Published : Feb 07, 2026 05:48 pm IST, Updated : Feb 07, 2026 06:39 pm IST
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मुगल साम्राज्य में एक से बढ़कर एक बादशाह हुए हैं, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे भी रहे हैं जिनका दुखों ने जिंदगी भर पीछा किया। ऐसा ही एक मुगल बादशाह था शाह आलम द्वितीय, जिसका जन्म 1728 में दिल्ली में हुआ था और वह 10 अक्टूबर 1760 से 31 जुलाई 1788 तक और फिर 16 अक्तूबर 1788 से 19 नवंबर 1806 तक बादशाह रहा। शाह आलम की जिंदगी की सबसे बड़ी ट्रैजडी यह रही कि उसे अंधा कर दिया था, और उसने कई साल तक आंखों की रोशनी के बगैर ही शासन चलाया। आइए, आपको शाह आलम के बारे में और भी कई दिलचस्प बातें बताते हैं:
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शाह आलम द्वितीय का असली नाम अली गौहर था। वह मुगल बादशाह आलमगीर द्वितीय का बेटा था। उसका जन्म दिल्ली के लाल किले में हुआ, जहां मुगल राजपरिवार के सदस्य के तौर पर उसकी जिंदगी शानदार थी। बचपन में उसे अच्छी शिक्षा मिली, जिसमें इतिहास, कविता और युद्धकला जैसी चीजें शामिल थीं। लेकिन जल्द ही यह बादशाह राजनीतिक उथल-पुथल में फंस गया। 1754 में उनके पिता की हत्या के बाद वह उत्तराधिकारी बना, लेकिन उसे दिल्ली से भागना पड़ा।
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1759 में शाह आलम द्वितीय ने दिल्ली में गद्दी संभाली, लेकिन साम्राज्य पहले से ही टूट चुका था। अफगान आक्रमणकारी अहमद शाह अब्दाली ने दिल्ली को बुरी तरह लूटा था, जिससे मुगलों काफी कमजोर हो गए थे। शाह आलम को जाट, सिख और रोहिल्ला जैसी कई क्षेत्रीय शक्तियों से भी लड़ना पड़ा। उसने अपनी सेना को मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते बुरी तरह नाकाम रहा। इस तरह देखा जाए तो वह गद्दी पर भले ही बैठ गया था, पर वह अपने पुरखों जितना ताकतवर बादशाह नहीं रहा था।
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शाह आलम द्वितीय के शासन में सबसे बड़ी चुनौती रोहिल्ला सरदार गुलाम कादिर से आई थी। 1788 में गुलाम कादिर ने दिल्ली पर हमला किया, क्योंकि वह मुगलों के खजाने पर कब्जा करना चाहता था। शाह आलम ने उसका विरोध किया, लेकिन उसकी सेना रोहिल्ला सरदार के सामने टिक न पाई। गुलाम कादिर ने लाल किले पर कब्जा कर लिया और बादशाह को कैद कर लिया। बादशाह को कैद करने के बाद गुलाम कादिर ने उसके साथ कुछ ऐसा किया, जिसकी कल्पना करके किसी की भी रूह कांप जाए।
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गुलाम कादिर ने दिल्ली पर खजाने के लिए हमला किया था, और जब उसे इसकी जानकारी नहीं मिली तो वह आगबबूला हो गया। शाह आलम को आनाकानी करते देखकर उसने उसे टॉर्चर करना शुरू किया, और आखिरकार सुइयों से उसकी आंखें फोड़ दीं। सिर्फ इतना ही नहीं, गुस्से से बौखलाए गुलाम कादिर ने दिल्ली में भारी तबाही मचाई और मुगल परिवार को कई सदस्यों को मार डाला।
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शाह आलम II को अंधा करने के बाद गुलाम कादिर ने दिल्ली को लूटा और भाग गया। लेकिन जल्दी ही मराठा सरदार महादजी सिंधिया ने हस्तक्षेप किया। सिंधिया ने अपनी सेना के साथ गुलाम कादिर को हराया और उसकी जान ले ली। इसके बाद उन्होंने शाह आलम को फिर से गद्दी पर बिठाया। सिंधिया की मदद से बादशाह ने सत्ता दोबारा हासिल की, लेकिन अब वह पूरी तरह मराठों पर निर्भर हो गया।
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मुगल साम्राज्य की हालत कुछ ऐसी हो गई कि सिंधिया जैसे मराठा सरदार दिल्ली की रक्षा करते थे और मुगल दरबार में उनका पूरा दखल हो गया था। बादशाह को कोई फैसला लेने से पहले उनकी सहमति लेनी पड़ती थी। मराठा सेना ने कई हमलों से दिल्ली को बचाया, लेकिन बदले में वे मुगल संसाधनों का जैसे मन करता वैसे इस्तेमाल करते थे। शाह आलम उनकी कठपुतली बनकर रह गया था, और सिर्फ नाम का बादशाह था।
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शाह आलम द्वितीय एक प्रतिभाशाली कवि भी था और उसने उर्दू और फारसी में कई गजलें और कविताएं लिखी थीं। उसका तखल्लुस 'आफताब' था। उसकी रचनाएं प्रेम, दुख और उस समय के सियासी हालात पर आधारित थीं। मुगल दरबार में कवियों की परंपरा को उसने जारी रखा, भले ही साम्राज्य का पतन होता जा रहा था। शाह आलम द्वितीय को उन मुगल बादशाहों में गिना जाता है जो ठीक-ठाक साहित्य रचकर गए हैं।
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शाह आलम द्वितीय के शासन में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी मजबूत होती गई। 1803 में मराठों पर जीत के बाद लॉर्ड लेक ने दिल्ली पर कब्जा किया और बादशाह को पेंशनर बना दिया। इससे मुगल साम्राज्य एक तरह से अंग्रेजों का गुलाम हो गया। शाह आलम ने इसके बाद अंग्रेजों से गठबंधन कर लिया ताकि मराठा दोबारा दिल्ली पर कब्जा न कर सकें, लेकिन इससे उसकी ताकत और घट गई।
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शाह आलम द्वितीय की 1806 में 78 साल की उम्र में मौत हो गई। अपनी मौत के समय भी वही बादशाह था। उसकी मौत के बाद मुगल साम्राज्य और कमजोर होता गया और इसके करीब 51 साल बाद 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ जिसमें अंग्रेजों ने जीत दर्ज की और भारत पूरी तरह से ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आ गया।
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इस तरह देखा जाए तो एक समय जिस मुगल साम्राज्य की तूती बोलती थी, उसका अंत बहुत ही दुखद हुआ। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को तो कब्र के लिए भारत की जमीन भी नसीब नहीं हुई। यह कहानी बताती है कि ताकत कभी किसी एक की बपौती नहीं रही और समय-समय पर अलग-अलग शक्तियां सामने आती रहती हैं।