Highlights
- दुनिया के 20 से ज्यादा देश बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहे हैं।
- ऑस्ट्रेलिया में प्रतिबंध के बावजूद 61 फीसदी बच्चे दूसरे तरीकों से सोशल मीडिया चला रहे हैं।
- विशेषज्ञों का सुझाव है कि बैन के बजाय प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा और प्राइवेसी मजबूत की जाए।
Social Media Ban for Children: बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत पर सोशल मीडिया के असर को लेकर दुनिया भर में बहस तेज है। कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की शुरुआत कर दी है, जबकि दूसरे देश भी ऐसे कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन क्या सोशल मीडिया पर पूरी तरह बैन लगाने से बच्चों की चिंता, तनाव और डिप्रेशन जैसी समस्याएं दूर हो जाएंगी? डिजिटल मीडिया और मार्केटिंग के प्रभावों का अध्ययन करने वाले एक रिसर्चर का मानना है कि इसका जवाब इतना आसान नहीं है। रिसर्च से जुड़ी शुरुआती बातें बताती हैं कि प्रतिबंध लगाना अकेले इस समस्या का प्रभावी समाधान नहीं हो सकता।
सोशल मीडिया कंपनियों पर क्यों बढ़ रहा है दबाव?
साल 2026 सोशल मीडिया कंपनियों के लिए कानूनी चुनौतियों से भरा रहा है। मार्च से यूट्यूब और इंस्टाग्राम-फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा कई मुकदमों में समझौते कर चुकी हैं या भुगतान कर चुकी हैं। इन मामलों की कुल रकम 17 अरब डॉलर से ज्यादा बताई गई है। कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म से जोड़े रखने के लिए जानबूझकर ऐसे डिजाइन बनाए, जो उन्हें बार-बार इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करते हैं। साथ ही, सुरक्षा और प्राइवेसी को लेकर जनता को गुमराह करने के आरोप भी लगे हैं। इन मुकदमों से संकेत मिलता है कि कंपनियों के कामकाज पर सरकारों और लोगों की नजर है।

कितने देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन?
दुनिया के कई देश अब नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया। इसके बाद ब्रिटेन ने भी इसी तरह का प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया। ग्रीस, संयुक्त अरब अमीरात और कनाडा समेत 20 से ज्यादा देश नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। हालांकि, सभी देशों के नियम एक जैसे नहीं हैं। कहीं उम्र की सीमा अलग है, तो कहीं माता-पिता की सहमति और उम्र की पुष्टि करने के तरीकों पर अलग-अलग नियम बनाए जा रहे हैं।
किन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लग सकती है रोक?
प्रस्तावित और लागू प्रतिबंधों में अलग-अलग प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इनमें स्नैपचैट, यूट्यूब, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे नाम प्रमुख हैं। हालांकि, सभी देश इन सभी प्लेटफॉर्म पर एक साथ रोक लगाने की योजना नहीं बना रहे हैं। प्रतिबंधों के पीछे मानसिक स्वास्थ्य के अलावा दूसरे कारण भी हैं। कुछ सरकारें विदेशी कंपनियों के नियंत्रण वाले प्लेटफॉर्म को लेकर राजनीतिक चिंताएं जताती हैं, जबकि कुछ का जोर बच्चों की निजी जानकारी और ऑनलाइन सुरक्षा पर है। इसके बावजूद, बच्चों और किशोरों की मानसिक सेहत लगभग हर उस सरकार की प्रमुख वजहों में शामिल है, जो सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने की बात कर रही है।
सोशल मीडिया से बच्चों की मानसिक सेहत पर क्या असर पड़ता है?
सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर बहस 2024 में जोनाथन हैड्ट की किताब ‘द एंग्जियस जनरेशन’ के बाद और तेज हुई। हैड्ट का तर्क है कि सोशल मीडिया बच्चों के सामाजिक और दिमागी विकास को प्रभावित कर सकता है। इसके संभावित नुकसान में नींद की कमी, ध्यान का बार-बार भटकना, सोशल मीडिया की लत, अकेलापन, दूसरों से अपनी तुलना करना और हर चीज में परफेक्ट बनने का दबाव शामिल हैं। इन कारणों से चिंता और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर केवल सोशल मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि इसके पीछे कई सामाजिक और व्यक्तिगत कारण भी हो सकते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आंकड़े क्या बताते हैं?
एक अध्ययन के मुताबिक, 2026 में 14 से 20 साल के युवाओं में मानसिक बीमारी का अनुभव करने की संभावना 50 साल पहले इसी उम्र के लोगों के मुकाबले 100 फीसदी से ज्यादा है। वहीं, वैश्विक स्तर पर 2021 के अनुमान के मुताबिक, 20.5 फीसदी युवाओं में चिंता के बढ़े हुए लक्षण और 25.2 फीसदी में डिप्रेशन के बढ़े हुए लक्षण पाए गए थे। शोधकर्ता मानते हैं कि सोशल मीडिया और स्क्रीन पर बढ़ता समय इस समस्या को और गंभीर बना सकता है। हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की बेहतर पहचान और जागरूकता भी बढ़ी है। कोविड-19 महामारी के दौरान लोग घरों में सीमित हुए और पढ़ाई, काम तथा सामाजिक मेलजोल ऑनलाइन होने लगा, जिससे अकेलेपन और सामाजिक दूरी में बढ़ोतरी हुई।
क्या सोशल मीडिया के कुछ फायदे भी हैं?
सोशल मीडिया के आलोचक कई बार इसकी तुलना शराब और सिगरेट से करते हैं। उनका तर्क है कि जिस तरह इन चीजों की खरीद पर उम्र संबंधी प्रतिबंध हैं, उसी तरह सोशल मीडिया पर भी बच्चों के लिए रोक लगनी चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया और इन पदार्थों में एक अहम अंतर है। सोशल मीडिया के कुछ फायदे भी हैं, खासकर उन किशोरों के लिए जो अपने आसपास के समुदाय से जुड़ाव महसूस नहीं करते। इसके जरिए वे समान रुचियों वाले लोगों से जुड़ सकते हैं, नए समुदाय बना सकते हैं, अपनी बात सामने रख सकते हैं और सामाजिक मुद्दों में भागीदारी कर सकते हैं। अमेरिका में प्यू रिसर्च के एक सर्वे में 80 फीसदी किशोरों ने कहा कि सोशल मीडिया उन्हें अपने दोस्तों की जिंदगी में हो रही घटनाओं से जुड़े रहने में मदद करता है।
तंबाकू कंपनियों से समझौते का क्यों हो रहा है जिक्र?
सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ मुकदमों और समझौतों की तुलना तंबाकू उद्योग से भी की जा रही है। 1998 में अमेरिकी राज्यों ने बड़ी तंबाकू कंपनियों के साथ समझौता किया था, ताकि धूम्रपान से जुड़े स्वास्थ्य खर्चों की भरपाई हो सके। इस समझौते की कुछ रकम युवाओं में धूम्रपान कम करने वाले कार्यक्रमों के लिए तय की गई थी। लेकिन 2026 में ऐसे कार्यक्रमों पर राज्यों की कुल फंडिंग, तंबाकू कर और समझौते से मिलने वाले 21.7 अरब डॉलर के राजस्व का केवल 3.4 फीसदी है। इससे सवाल उठता है कि नुकसान कम करने के उद्देश्य से मिलने वाला पैसा वास्तव में उसी काम पर कितना खर्च हो रहा है।

मेटा के 17 अरब डॉलर के समझौते से क्या होगा?
अगस्त 2026 में मेटा ने कई अमेरिकी राज्यों के साथ 17 अरब डॉलर के समझौते में रकम देने पर सहमति जताई। इस पैसे का कुछ हिस्सा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे को मजबूत करने, स्कूलों और समुदायों में कार्यक्रम चलाने तथा जनस्वास्थ्य जागरूकता अभियान के लिए निर्धारित किया गया है। लेकिन यहां भी एक बड़ी समस्या है। राज्यों को यह बताने के लिए स्पष्ट निगरानी व्यवस्था या तय दिशा-निर्देश नहीं हैं कि वे इस रकम का इस्तेमाल कैसे करें। साथ ही, ऐसा कोई व्यवस्थित तरीका नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि इस पैसे से बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षा और भलाई में कितना सुधार हुआ। यानी रकम मिलने के साथ उसके प्रभाव का हिसाब रखना भी जरूरी है।
ऑस्ट्रेलिया में बच्चे कैसे चला रहे हैं सोशल मीडिया?
ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया प्रतिबंध के शुरुआती अनुभव बताते हैं कि नियम लागू करना आसान नहीं है। उपलब्ध शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, 12 से 15 साल की उम्र के करीब 61 फीसदी बच्चे प्रतिबंध के बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच बना रहे हैं। इसके लिए वे फर्जी पहचान का इस्तेमाल करते हैं, अपनी तस्वीरों में बदलाव करते हैं या वीपीएन यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क की मदद लेते हैं। इस दौरान लाखों अकाउंट बंद भी किए गए। बच्चों के इन तरीकों से नियमों को चकमा देने की खबरों के बीच ब्रिटेन के सांसद उपभोक्ताओं के लिए वीपीएन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा कर रहे हैं।
उम्र की पहचान करने वाली तकनीक में क्या दिक्कतें हैं?
ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ देशों में सोशल मीडिया कंपनियों को खुद ऐसी व्यवस्था बनाने को कहा गया है, जिससे यूजर्स की उम्र की पुष्टि की जा सके। लेकिन इस तकनीक को भी आसानी से चकमा दिया जा सकता है। कुछ नाबालिगों ने चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक को धोखा देने के लिए फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर, मशहूर हस्तियों की तस्वीरों, खास मेकअप और बड़े दोस्तों या माता-पिता की मदद का इस्तेमाल किया। कुछ बच्चों ने अकाउंट बनाते समय अपनी जन्मतिथि गलत दर्ज की या परिवार के किसी वयस्क के पहले से वेरिफाइड अकाउंट का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, उम्र की सही पुष्टि करने के लिए संवेदनशील निजी डेटा जुटाना पड़ता है, जिससे प्राइवेसी को लेकर नई चिंताएं पैदा होती हैं।

प्रतिबंध लागू होने के बाद भी कितने बच्चे सोशल मीडिया पर हैं?
ऑस्ट्रेलिया में प्रतिबंध लागू कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले सुरक्षा आयुक्त ने एक अनुपालन रिपोर्ट में बताया कि प्रतिबंधित प्लेटफॉर्म पर पहले से अकाउंट रखने वाले 10 में से करीब 7 बच्चे अब भी उन प्लेटफॉर्म पर मौजूद थे। रिपोर्ट के मुताबिक, 10 से 15 साल के 80 फीसदी से ज्यादा ऑस्ट्रेलियाई किशोर अब भी नियमित रूप से सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं। ऑस्ट्रेलिया सरकार उन कंपनियों पर जुर्माना बढ़ाने की कोशिश भी कर रही है, जो नियमों का पालन नहीं करतीं। नीति बनाने वालों की एक और चिंता यह है कि पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से कुछ बच्चे मुख्यधारा के प्लेटफॉर्म छोड़कर ऐसे ऑनलाइन ठिकानों पर जा सकते हैं, जहां जोखिम और भी ज्यादा हो।
फिर क्या है बेहतर रास्ता?
शोधकर्ता का मानना है कि केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य संकट का प्रभावी समाधान होने की संभावना कम है। इसके बजाय सरकारों को कंपनियों के लिए ऐसे सुरक्षा मानक अनिवार्य करने चाहिए, जो शुरुआत से ही लागू हों। इसे ‘सेफ्टी बाय डिफॉल्ट’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि बच्चों के अकाउंट पर सबसे मजबूत सुरक्षा और प्राइवेसी सेटिंग पहले से चालू हो। उदाहरण के लिए, बच्चों की प्रोफाइल डिफॉल्ट रूप से सर्च में दिखाई न दे, ताकि अनजान लोग उन्हें आसानी से खोज न सकें। यदि बच्चे अपनी प्रोफाइल को अधिक लोगों के लिए उपलब्ध कराना चाहें, तो उन्हें खुद सेटिंग बदलनी पड़े। इससे ऑनलाइन अनजान लोगों से संपर्क का जोखिम घटाया जा सकता है।
सोशल मीडिया की लत लगाने वाले फीचर्स पर भी नियंत्रण जरूरी
सुरक्षा मानकों के तहत प्लेटफॉर्म के ऐसे डिजाइन और एल्गोरिदम पर भी सीमाएं लगाई जा सकती हैं, जो यूजर्स को बार-बार ऐप खोलने या लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करते हैं। शोधकर्ता के मुताबिक, इस तरह के फीचर्स कमजोर स्थिति में मौजूद बच्चों और किशोरों को मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके साथ ही, बच्चों को डिजिटल लिटरेसी और ऑनलाइन सुरक्षा की शिक्षा देना भी जरूरी है, ताकि वे इंटरनेट के फायदे और जोखिम दोनों को समझ सकें। स्क्रीन से दूर रहने के लिए दिन में कुछ समय तय करना भी मददगार हो सकता है। इस तरह बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह काटने के बजाय सुरक्षित इस्तेमाल के लिए तैयार किया जा सकता है।

माता-पिता और सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए?
बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर माता-पिता और उनकी देखभाल करने वाले वयस्कों को ध्यान देना चाहिए। यदि किसी बच्चे में सोशल मीडिया या स्क्रीन के अत्यधिक इस्तेमाल के संकेत दिखें, तो परिवार को मदद लेने के आसान, स्पष्ट और किफायती विकल्प मिलने चाहिए। फिलहाल, कई जगह बच्चों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता तक पहुंच आसान नहीं है। संयुक्त राष्ट्र भी सुझाव देता है कि बच्चों को उनके ऑनलाइन भविष्य से जुड़े फैसलों में अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि 12 साल के बच्चों को नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी सौंप दी जाए। बल्कि उनकी राय से यह समझा जा सकता है कि वे ऑनलाइन क्या पसंद करते हैं, किन चीजों से जुड़ते हैं और स्क्रीन से दूर होना उनके लिए मुश्किल क्यों होता है।
बैन से ज्यादा जरूरी है सुरक्षित सोशल मीडिया
सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य बच्चों को मानसिक नुकसान से बचाना है, लेकिन शुरुआती अनुभव दिखाते हैं कि ऐसे नियमों को लागू करना और उनका पालन सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है। बच्चे प्रतिबंधों से बचने के तरीके खोज सकते हैं और कुछ मामलों में ज्यादा जोखिम वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की ओर भी जा सकते हैं। इसलिए शोधकर्ता के मुताबिक, सरकारों, सोशल मीडिया कंपनियों, स्कूलों और परिवारों को मिलकर काम करना चाहिए। बेहतर सुरक्षा और प्राइवेसी सेटिंग, लत लगाने वाले फीचर्स पर नियंत्रण, डिजिटल शिक्षा, स्क्रीन से नियमित दूरी और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को साथ लेकर चलना जरूरी है। बच्चों की राय को भी इन प्रयासों में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे ऑनलाइन दुनिया में ज्यादा सुरक्षित रह सकें और संतुलित जीवन जी सकें। (द कन्वर्सेशन)
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