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बेटी मायके लौटे तो शर्म की बात नहीं! दिल्ली हाई कोर्ट बोला- शादी बचाने के चक्कर में उसे मत तड़पाओ, समय रहते साथ दो

 Written By: Khushbu Rawal
 Published : Nov 04, 2026 11:14 pm IST,  Updated : Nov 04, 2026 11:14 pm IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर कोई बेटी अपनी शादी में हिंसा या प्रताड़ना की शिकायत करती है, तो माता-पिता को तुरंत साथ देना चाहिए। शादी बचाने के चक्कर में उसे समझौता करने की सलाह देकर उसकी परेशानियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

प्रतीकात्मक तस्वीर- India TV Hindi
प्रतीकात्मक तस्वीर Image Source : PEXELS

दिल्ली हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में क्रूरता के आरोप लगाकर पति के रिश्तेदारों को भी मामले में फंसाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए बुधवार को कहा कि जब कोई महिला अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा की शिकायत करे तो उसके परिवार को समय रहते उसका साथ देना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि परिवार को विवाहित बेटी को ''समझौता करने'' की सलाह देकर उसकी परेशानियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और बेटी के मायके लौटने को माता-पिता के लिए कभी भी ''शर्म'' की बात नहीं माना जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने कहा कि क्रूरता का सामना करने वाली महिला को कानून के तहत प्रभावी संरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पति के रिश्तेदारों को केवल उससे संबंध होने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना न करना पड़े। 

8 साल पुराने सुसाइड केस में सुनवाई

जस्टिस मधु जैन ने 2018 में एयर होस्टेस अनीसिया बत्रा के सुसाइड केस में उसके पति मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से मुक्त करते हुए ये टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने मयंक के माता-पिता को क्रूरता और दहेज हत्या के आरोपों से मुक्त करने के अधीनस्थ कोर्ट के फैसले को भी बरकरार रखा।

जर्मनी की एक विमानन कंपनी में काम करने वाली अनीसिया (39) ने 13 जुलाई, 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी। उसके माता-पिता ने आरोप लगाया था कि उसका पति उसके साथ मारपीट करता था। मयंक अनीसिया को पास के एक अस्पताल ले गया था, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ''यह अदालत इस बात पर भी जोर देना चाहती है कि जब कोई बेटी अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा या लगातार दुर्व्यवहार की बात करे तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मायके वाले समय रहते उसका साथ दें। उसकी परेशानियों को समझौता करने की सलाह देकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समाज की अस्वीकृति के डर से उसे सुरक्षित घर देने में भी हिचकिचाना नहीं चाहिए। बेटी के माता-पिता के पास लौटने को कभी उनके लिए शर्म की बात नहीं माना जाना चाहिए। शादी बचाने को उसकी सुरक्षा एवं गरिमा से अधिक महत्व नहीं दिया जा सकता और उसका साथ देने के लिए किसी ऐसी त्रासदी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जिसकी भरपाई न हो सके।''

पति के परिवार को भी बिना ठोस वजह न फंसाएं- हाई कोर्ट

कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में क्रूरता के सामान्य आरोप लगाकर पति के रिश्तेदारों को भी मामले में फंसाने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। जस्टिस मधु जैन ने कहा, ''आपराधिक मुकदमे के परिणाम अदालत की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहते। इससे व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आजीविका और पारिवारिक जीवन भी प्रभावित होता है इसलिए कानून को क्रूरता झेलने वाली महिला को प्रभावी संरक्षण देना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पति के रिश्तेदारों को केवल उससे संबंध होने के कारण आपराधिक मुकदमे का सामना न करना पड़े और पति को भी बिना किसी ठोस कारण के दंडित न किया जाए।''

कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक कलह, उत्पीड़न या तनावपूर्ण संबंध अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बन सकते, जब तक कि इसमें किसी व्यक्ति की सक्रिय और जानबूझकर की गई भूमिका न हो। उसने कहा कि यदि महिला सुसाइड करने से पहले कोई मैसेज छोड़कर अपने इस कदम के लिए किसी अन्य व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराती है, तो भी केवल इसी आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं होता। कोर्ट ने दिसंबर 2019 के सेशन कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली तीन पुनरीक्षण याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया।

(इनपुट- PTI)

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