Friday, December 12, 2025
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Jatadhara Review: पौराणिक रहस्य और आधुनिक तर्क के बीच उलझी थ्रिलर देती है अनदेखा अनुभव, जानें क्यों देखें ये फिल्म

सोनाक्षी सिन्हा और सुधीर बाबू स्टारर फिल्म 'जटाधरा' को लेकर लोगों के बीच काफी उत्सुकता देखने को मिली। पौराणिक रहस्य और आधुनिक तर्क के बीच फिल्म की कहानी पिरोई गई है। फिल्म की कहानी कैसी है जानें।

जया द्विवेदी
Published : Nov 06, 2025 02:20 pm IST, Updated : Nov 06, 2025 03:29 pm IST
Sonakshi sinha- India TV Hindi
Photo: PRESS KIT सोनाक्षी सिन्हा।
  • फिल्म रिव्यू: जटाधारा
  • स्टार रेटिंग: 3.5 / 5
  • पर्दे पर: 07/11/2025
  • डायरेक्टर: वेंकट कल्याण और अभिषेक जायसवाल
  • शैली: माइथोलॉजिकल थ्रिलर

जी स्टूडियोज और प्रेरणा अरोड़ा द्वारा निर्मित 'जटाधारा' एक ऐसी फिल्म है जो पौराणिक कथाओं, अलौकिक शक्तियों और आधुनिक तर्कवाद को एक साथ पिरोने की कोशिश करती है। निर्देशक वेंकट कल्याण और अभिषेक जायसवाल ने एक साहसिक प्रयोग किया है। विज्ञान और अध्यात्म के बीच टकराव को सिनेमाई रूप में पेश करने का। हालांकि फिल्म में कई दमदार पहलू हैं, इसकी रफ्तार और जटिलता इसे पूरी तरह प्रभावशाली अनुभव बनने से रोक देती है।

कहानी और निर्देशन

फिल्म की कहानी अनंत पद्मनाभ स्वामी मंदिर की रहस्यमयी पृष्ठभूमि पर आधारित है, जहां पिशाच बंधनम नामक एक प्राचीन अनुष्ठान किया जाता है। इसके जरिए आत्माओं को मंदिर बांधा जाता है, ताकि वे छिपे खजानों की रक्षा कर सकें। सुधीर बाबू ‘शिवा’ के किरदार में नजर आते हैं। उनका किरदार अनोखा है, वो एक भूत शिकारी हैं जो तर्क और विज्ञान में विश्वास करता है, लेकिन उसकी दुनिया और उसके विचार दोनों ही तब बदल जाते हैं जब उसे एक ऐसी शक्ति का सामना करना पड़ता है जो उसके सारे वैज्ञानिक सिद्धांतों को चुनौती देती है। यहीं ये कहानी करवट लेती है और कई ट्विस्ट इसे आगे बढ़ाते हैं।

वेंकट कल्याण का निर्देशन महत्वाकांक्षी है। उन्होंने रहस्य, डर और दर्शन को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया है। हालांकि शुरुआत में फिल्म दिलचस्प लगती है, लेकिन बीच के हिस्से में इसकी गति धीमी पड़ जाती है। कुछ दृश्यों में आध्यात्मिकता की गहराई दिखती है, लेकिन कई बार यह सब दृश्य चकाचौंध में खो जाते हैं, लेकिन फिल्म का क्याइमेक्स इसे सही दिशा देता है और अंत शानदार होता है। थोड़े भटकाव के बावजूद फिल्म आखिर तक बांधे रखती है।

अभिनय

सुधीर बाबू ने एक तार्किक और भावनात्मक व्यक्ति का किरदार अच्छी तरह निभाया है। उनके चेहरे के भाव और बॉडी लैंग्वेज किरदार के संघर्ष को विश्वसनीय बनाते हैं। वो कहानी में डूबे नजर आ रहे हैं और हर सीन में उनसे नजर हटा पाना मु्श्किल है। सोनाक्षी सिन्हा तेलुगु सिनेमा में अपने डेब्यू के साथ एक प्रतिशोधी आत्मा ‘धना पिशाची’ के रूप में प्रभाव छोड़ती हैं। उनके लुक्स और परफॉर्मेंस में तीव्रता है, हालांकि स्क्रिप्ट उन्हें और गहराई देने में नाकाम रहती है, लेकिन उनकी एक्टिंग में भारी इंप्रूवमेंट देखने को मिल रहा है। दिव्या खोसला, इंदिरा कृष्णा और शिल्पा शिरोडकर ने अपनी भूमिकाओं में संवेदनशीलता जोड़ी है, लेकिन उनके किरदार सीमित दायरे में रह जाते हैं। उनके किरदार से कहानी की डेप्थ का कोई खास वास्ता नहीं है।

तकनीकी पक्ष

सिनेमैटोग्राफर समीर कल्याणी ने शानदार विजुअल्स कैद किए हैं। मंदिर की जटिल संरचनाएं, तांत्रिक अनुष्ठानों की रोशनी और धुएं का खेल दर्शकों को फिल्म की दुनिया में डूबो देता है। राजीव राज का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म का एक मजबूत पहलू है। 'शिव स्तोत्रम' जैसे ट्रैक आध्यात्मिक माहौल को ऊंचाई देते हैं, जबकि 'पल्लो लटके अगेन' फिल्म में हल्का पल जोड़ता है। हालांकि VFX ज्यादातर हिस्सों में शानदार हैं, लेकिन कुछ छोटे हिस्से में काम चलाऊ भी हैं, जिससे कुछ दृश्यों में अलौकिक प्रभाव कृत्रिम लगते हैं। एक्शन सीक्वेंस आकर्षक हैं। कुछ हिस्सों में दोहराव है, लेकिन उसे नजरअंदाज कर सकते हैं।

कमजोरियां

फिल्म का सबसे बड़ा दोष इसका असंतुलन है। कहानी जहां आस्था और तर्क के बीच संघर्ष को गहराई से दिखा सकती थी, वहीं यह कई जगहों पर सतही रह जाती है। बाकी फिल्मों की तुलना में इसकी शुरुआत अच्छी और कोशिश में गंभीरता भी दिखती है। फिल्म कही से भी मजाकिया नहीं लगती, लेकिन इसे और तर्कसंगत रखते तो ये फिल्म एक अल्टीमेट सिनेमा के रूप में सामने आ सकती थी। दूसरी समस्या इसकी लंबाई है। कई दृश्यों को छोटा किया जा सकता था। लेकिन कहानी में भावनात्मक जुड़ाव ही एक एक ऐसी चीज है जो इन सभी कमियों पर भारी पड़ रही है और इसे अच्छा सिनेमैटिक अनुभव दे रही है।

आखिर क्यों देखें ये फिल्म

'जटाधारा' एक दिलचस्प कॉन्सेप्ट पर बनी फिल्म है, जिसमें रहस्य, डर और दर्शन का दिलचस्प मिश्रण है। सुधीर बाबू और सोनाक्षी सिन्हा का अभिनय, खूबसूरत विजुअल्स और दमदार संगीत इसे देखने लायक बनाते हैं। इसकी असमान गति को इंग्नोर करते हुए इसकी सोच और एक शानदार कोशिश को मौका जरूर देना चाहिए। संभावित प्रभाव से इतर ये एक तर्कसंगत कोशिश है। अगर आप पौराणिक रहस्यों, तांत्रिक अनुष्ठानों और भव्य दृश्यों के प्रशंसक हैं तो 'जटाधारा' जरूर देखें, रोमांच भी मिलेगा और सोचने के लिए कुछ पल भी।

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