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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को दिल्ली दंगे के वीडियो से सीख लेनी चाहिए

 Written By: Rajat Sharma
 Published : Mar 06, 2020 05:26 pm IST,  Updated : Mar 06, 2020 05:37 pm IST

वीडियो में साफ तौर पर दिखा कि दंगाइयों ने महिलाओं और बच्चों को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया था, और जब उन्होंने पुलिस पर हमला किया, तो महिला प्रदर्शनकारियों ने भी पत्थर फेंके। हमारे पुलिसकर्मियों ने बहुत संयम बरता।

Let our human rights activists learn a lesson from Delhi riot videos - India TV Hindi
Let our human rights activists learn a lesson from Delhi riot videos  Image Source : INDIA TV

गुरुवार को दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में 6 और लोगों की मृत्यु के बाद दिल्ली दंगों में मरने वालों का आंकड़ा 53 तक पहुंच गया। लगभग 300 घायल लोग अभी भी अस्पताल में हैं। दुख तब ज्यादा हुआ जब 2 नए वीडियो सामने आए जिनमें चांद बाग इलाके में 2000 से ज्यादा लोगों की भीड़ दिल्ली पुलिसकर्मियों को निशाना बनाते हुए नजर आई।

वीडियो में साफ दिखा कि पुलिसकर्मियों की संख्या पत्थर फेंकने वाले और यहां तक कि फायरिंग करने वाले दंगाइयों के मुकाबले बहुत कम थी। भीड़ के उपद्रव से बचने की कोशिश में पुलिसकर्मी सड़क के डिवाइडर पर खुद को बचाते हुए दिखे। यह वही जगह थी जहां पर दंगाइयों ने हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल को गोली मारी थी और इसी जगह पर डीसीपी अमित शर्मा दर्जनभर पुलिस कर्मियों और एसीपी अनुज कुमार के साथ गंभीर रूप से घायल अवस्था में मिले थे।

वीडियो क्लिप में दिखा कि कई महिलाएं जो उस विरोध मार्च का हिस्सा थीं, जो देखते ही देखते दंगाई भीड़ में बदल गया। हमलावरों को पकड़ने में वीडियो दिल्ली पुलिस की मदद कर सकता है। दंगाइयों की पहचान के लिए तस्वीरों को विकसित करने हेतू पुलिस ने साइबर सेल और फोरेंसिक लैब की मदद मांगी है।

इनमें से एक वीडियो शायद यमुना विहार में एक जिम की छत से शूट किया गया था, जबकि दूसरा वीडियो चांद बाग की तरफ से शूट किया गया था। पुलिस उन लोगों से संपर्क करने की कोशिश कर रही है जिन्होंने वीडियो क्लिप को शूट किया है। एक तीसरे वीडियो में पुलिस पर दंगाइयों की गोली चलाने की खबरें भी हैं। दंगा करने वाले की पहचान कर ली गई है और जल्द ही उसे पकड़ लिया जाएगा।

अब कृपया उन परिस्थितियों को समझने का प्रयास करें जिनके तहत हमारे पुलिसकर्मियों को काम करना पड़ता है। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कहते हैं, सरकार कानून बनाती है और पुलिसकर्मियों को उन्हें जिम्मेदारी से लागू करना होता है। लेकिन, वास्तव में जमीन पर क्या होता है?

दंगे हो रहे थे और दंगाइयों की भीड़ साफ तौर पर पुलिस से अधिक थी। भीड़ ने पुलिसकर्मियों को भगा दिया था, और वे खुद को दंगाइयों से बचाने की कोशिश कर रहे थे। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में अगर पुलिस दंगाइयों पर गोली चलाती है, तो कोई भी सवाल नहीं उठाता है, लेकिन, भारत में, पुलिस को केवल आत्मरक्षा में गोली चलाने की इजाजत है, क्योंकि कई ऐसे लोग हैं जो सवाल उठाते हैं।

वीडियो में साफ तौर पर दिखा कि दंगाइयों ने महिलाओं और बच्चों को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल किया था, और जब उन्होंने पुलिस पर हमला किया, तो महिला प्रदर्शनकारियों ने भी पत्थर फेंके। हमारे पुलिसकर्मियों ने बहुत संयम बरता। उन्होंने बहादुरी से पत्थरों और गोलियों का सामना किया, लेकिन महिलाओं और बच्चों पर एक भी गोली नहीं चलाई। गंभीर रूप से घायल उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अस्पतालों में ले जाना पड़ा, और उनमें से एक ने अपनी जान दे दी। क्या हमें उनके संयम की भावना की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए?

मुझे यह देखते हुए दुख हुआ कि हमारे पुलिसकर्मियों को भीड़ ने एक जगह इकट्ठा कर दिया, दंगाइयों ने उन्हें पत्थर मारे और कायरतापूर्ण तरीके से गोली मार दी। कल्पना कीजिए कि ऐसी गंभीर स्थिति में किसी को क्या करना चाहिए। अगर पुलिस महिलाओं और बच्चों पर लाठियां या गोलियां बरसाती थी, तो उन्हें निलंबित कर दिया जाता था, एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया जाता था, और पुलिसकर्मियों को बिना किसी राहत मिले अपना पूरा जीवन अदालतों के चक्कर काटने में बिताना पड़ता था।

मुझे लगता है कि हमारे नागरिक समाज को यह तय करने की जरूरत है कि ऐसी परिस्थितियों का सामना करने पर क्या करना चाहिए। जो लोग मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं उन्हें ये वीडियो देखना चाहिए और सबक सीखना चाहिए। एक तरफ, हमारे बहादुर पुलिसकर्मियों ने बेहद संयम दिखाया, तो दूसरी ओर, गुरुवार को हमारे विपक्षी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष पर कागजात फेंके। इस तरह की हरकत करने वाले सांसदों ने हमारे लोकतंत्र के मंदिर को एक तमाशा बना कर रख दिया है। ये हम सबके लिए गहराई से सोचने का वक्त है। 

 

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