कैसे हुई सिंदूर खेला परंपरा की शुरुआत, दुर्गा पूजा में क्या है इसका महत्व? जानिए बंगाल के इस अद्भुत उत्सव के बारे में
कैसे हुई सिंदूर खेला परंपरा की शुरुआत, दुर्गा पूजा में क्या है इसका महत्व? जानिए बंगाल के इस अद्भुत उत्सव के बारे में
Sindoor Khela Utsav: हिंदू धर्म में नवरात्रि और दुर्गा पूजा का बेहद खास महत्व होता है। इन दिनों शक्ति की आराधना करके साधक उन्हें प्रसन्न करते हैं। विजयादशमी पर बंगाल, उड़ीसा, बिहार समेत देश के कई राज्यों में सिंदूर खेला की परंपरा मां दुर्गा की विदाई के समय निभाई जाती है।
Published : Sep 30, 2025 11:56 am IST, Updated : Sep 30, 2025 11:57 am IST
1/9Image Source : pti
Sindoor Khela Utsav: हिंदू धर्म में नवरात्रि और दुर्गा पूजा का बेहद खास महत्व होता है। इन दिनों शक्ति की आराधना करके साधक उन्हें प्रसन्न करते हैं। नौ दिनों में माता रानी के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।
2/9Image Source : pti
नवरात्रि के आखिरी दिन विजय दशमी के साथ ही इस महापर्व की समाप्ति होती है। विजयादशमी का पर्व पूरे दिन देश में अधर्म पर धर्म की जीत के प्रतीक में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
3/9Image Source : pti
वहीं, इस दिन बंगाल, उड़ीसा, बिहार समेत देश के कई राज्यों में सिंदूर खेला की परंपरा मां दुर्गा की विदाई के समय निभाई जाती है। लेकिन क्या आपको पता है यह परंपरा कब से चली आ रही है? चलिए जानते हैं इस अद्भुत परंपरा के बारे में...
4/9Image Source : pti
सिंदूर खेला बंगाल की बहुत ही पुरानी परंपरा है। इसकी शुरुआत विवाहित महिलाएं मां दुर्गा की आराधना और उन्हें सिंदूर अर्पित कर करती हैं। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अपने अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।
5/9Image Source : pti
इस साल शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, सोमवार, 22 सितंबर को हुई, जिसका समापन 2 अक्टूबर, गुरुवार को विजयदशमी के साथ होगा। इसी दिन सिंदूर खेला का आयोजन होगा।
6/9Image Source : pti
नौ दिनों तक चलने वाला नवरात्र का पावन पर्व अब खत्म होने वाला है। देशभर में भर में इस त्योहारों की धूम देखने को मिलती है, लेकिन पूरे बंगाल में इन दिनों एक अलग ही रौनक होती है। यहां नवरात्र में दुर्गा पूजा के रूप में मनाए जाने वाले पर्व की शुरुआत पंचमी से होती है, जिसकी दशमी पर समाप्ति होती है।
7/9Image Source : pti
बंगाल के धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, सिंदूर खेला परंपरा की शुरुआत लगभग 450 साल पहले पश्चिम बंगाल में हुई थी। ऐसी मान्यता है कि आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में 10 दिनों के लिए मां दुर्गा अपने मायके आती हैं, जिसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है।
8/9Image Source : pti
वहीं, दसवे दिन माता रानी विदा होती हैं। ऐसे में विजयादशमी पर विदाई देने से पहले महिलाएं उन्हें सिंदूर चढ़ाती हैं। इस उत्सव को ही सिंदूर खेला के नाम से जाना जाता है।
9/9Image Source : pti
दुर्गा विसर्जन के दिन पूजा-आरती के बाद मां को भोग अर्पित किया जाता है। देवी दुर्गा की प्रतिमा के सामने एक शीशा रखते हैं, जिसमें मां के शुभ चरणों के दर्शन होते हैं। इसके बाद सिंदूर खेला उत्सव की शुरुआत होती हैं। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएं देती हैं।