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किसान आंदोलन: 10 महीने से 'धैर्यवान' बनी बैठी है सरकार, संगठनों की तरफ से सीधे टकराव का पूरा प्रयास?

 Written By: IndiaTV Hindi Desk
 Published : Sep 28, 2021 11:22 am IST,  Updated : Sep 28, 2021 11:22 am IST

10 महीने से कृषि कानूनों का विरोध कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से कई ऐसे प्रयास हुए हैं जो सीधे सरकार के साथ टकराव को बढ़ावा देते नजर आए हैं, पहले किसान संगठनों ने विरोध के नाम पर दिल्ली के बॉर्डर सील कर दिए जिससे दिल्ली और एनसीआर में रह रहे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। 

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किसान आंदोलन: 10 महीने से 'धैर्यवान' बनी बैठी है सरकार, संगठनों की तरफ से सीधे टकराव का पूरा प्रयास?  Image Source : PTI

नई दिल्ली। कृषि कानूनों के विरोध में संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से मंगलवार को देशव्यापी भारत बंद का आहवान किया गया था और उस बंद का असर दिल्ली और दिल्ली से सटे क्षेत्रों में तो ठीकठाक रहा लेकिन देश के अन्य हिस्सों से बंद को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया नजर आई। कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों के गठबंधन 'संयुक्त किसान मोर्चा' की तरफ से सरकार पर दबाव डालने की यह एक और कोशिश थी लेकिन इस कोशिश का परिणाम भी वही रहा जो पिछले 10 महीने के दौरान हुई अन्य कोशिशों का हुआ।

किसान कानूनों को लेकर सरकार ने साफ किया है कि कानून रद्द नहीं होंगे लेकिन उनमें सुधार किया जा सकता है और उसके लिए किसानों को बातचीत के लिए आना होगा। सोमवार के 'भारत बंद' को लेकर भी सरकार की तरफ से भी वही धैर्य दिखाया गया जो पहले देखने को मिला था। 

दरअसल 10 महीने से कृषि कानूनों का विरोध कर रहे संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से कई ऐसे प्रयास हुए हैं जो सीधे सरकार के साथ टकराव को बढ़ावा देते नजर आए हैं, पहले किसान संगठनों ने विरोध के नाम पर दिल्ली के बॉर्डर सील कर दिए जिससे दिल्ली और एनसीआर में रह रहे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके बाद किसान संगठनों ने 26 जनवरी के दिन लालकिले में जमकर हिंसा की और पुलिस के लोगों को पीटा।

लाल किले में हुई हिंसा को लेकर आरोप यह भी लगे कि खालिस्तानी आतंकियों के इशारे पर हिंसा को अंजाम दिया गया था। कई जगहों पर ट्रेनों का रोका, कुछ जगहों पर मोबाइल के टॉवर तक तोड़ दिए गए, यहां तक कि दिल्ली में किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली दंगों के आरोपियों तथा एलगार परिषद के कार्यकर्ताओं को छोड़ने की मांग भी की गई। कई किसान संगठनों की तरफ से पीएम मोदी को मारने तक की बातें कही गई। 10 महीने के दौरान किसान संगठनों की तरफ से ऐसे कई प्रयास हुए हैं जो सरकार से सीधे टकराव के संकेत देते हैं। 

किसान संगठनों की तरफ से टकराव के कई प्रयासों के बावजूद सरकार ने धैर्य के साथ प्रतिक्रिया दी। किसान संगठनों के साथ लगातार बातचीत का प्रयास किया गया और 11 राउंड की बात हुई भी। 26 जनवरी के दिन जब लालकिले पर किसान संगठनों ने हिंसा की थी और पुलिस के लोगों तक को पीट दिया था तब पुलिस ने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की। सरकार की तरफ से हर बार कहा गया कि कृषि कानूनों में किसानों को जहां परेशानी है उसपर बातचीत के लिए सरकार तैयार है।

कृषि मंत्री ने यहां तक कहा कि किसान संगठन जब भी बात करना चाहें वे सरकार को सिर्फ एक फोन कर दे, सरकार तुरंत बात के लिए तैयार हो जाएगी। किसान संगठनों को सरकार की तरफ से कोविड टेस्ट के लिए भी कहा गया लेकिन किसानों ने सरकार की बात तक नहीं मानी। लेकिन बड़ा सवाल अब भी यही बनता है कि किसान संगठनों का यह आंदोलन कबतक चलेगा? कबतक दिल्ली और एनसीआर में रह रहे लोगों को किसान संगठनों के आंदोलन की वजह से  बंद पड़ी सड़कों के चलते परेशानी का सामना करना पड़ेगा? अगर बीच का कोई रास्ता नहीं निकलता है तो दिल्ली और एनसीआर में रह रहे लोगों की परेशानी बढ़ती ही जाएगी। 

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