नयी दिल्ली: भारत की कॉरपोरेट स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था के आसमान छूती कीमतों से लेकर मुनाफा चालित प्रैक्टिस जैसे आरोपों का सामना करने के बीच 80 फीसदी से अधिक चिकित्सक मानते हैं कि कॉरपोरेट अस्पताल अनैतिक प्रथा को बढ़ावा दे रहे हैं। यह सर्वेक्षण क्यूरोफाई ने कराया जिसमें 2570 चिकित्सकों से साक्षात्कार लिया गया और 86.38 फीसदी चिकित्सकों ने कहा, कॉरपोरेट अस्पताल अनैतिक प्रथाओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। क्यूरोफाई सत्यापित चिकित्सकों का एक समुदाय है।
अपोलो में वरिष्ठ सलाहकार डॉ.अनिल कोहली ने कहा, स्वास्थ्य देखभाल उद्योग में बेहतर कॉरपोरेटाइजेशन की जरूरत है। अस्पताल चिकित्सक की नैतिकता पर नियंत्रण नहीं कर सकते। यह प्रतिस्पर्धी बाजार है इसलिए संवेदनशीलता कम है। उन्होंने कहा, अस्पतालों को अधिक पारदर्शी होने की आवश्यकता है। मेडिकल खर्च में भी व्यापक अंतर है। फार्मा कंपनियों के पास 30 से 40 फीसदी का मार्जिन है इसलिए उस क्षेत्र से लाभ कमाया जा सकता है।
चिकित्सकों के एक हिस्से ने यह भी महसूस किया कि कॉरपोरेट अस्पताल अनैतिक प्रथाओं को प्रोत्साहन नहीं दे रहे हैं। तकरीबन 8.63 फीसदी लोगों ने इस विचार का समर्थन किया। सर गंगा राम अस्पताल में जनरल लैप्रोस्कोपिक सर्जरी के एमेरिटस कंसल्टेंट डॉ.विजय अरोड़ा ने कहा, मेरा मानना है कि सभी चिकित्सक नैतिक हैं और वो कोई भी अनैतिक काम नहीं करते हैं। हालांकि, व्यापारियों का स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में कूदना अलग बात है। उनके अपने सिद्धांत हैं लेकिन चिकित्सक कभी अनैतिक काम नहीं करते।
तकरीबन 4.66 फीसदी चिकित्सक बंटे हुए हैं और यह नहीं कहा कि क्या कॉरपोरेटाइजेशन से अनैतिक दस्तूरों को बढ़ावा मिला है या नहीं। क्यूरोफाई के सह संस्थापक निपुण गोयल ने कहा, कॉरपोरेटाइजेशन मरीजों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधा प्रदान करने के लिए जरूरी है। यह बेहतर रहने के लिए प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है। लेकिन सर्वेक्षण के नतीजे साफ तौर पर दर्शाते हैं कि अनैतिक दस्तूरों पर अंकुश लगाने के लिए हमें सख्त कानूनों की आवश्यकता है।