
ट्रैफिक की झिकझिक से छुटकारा
दिल्ली की सड़क गाड़ी चलाना खेत में ट्रैक्टर चलाने जैसा है यानी ट्रैफिक इतना ख़राब होता है कि गाड़ी चलाने का आराम तो दूर की बात है, एसी में भी पसीना छूट जाता है। कम चौड़ी सड़के और बेतहाशा गाड़ियां से तो यही होगा। फ्लाइओवर तो ज़रुर बन गए हैं लेकिन फ़्लाई करना तो दूर वहां भी रैंगना पड़ता है ख़ासकर 'पीक अवर' में यानी जब लोग ऑफिस जा रहे होते हैं या वहां से लौट रहे होते हैं। ऑड-ईवन लागू होने पर जब गाड़ियों की संख्या लगभग आधी हो जाती है, तो जाम की स्थिति करीब-करीब ख़त्म सी हो जाती है। जाम फ्री ट्रैफ़िक का मतलब गाड़ी का सरपट भागना और इसका मतलब ट्रैफिक में फंसने से फ़ुंकने वाले अतिरिक्त ईंधन की बचत यानी फिर पैसे की बचत।

प्रदूषण में कमी
इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। ऑड-ईवन लागू होने के बाद पिछली बार कई सर्वे किए गए जिनमें से कई में प्रदूषण कम बताया गया, तो कुछ में बढ़ा हुआ बताया लेकिन ज़रा सामान्य रूप से सोचने पर लगेगा कि जब सड़कों पर वाहनों की संख्या काफी कम होगी तो ज़ाहिर है कि उनसे कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा। यदि कार्बन उत्सर्जन कम होगा, तो उससे प्रदूषण पर कुछ तो फर्क पड़ेगा ही। यह बात अलग है कि प्रदूषण में गाड़ियों के साथ-साथ उद्योगों का भी अहम रोल है या यूं कहें कि अधिक रोल है। फिर भी अगर प्रदूषण थोड़ा ही सही, अगर कम होता है तो इसका मतलब सांस की बीमारी की संभावना में कमी यानी डॉक्टर के चक्कर लगाने में कमी, तो बात फिर आ गई जेब की खनक की।

दुघर्टना/रोड रेज की संभावना कम
ऑड-ईवन के कारण जब सड़क पर गाड़ियां कम होंगी, तो आपाधापी की स्थिति नहीं बनेगी, ऐसे में गाड़ियां आसानी से दौड़ सकेंगी। इससे वह वापस में टकराएंगी नहीं और दुर्घटनाएं अपेक्षाकृत रूप से कम हो जाएंगी। इसके साथ रोड रेज की घटनाओं में भी कमी आएगी। आपने देखा होगा कि जल्दी पहुंचने के चक्कर में जाम की स्थिति बनने पर यदि आपकी गाड़ी जरा-सी भी दूसरी गाड़ी को छू जाती है, तो कई बार लोग आपे से बाहर हो जाते हैं और गुस्से में मारपीट कर बैठते हैं। सड़कें खाली होने पर इन घटनाओं से भी कुछ हद तक निजात मिलेगी। और जब गाड़ियां भिड़ेंगी नही, मारपीट होगी नहीं तो न तो गाड़ी की मरम्त का ख़र्चा और न ही ख़ुद की मरहमपट्टी का ख़र्चा तो फिर बजी न आपकी जेब खनक खनक.....।