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ईरान परमाणु समझौते से अलग हुए ट्रंप, अलोचनाओं का दौर शुरू

Edited by: India TV News Desk Published : May 09, 2018 10:56 am IST, Updated : May 09, 2018 10:56 am IST

ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद ब्रिटेन , फ्रांस , जर्मनी , यूरोपीय संघ और कनाडा सहित उसके कई शीर्ष सहयोगियों ने खेद व्यक्त करते हुए चिंता जाहिर की है।

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वाशिंगटन: ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद ब्रिटेन , फ्रांस , जर्मनी , यूरोपीय संघ और कनाडा सहित उसके कई शीर्ष सहयोगियों ने खेद व्यक्त करते हुए चिंता जाहिर की है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा मे , फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों और जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कल कहा , ‘‘ हम फ्रांस , जर्मनी और ब्रिटेन के नेता ‘ जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन ’ से अमेरिका के हटने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्णय पर खेद एवं चिंता व्यक्त करते हैं। ’’ ट्रंप के ईरान परमाणु समझौते से अलग होने के निर्णय की घोषणा के कुछ देर बाद ही एक बयान में नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि वह ‘ जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन ’ (जेपीओए) को लेकर प्रतिबद्ध रहेंगे। तीनों नेताओं ने कहा , ‘‘ यह समझौता हमारी सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विवाद के संबंध में यह प्रस्ताव अब भी अंतरराष्ट्रीय कानूनी बाध्यता है। हम सभी पक्षों से इसके पूर्ण क्रियान्वयन और जिम्मेदारी के भाव से कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध रहने की गुहार करते हैं। ’’ (ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा की )

यूरोपीय संघ ने भी समझौते को लेकर प्रतिबद्ध रहने की बात कही है। ईयू की कूटनीतिक प्रमुख फेडेरिका मोगरिनी ने कहा कि अमेरिका के पीछे हटने के बावजूद भी संघ ईरान समझौते को बनाए रखने को लेकर प्रतिबद्ध है। यूरोपीय संघ के अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क ने ट्वीट किया है, ‘‘यूरोपीय संघ डोनाल्ड ट्रंप की ईरान समझौते को लेकर नीति और व्यापार पर एकमत होकर फैसला करेगा। ईयू के नेता सोफिया में अगले सप्ताह होने वाले शिखर सम्मेलन में दोनों मुद्दों पर फैसला करेंगे।’’पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय के इस समझौते की ट्रंप पहले भी कई बार आलोचना कर चुके थे। इससे हटने की घोषणा के बाद ओबामा ने इसे एक गलती करार दिया है। ओबामा ने कल एक बयान में कहा , ‘‘ ईरान की ओर से बिना किसी गंभीर गलती के जेसीपीओए से हटना एक भूल है। ’’

पूर्व उप राष्ट्रपति जो बाइडन ने भी इस पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इससे अमेरिका अलग-थलग पड़ सकता है। उन्होंने कल एक बयान में कहा कि आज की यह घोषणा अमेरिका को हर प्रमुख विश्व शक्ति से अलग कर सकती है। यह हमारी विश्वसनीयता और वैश्विक नेतृत्व को कमजोर कर देगा। इससे ईरान को पश्चिम एशिया में उसकी विध्वंसक गतिविधियां रोके बिना ही विश्वस्तर पर सहानुभूति मिल सकती है। रूस के विदेश मंत्री ने भी अमेरिका के फैसले की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि मॉस्को ट्रंप के इस फैसले से बहुत निराश है और यह स्पष्ट तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। कल जारी एक बयान में रूस ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का परमाणु समझौते से अलग होने का एकतरफा फैसला बेहद निराशाजनक है।

सीरिया ने भी इसकी कड़ी निंदा की और कहा कि उसका सहयोगी इससे उबर जाएगा। सीरिया ने इसे अमेरिका का ‘‘आक्रमकता’’ करार दिया। समाचार एजेंसी ‘सना’ ने सीरियाई विदेश मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से कहा, दमिश्क ‘‘अमेरिका के ईरान परमाणु समझौते से पीछे हटने के फैसले की कड़ी निंदा करता है। यह एकबार फिर दिखाता है कि अमेरिका अपनी प्रतिबद्धता तथा अंतरराष्ट्रीय समझौते का सम्मान नहीं कर रहा।’’ दूसरी ओर , इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू ने इस कदम की सराहना करते हुए इसे ट्रंप का एक ‘साहसिक’ कदम बताया। इस्राइल हमेशा से ईरान परमाणु समझौते की अलोचना करता रहा है। ट्रंप ने कल ईरान परमाणु समझौते से अलग होने की घोषणा करते हुए कहा , ‘‘मेरे लिए यह स्पष्ट है कि हम ईरान के परमाणु बम को नहीं रोक सकते। ईरान समझौता मूल रूप से दोषपूर्ण है। इसलिए, मैं आज ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के हटने की घोषणा करता रहा हूं। ’’

इसके कुछ क्षण बाद ही उन्होंने ईरान के खिलाफ ताजा प्रतिबंधों वाले दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किये और देशों को ईरान के विवादित परमाणु हथियार कार्यक्रम पर उसके साथ सहयोग करने के खिलाफ चेताया। अपने चुनाव प्रचार के समय से ही ट्रंप ने ओबामा प्रशासन में हुए ईरान परमाणु समझौते की कई बार आलोचना की थी। जुलाई 2 015 में ईरान और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों एवं जर्मनी तथा यूरोपीय संघ के बीच वियना में ईरान परमाणु समझौता हुआ था। ट्रंप के फैसले का दुनियाभर में प्रभाव होगा। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और पश्चिमी एशिया में तनाव बढे़गा।

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