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क्यों धधक रहे हैं उत्तराखंड के जंगल, कितना भयंकर होने वाला है इसका परिणाम? यहां जान लीजिए

Edited By: Subhash Kumar @ImSubhashojha Published : May 06, 2024 01:25 pm IST, Updated : May 06, 2024 02:54 pm IST

उत्तराखंड के जंगलों में बीते कुछ समय से आग लगने की घटनाएं काफी बढ़ गई हैं। इस आग के कारण अब तक कुल 5 लोगों की जान चली गई है। वहीं, इस आग को बढ़ावा देने के आरोप में पुलिस ने केस दर्ज कर के कई लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

उत्तराखंड के जंगलों में आग।- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV उत्तराखंड के जंगलों में आग।

उत्तराखंड के जंगलों में भीषण आग लगने की घटनाओं ने हर किसी को हैरान कर रखा है। जानकारी के मुताबिक, अब तक इस आग की चपेट में आने से 5 लोगों की मौत हो चुकी है। आग पर काबू पाने के लिए भारती वायुसेना की भी मदद ली जा रही है। बीते साल एक नवंबर से अब तक प्रदेश में जंगल में आग की 910 घटनाएं हुईं हैं जिनसे करीब 1145 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है। देवभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तराखंड के इन हालात ने हर किसी को हैरान कर दिया है। लेकिन इस आग का कारण क्या है? क्या ये आग मानव निर्मित है? इस आग को रोकने में समस्या कहां आ  रही है? आइए जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब हमारे इस एक्सप्लेनर के माध्यम से।

क्या है जंगलों में आग लगने का कारण?

उत्तराखंड में जंगलों के क्षेत्रफल की बात करें तो राज्य के 44.5 फीसदी क्षेत्रफल में जंगल मौजूद हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य का वन क्षेत्र 24,305 वर्ग किमी है। हिमालयी क्षेत्र में लंबे समय तक शुष्क मौसम और अतिरिक्त बायोमास आग की घटना में योगदान देते हैं। प्राकृतिक कारणों की बात करें तो सूखे पेड़ों या बांस के रगड़ खाने या फिर पत्थरों से निकली चिंगारी और बिजली गिरने के कारण भी जंगल में आग लगने की घटना देखी जाती है। इसके अलावा राज्य में मुख्य रूप से 3.94 लाख हेक्टेयर में फैले अत्यधिक ज्वलनशील चीड़ के पेड़ भी हैं। 

क्या मानव निर्मित है उत्तराखंड के जंगलों में आग?

देवभूमि के जंगलों में लगी आग करीब 90 फीसदी मानव निर्मित है। पहाड़ियों में ग्रामीण परंपरागत तौर पर नई घास को उगाने के लिए जंगल के फर्श को जलाते हैं। इसके अलावा जंगलों के पास बीड़ी या अलाव को छोड़ने जैसी घटनाएं भी आग को बढ़ावा देती है। हालांकि, बीते कुछ दिनों में राज्य की पुलिस ने दर्जनों लोगों को जंगल में आग को बढ़ाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इनमें से कई लोगों ने सोशल मीडिया के लिए रील बनाने या शरारत करने भर के लिए जंगल में आग लगाई है। 

पेड़ों की कटाई पर रोक भी है बाधा 

जंगल में आग को फैलने से रोकने के लिए करीब  50,000 किमी से अधिक फायरलाइन बनाने के प्रयास किए गए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने द्वारा साल 1981 में पूरे देश में 1,000 मीटर की ऊंचाई से ऊपर हरे पेड़ों को काटने पर रोक लगा दिया गया था। ये फैसला जंगल में आग को संभालने में बड़ी चुनौती पैदा करता है। अधिकारियों के अनुसार, चीड़ पाइन जैसे ईंधन स्रोतों को हटाने से रोकना आग के जोखिमों को कम करने के प्रयासों में बाधा डालते हैं।

क्या हो सकता है इस आग का परिणाम?

उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग अब धीरे-धीरे रिहायशी इलाकों तक भी पहुंचने लगी है। जंगल में लगी आग के कारण वन संपदा बुरे तरीके से नष्ट हो रही है। उत्तराखंड के जंगलों में आग के कारण जीव-जंतुओं की हजारों प्रजातियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। आग से निकले धुंए के कारण पर्यावरण दूषित हो रहा है और लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है। आग के कारण क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का भी खतरा हो सकता है। 

जंगल में आग को कैसे रोका जा सकता है?

वन अधिकारियों की मानें तो जंगल में लगने वाली आग में अग्नि त्रिकोण जिसमें ईंधन, गर्मी और ऑक्सीजन शामिल है, का अहम योगदान होता है। चीड़ के पेड़ों की अत्यधिक ज्वलनशील पत्तियों जैसे ईंधन स्रोतों को हटाने से इस अग्नि त्रिकोण को बाधित किया जा सकता है। इसके अलावा स्थानीय लोगों में जागरूकता बढ़ाकर और प्रशिक्षण प्रदान करके भी इस आग को रोका जा सकता है। विशेष रूप से वन क्षेत्रों के पास पार्टी करने और लापरवाही बरतने पर भी रोक लगाने की जरूरत है।

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