Explainer: आए दिन कई डोमेस्टिक और इंटरनेशनल फ्लाइट्स में बम होने की धमकी सामने आ रही है। आलम ये है कि एक दिन में 30-30 फ्लाइट्स में बम की धमकी मिल रही है। ऐसे में किसी भी फ्लाइट में बम होने की धमकी मिलने के बाद फ्लाइट को कैंसिल करना पड़ता है। इस दौरान अगर फ्लाइट उड़ान भर चुकी होती है तो उसकी इमरजेंसी लैंडिंग करानी भी पड़ती है। ऐसे में किसी एक फ्लाइट में धमकी मिलने के बाद उसपर कम से कम 3 से 4 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है। आइये जानते हैं फ्लाइट्स में मिलने वाली धमकी भरे कॉल्स के बारे में...
दरअसल, फ्लाइट में धमकी मिलने के बाद जांच एजेंसियां लगातार आरोपियों की तलाश में जुटी हुई हैं। इस दौरान जिस आईपी एड्रेस से कॉल आती है, उसे ब्लॉक कर दिया जाता है। इसके अलावा धमकी देने वाले आरोपियों को तलाश भी शुरू कर दी जाती है। दरअसल, किसी भी फ्लाइट में बम की धमकी आने के बाद उसकी लैंडिंग से लेकर जांच तक में कम से कम 3 से 4 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
दरअसल, बम थ्रेट दो प्रकार के होते हैं। पहला 'स्पेसिफिक थ्रेट' और दूसरा 'नॉन-स्पेसिफिक थ्रेट'। स्पेसिफिक थ्रेट का मतलब 'इस फ्लाइट नंबर में थ्रेट है या बम है', जबकि नॉन स्पेसिफिक थ्रेट का मतलब 'इस एयरपोर्ट से जाने वाली फ्लाइट में बम हो सकता है'। 'बम थ्रेट असेसमेंट टीम' जिसमें एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, CISF, बम डिस्पोजल स्क्वाड और एयरलाइंस की बाकी एजेंसी के स्टाफ होते हैं, ये तय करते हैं कि यह किस तरह का थ्रेट है। उसके बाद पायलट को इसकी जानकारी दे दी जाती है। उसके बाद फाइनल रिपोर्ट तय की जाती है कि ये धमकी है या असली बम है।
अगर विमान ग्राउंड पर है, तो उसे ट्रैक्टर लगाकर आइसोलेशन वे की तरफ ले जाया जाता है और फिर फ्लाइट की पूरी जांच की जाती है। वहीं अगर विमान टैक्सी आउट है और उसके दरवाजे बंद हैं तो नियम के मुताबिक उसे इन फ्लाइट माना जाता है। बम थ्रेट असेसमेंट टीम, ATC को पायलट को बताने की जानकारी देगा। इसके बाद पायलट जानकारी को केबिन क्रू को बताएगा। केबिन क्रू सभी सामान का आइडेंटिफिकेशन करते हुए जो यात्री फ्लाइट के अंदर मौजूद होते हैं, उनको इसकी जानकारी देते हैं।
यात्रियों को दो तरीकों से विमान से उतारा जाता है- अगर सब कुछ सामान्य रहा तो रैपिड डिसीमार्क किया जाता है, वरना अगर कोई अनजान सामान मिला तो क्रू तीन बार 'इवैक्यूएशन-इवैक्यूएशन-इवैक्यूएशन' बोलेगा। इसके बाद सारे गेट खोल दिए जाते हैं और इमरजेंसी डोर और बाकी दरवाजों से सभी यात्रियों को नीचे उतरा जाता है। इसके बाद CISF और बम डिस्पोजल स्क्वाड और बम थ्रेट असेसमेंट कमेटी की टीम इसकी पूरी तरह से जांच करती है।
अगर विमान टेक ऑफ हो चुका है तो पायलट को ATC के द्वारा दो तरह से जानकारी भेजी जाती है। पहला- रेडियो फ्रीक्वेंसी के द्वारा और दूसरी जानकारी डेटा लिंक जिसे एसीएआरएस कहते हैं। जानकारी मिलने के तुरंत बाद प्रोसीजर फिर से दोहराया जाता है और पास के किसी भी एयरपोर्ट (जो लैंडिंग के लिए सक्षम है) पर लैंड करवाया जाता है। इसके बाद वहां पर उसे आइसोलेशन वे की तरफ ले जाया जाता है। वहीं छोटे एयरक्राफ्ट के लिए करीबन 1.5 किलोमीटर का रनवे चाहिए और बड़े एयरक्राफ्ट के लिए 2.8 किलोमीटर लेकर 3 किलोमीटर तक का रनवे चाहिए होता है। छोटे विमान में करीब 78 यात्री हो सकते हैं वहीं बड़े विमान में करीब 180 लेकर 232 तक यात्री हो सकते हैं।
इस पूरे प्रोसेस में कम से कम 4 से 6 घंटे का डीले होता है। लैंडिंग के समय पर 5 से 7 फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, यात्रियों के हिसाब से एम्बुलेंस, बम डिस्पोजल स्क्वाड की गाड़ियां, CISF की गाड़ियां, बम थ्रेट असेसमेंट कमेटी की गाड़ियां और पास के हॉस्पिटल को भी एलर्ट पर रखा जाता है। इसके अलावा स्टेट पुलिस की यूनिट को भी अंदर बुला लिया जाता है।
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