बड़ा आदेश
तुर्की तट के करीब एजियन सागर में बड़ा हादसा, प्रवासियों की नौका डूबने से 18 लोगों की मौत