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Explainer: नीला झंडा ही क्यों लगाते हैं अंबेडकरवादी, कहां से आई ये परंपरा और क्या है इसका मतलब?

 Published : Apr 14, 2026 11:20 am IST,  Updated : Apr 14, 2026 11:36 am IST

Ambedkar Jayanti 2026: भीमराव अंबेडकर खुद नीला सूट पहनते थे। देशभर में जहां कहीं बाबासाहेब की मूर्तियां बनीं हैं, वो नीले रंग में ही हैं। अंबेडकरवादी हमेशा नीला झंडा लेकर ही आंदोलन में आगे आते हैं।

अंबेडकरवादी और नीला झंडा- India TV Hindi
अंबेडकरवादी और नीला झंडा Image Source : INDIA TV GFX

Ambedkar Jayanti 2026: आज देशभर में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई जा रही है। भारतीय संविधान के निर्माता, सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक और दलितों के मसीहा बाबासाहेब अंबेडकर को आज याद किया जा रहा है। देशभर में अंबेडकर के करोड़ों समर्थक हैं, जिन्हें अंबेडकरवादी कहा जाता है। अंबेडकरवादियों की पहचान नीला झंडा भी है। जानिए इसके पीछे का इतिहास और इसकी क्या परंपरा है? 

नीले सूट में अंबेडकर की मूर्तियां भी

डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के अनुयायी या अंबेडकरवादी जब भी कोई रैली, प्रदर्शन या स्मृति समारोह आयोजित करते हैं, तो नीला झंडा उनके हाथों में सबसे प्रमुख दिखाई देता है। कई जगहों पर अंबेडकर की मूर्तियां भी नीले सूट में दिखती हैं। यह नीला रंग और झंडा आज दलित-बहुजन आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बन चुका है। इसकी जड़ें 1940 के दशक में डॉक्टर अंबेडकर की राजनीतिक पहल में छिपी हैं।

इन पार्टियों का झंडा भी रहा नीला

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, 1942 में डॉक्टर अंबेडकर ने शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन ऑफ इंडिया (Scheduled Castes Federation) की स्थापना की। इस पार्टी का झंडा नीले रंग का था, जिसके केंद्र में अशोक चक्र बना हुआ था। अंबेडकर के अनुयायियों ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया का गठन किया, तो उसी नीले झंडे को अपनाया गया। इससे पहले 1930 के दशक में भी उनकी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी से जुड़े नीले रंग के संकेत मिलते हैं।

सांकेतिक तस्वीर
Image Source : FREEPIKसांकेतिक तस्वीर

नीला झंडा होने का ये है प्रमुख तर्क

नीला रंग चुनने के पीछे डॉक्टर अंबेडकर का मुख्य तर्क आकाश की समानता था। आकाश हर किसी के ऊपर बिना भेदभाव के छाया रहता है। आकाश अपनी छाया में अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित, किसी के साथ भेद नहीं करता है। यह रंग समानता, असीमता और गैर-भेदभाव का प्रतीक माना जाता है। कुछ विद्वान इसे बौद्ध धर्म से भी जोड़ते हैं, जिसे डॉक्टर अंबेडकर ने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ अपनाया था। बौद्ध ध्वज में भी नीला रंग मौजूद है, जो सार्वभौमिक करुणा और समानता का संकेत देता है।

दलित सशक्तिकरण का संदेश

एक और महत्वपूर्ण कारण डॉक्टर आंबेडकर का व्यक्तिगत जीवन था। उनके अंतिम तीन दशकों में वे अक्सर नीले सूट पहनते थे। यह सूट सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध का प्रतीक था। नीला सूट पहनकर डॉक्टर आंबेडकर ने जातिगत प्रतिबंधों को चुनौती दी और शिक्षा, कानून तथा संविधान निर्माण जैसे क्षेत्रों में ऊंची उपलब्धियों का प्रदर्शन किया। आज देशभर में उनकी मूर्तियां नीले सूट में ही बनाई जाती हैं, जो दलित सशक्तिकरण का संदेश देती हैं।

बहुजन समाजवादी पार्टी का नीला झंडा
Image Source : PTIबहुजन समाजवादी पार्टी का नीला झंडा

बसपा के झंडे का भी नीला रंग

नीला रंग ब्लू कॉलर वर्कर्स (मजदूर वर्ग) से भी जुड़ा माना जाता है, जिससे यह आंदोलन आम जनता तक पहुंचता है। 1980-90 के दशक में बहुजन समाज पार्टी (BSP) और कांशीराम जैसे नेताओं ने इसे और मजबूत किया, खासकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश में। आज यह रंग सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक अस्मिता का हिस्सा बन गया है।

आज भी जब दलित अधिकारों, आरक्षण या संविधान की रक्षा के मुद्दों पर प्रदर्शन होते हैं, नीला झंडा लहराता है। यह सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि समानता, न्याय और जाति-मुक्त समाज की लड़ाई का जीवंत प्रतीक है। अंबेडकरवादी इसे अपनी विरासत मानते हैं, जो बाबासाहेब के सपने को हर पीढ़ी तक पहुंचाता है।

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