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मोदी के दौरे से भारत-ईरान सांस्कृतिक संबंध भी मजबूत होंगे

 Written By: India TV News Desk
 Published : May 22, 2016 09:01 pm IST,  Updated : May 22, 2016 09:01 pm IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तेहरान में जब 'ईरान में भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव' का उद्घाटन करेंगे तो दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूती मिलेगी।

Narendra Modi
- India TV Hindi
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नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को तेहरान में जब 'ईरान में भारतीय सांस्कृतिक महोत्सव' का उद्घाटन करेंगे तो दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी। ईरान के दो दिवसीय दौरे पर रविवार को रवाना हुए मोदी सोमवार को दो दिवसीय 'भारत-ईरान दो महान सभ्यताएं: पुनरावलोकन-संभावनाएं' नामक सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। यह सम्मेलन तेहरान में भारतीय दूतावास, बोनयाद-ए-सादी और फरहानजिस्तान-ए-जबान-ओ-अरब-ए-फारसी के साथ मिलकर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) द्वारा आयोजित महोत्सव का हिस्सा है।

आईसीसीआर के बयान के अनुसार, सम्मेलन में भारत के ईरान के साथ संबंधों, कला, संस्कृति, पुरातत्व, भाषा, साहित्य और संगीत को समेटे हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा की समीक्षा जाएगी और मजबूत साझेदारी के मद्देनजर परस्पर लाभ के लिए मिलकर काम करने के क्षेत्रों की खोज की जाएगी। महोत्सव के उद्घाटन की एक बड़ी विशिष्ठता यह होगी कि मोदी 'कलिला वा डिम्ना' नामक फारसी पांडुलिपि का विमोचन करेंगे। यह पंचतंत्र और जातक कथाओं का अनुवाद है।

आईसीसीआर के निदेशक सी.राजशेखर ने फारसी को श्रेय देते हुए कहा, "इस भाषा ने हमें नई भाषा उर्दू दी, जबकि मध्यकाल में फारसी ने हमारे साहित्यिक और धार्मिक आन्दोलन को प्रभावित किया।" उन्होंने कहा, "फारसी शैली की प्रस्तुति ने हमारे मंच और नाटक को प्रभावित किया। फारसी की शब्दावली और इसकी लेखन शैली हिन्दी, पंजाबी से लेकर बांग्ला तक प्रत्येक आधुनिक भारतीय भाषा का हिस्सा बन गई है।"

कार्यक्रम की तैयारी के लिए राजशेखर पहले से तेहरान में हैं। उन्होंने कहा कि फारसी संस्कृति के प्रभाव भारत में खान-पान की आदतें, कलाओं की प्रस्तुतीकरण और भाषाओं से लेकर धार्मिक विचारों तक व्याप्त है। राजशेखर ने कहा, "बदले में भारतीय साहित्य, कवियों और लेखकों ने फारसी भाषा को काफी हद तक संपन्न बनाया। भारत ने अमीर खुसरो, फैजी, बेदिल और गालिब जैसे कवि दिए और फारसी समाज को सबक-ए-हिन्दी या भारतीय शैली दी।"

फारसी में नमूने के तौर पर करीब सौ किताबें होंगी जो दुर्लभ पांडुलिपियों के प्रकाशन हैं। आईसीसीआर के बयान के अनुसार, भारत में फारसी विदेशी भाषा नहीं, बल्कि एक शास्त्रीय भारतीय भाषा मानी जाती है। सम्मेलन के अलावा एक काव्य संध्या का भी आयोजन होगा। दुर्लभ फारसी पांडुलिपियों और लघुचित्रों का प्रदर्शन भी होगा।

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