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कश्मीर में शांति बहाली का एक और प्रयास विफल, दोराहे पर महबूबा

 Written By: IANS
 Published : Sep 06, 2016 06:46 am IST,  Updated : Sep 06, 2016 06:46 am IST

कश्मीर घाटी वर्षो बाद अशांति के भीषण दौर से गुजर रहा है और शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा जब समस्या के समाधान और घाटी में शांति बहाली के उद्देश्य से घाटी आए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को खाली हाथ लौटना पड़ा।

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नई दिल्ली: कश्मीर घाटी वर्षो बाद अशांति के भीषण दौर से गुजर रहा है और शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा जब समस्या के समाधान और घाटी में शांति बहाली के उद्देश्य से घाटी आए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को खाली हाथ लौटना पड़ा। अलगाववादी नेताओं ने इस प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करने से साफ मना कर दिया और अब जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के लिए लगभग सभी रास्ते बंद नजर आ रहे हैं। इसके बाद अब कश्मीर घाटी की जटिल परिस्थितियों के और पेचीदा होने की आशंका बढ़ गई है।

अब तक यह तो स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार अलगाववादियों के आगे नर्म नहीं पड़ने वाली, जो आठ जुलाई को हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी बुरहान वानी की सुरक्षा बलों के हाथों मौत के बाद से घाटी में अशांति भड़काने में लगे हुए हैं। राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री महबूबा ने सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत के लिए अलगाववादी नेताओं को आमंत्रित किया था। लेकिन अलगाववादी नेताओं ने उनका आमंत्रण ठुकरा दिया। अलगववादी नेताओं का कहना है कि जब तक कश्मीर के नागरिक इलाकों से सेना नहीं हटाई जाती और कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय समस्या नहीं माना जाता बातचीत का कोई मतलब नहीं है।

गौरतलब है कि कश्मीर में अधिकतर अलगाववादी नेता या तो जेलों में बंद हैं या अपने घरों में नजरबंद। महबूबा के पास जहां अलगाववादी नेताओं की यह मांगे पूरी करने का अधिकार नहीं है, वहीं केंद्र सरकार किसी भी तरह स्वीकार नहीं कर सकती। अहम की इस लड़ाई में महबूबा और उनकी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसे किसी चट्टान के नीचे फंस गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीडीपी कश्मीर घाटी में बीते दो महीने से चल रही अस्थिरता के दौरान आम नागरिकों की मौतों और अन्य क्षतियों के कारण जनता में विश्वास खो रही है।

उल्लेखनीय है कि बीते दो महीने में कश्मीर घाटी में हिंसक विरोध-प्रदर्शन और सुरक्षा बलों के साथ टकराव में 74 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 12,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। दक्षिणी कश्मीर का इलाका सर्वाधिक प्रभावित रहा है, जो पीडीपी का गढ़ भी रहा है। कश्मीर विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्राध्यापक ने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर कहा, "यह बहुत ही कठिन निर्णय है। लेकिन और कोई विकल्प भी तो नहीं है। अस्थिरता के इस माहौल के कारण पीडीपी की सहयोगी भाजपा का जम्मू और लद्दाख में जनाधार मजबूत हुआ है।"

उन्होंने श्रीनगर से फोन पर हुई बातचीत में कहा, "भाजपा के पास कश्मीर में खोने के लिए कुछ नहीं है। अस्थिरता के मौजूदा दौर में कश्मीर घाटी के संवेदनशील इलाके (नरमपंथी अलगाववादी) सिकुड़े हैं, जहां स्थानीय मुख्यधारा की पार्टियां आसानी से जीतती आई हैं। राजनीतिक सीमारेखा खींच दी गई है, या तो आप भारत के समर्थक हैं या आजादी के। इन संवेदनशील इलाकों में अब तक सबसे सशक्त रही पीडीपी को निश्चित तौर पर अब सर्वाधिक नुकसान होने वाला है।"

अलगाववादी धड़े में शामिल रह चुके और अब पीडीपी में शामिल हो चुके एजाज खान का कहना है कि महबूबा यदि मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ती हैं तो पूरी संभावना है कि अब सरकार अलगाववादी नेताओं के साथ सख्ती से पेश आएगी।

एजाज ने आईएएनएस से कहा, "महबूबा के पास अगले विधानसभा चुनाव से पहले अपना जनाधार वापस हासिल करने का पूरा मौका है। उनकी प्राथमिकता में सुशासन होना चाहिए न कि राजनीति। वह प्रशासनिक सख्ती के जरिए घाटी में स्थिरता कायम कर सकती हैं। नहीं तो सरकार इस्तीफा दे और पीडीपी नए सिरे से मध्यावधि चुनावों की तैयारी करे।" लेकिन इस अहम क्षण में इस्तीफा देना महबूबा के लिए 'राजनीतिक आत्महत्या' साबित हो सकती है। पीडीपी के संस्थापक और अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद के इसी वर्ष जनवरी में निधन के बाद महबूबा ने अनिच्छा से मुख्यमंत्री पद स्वीकार किया, क्योंकि वह भाजपा के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं थीं।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले आश्वासन कि कश्मीर में सुशासन स्थापित करना ही मुख्य एजेंडा होगा, महबूबा ने मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया। लेकिन महबूबा के पांच महीने के मुख्यमंत्रित्व काल के बीते दो महीने कर्फ्यू, हड़ताल, बंद और हिंसक विरोध-प्रदर्शन में गुजर चुके हैं और सरकार मूलभूत कामकाज तक नहीं कर पा रही। हालांकि महबूबा घाटी में शांति बहाल होने को लेकर निराश नहीं हैं। सोमवार को उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है, "देश और राज्य नेतृत्व के सामने मुख्य चुनौती असफलताओं से शांति बहाली की प्रक्रिया को अलग करना है, जिनके कारण अब तक इसमें बाधा आती रही है।"

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