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नेताजी नहीं मरे थे प्लेन क्रैश में, नेहरू से डरकर रूस में रह रहे थे?

 Written By: India TV News Desk
 Published : Jul 09, 2016 06:15 pm IST,  Updated : Jul 09, 2016 06:16 pm IST

नई दिल्ली: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत किसी रहस्य से कम नहीं है। राजनेता और राजनायिकों ने हमेशा यह कहा कि नेताजी का निधन 18 अगस्त, 1945 को प्लेन क्रैश में हुआ। लेकिन नेताजी

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नई दिल्ली: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत किसी रहस्य से कम नहीं है। राजनेता और राजनायिकों ने हमेशा यह कहा कि नेताजी का निधन 18 अगस्त, 1945 को प्लेन क्रैश में हुआ। लेकिन नेताजी से जुड़ी जिन गोपनीय फाइलों को कुछ दिनों पहले सार्वजनिक किया गया उससे ये पता चलता है कि उनकी मौत 1945 को प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी और साठ के दशक में वह रूस में रह रहे थे। इन फाइलों के मुताबिक सुभाष चंद्र बोस 1968 तक रूस में थे और इस दौरान उनकी मुलाकात क्रांतिकारी वीरेंद्रनाथ चटोपाध्याय के बेटे निखिल चटोपाध्याय से हुई थी।

नेहरू से डर कर रूस में रह थे नेताजी

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की तरफ से गुरुवार को ये फाइलें सार्वजिनक की गई। बता दें कि इन फाइलों में एक हलफनामा भी है और उसी में इस बात दावा किया गया है। यह हलफनामा लेखक और पत्रकार नरेंद्रनाथ सिकंदर का है जो 1966 से 1991 के दौरान मॉस्को में रह रहे थे। उनका दावा है कि चटोपाध्याय और उनकी पत्नी रूस के साइबोरियाई क्षेत्र  ओम्स्क शहर में मिले थे।

यह हलफनामा 2000 में मुखर्जी कमिशन के पास दाखिल किया गया। इसमें सिकंदर ने चटोपाध्याय के हवाले से कहा कि नेताजी इस डर से रूस में छिपे हुए थे कि भारत में उनपर बतौर युद्ध अपराधी केस चलाया जा सकता है। 1966 में वीर सावरकर की मौत के बाद सिकंदर ने मॉस्को में चटोपाध्याय से मुलाकात की थी।

नेताजी पर निर्वासन में रहने का दवाब बना रहे थे नेहरू

सिकंदर का हलफनामा एक फाइल में है जिसमें कहा गया है, ‘हमारी बातचीत के दौरान उन्होंने जवाहर लाल नेहरू पर आरोप लगाया कि वह नेताजी पर रूस में निर्वासन में रहने का दवाब बना रहे है। यह निर्वासन था क्योंकि नेताजी को इस बात का डर था कि नेहरू की वजह से भारत में उन्हें युद्ध अपराधी करार दिया जा सकता है। जब वह मंचूरिया के रास्ते तब के सोवियत संघ में आए तो स्टालिन, मोरोतोव बेरिया और बोर्शिलोव ने भारत के बारे में जानकारी रखने वाले स्कॉलरों को संपर्क किया और उन्होंने स्टालिन को सलाह दी कि वे सोवियत दूतावास के जरिए लंदन में कृष्ण मेनन से संपर्क करें। तब कृष्ण मेनन ने साफ तौर पर नेहरू का पक्ष लिया और स्टालिन को सलाह दी कि वह इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं करें।’

बता दें कि इससे पहले केंद्रीय संस्कृति सचिव एन. के. सिन्हा ने 27 मई को नेताजी से जुड़ी 25 फाइलों के चौथे संस्करण को वेबपोर्टल पर ऑनलाइन जारी किया था। 25 फाइलों के इस बैच में 1968 से 2008 की अवधि की प्रधानमंत्री कार्यालय की पांच फाइलें, गृह मंत्रालय की चार फाइलें और विदेश मंत्रालय की 16 फाइलें शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 23 जनवरी 2016 को नेताजी की 119वीं जयंती के अवसर पर उनसे जुड़ी 100 फाइलों के पहले बैच को डिजिटीकरण के बाद सार्वजनिक किया गया था। 50 फाइलों का दूसरा बैच और 25 फाइलों का तीसरा बैच क्रमश: 29 मार्च 2016 तथा 29 अप्रैल 2016 को डॉ. महेश शर्मा द्वारा जारी किया गया।

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