नई दिल्ली: पिछले दिनों मथुरा में हुई हिंसा की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सुनवाई करने से इन्कार कर दिया। एक सार्वजनिक पार्क से स्वाधीन विधिक सत्याग्रही संगठन के सदस्यों के अतिक्रमण को हटाने के दौरान हिंसा हुई थी, जिसमें दो पुलिस अधिकारियों सहित 29 लोगों की मौत हो गई थी।
शीर्ष अदालत की अवकाश पीठ के न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष और न्यायाधीश अमिताव रॉय ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह उत्तर प्रदेश के लिए है कि वह सीबीआई से जांच कराने के लिए केंद्र सरकार के पास जाए। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की दिल्ली इकाई के प्रवक्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में इस आशय की याचिका दायर की थी।
न्यायमूर्ति पी सी घोष और न्यायमूर्ति अमिताव राय की एक अवकाश पीठ ने सोमवार को मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया था। अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने इस मामले पर तत्काल सुनवाई का आग्रह किया था। याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय के लिए पेश हुईं अधिवक्ता जायसवाल ने कहा कि घटना की शुरुआत से ही सबूत नष्ट किए जा रहे हैं और करीब 200 वाहन पहले ही जलाए जा चुके हैं।
तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि हिंसा की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच जरूरी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने के लिए दो जून को पुलिस मथुरा के जवाहर बाग की भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए पहुंची। समझा जाता है कि यह अतिक्रमण एक अल्पचर्चित संगठन आजाद भारत विधिक वैचारिक क्रांति सत्याग्रही के कार्यकर्ताओं ने किया था। पुलिस ने जब अवैध अतिक्रमणकारियों को खदेड़ने की कोशिश की तो हिंसा भड़क उठी। अतिक्रमणकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव में एक पुलिस अधीक्षक और एक थाना प्रभारी सहित 29 लोगों की जान चली गई।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इसका उल्लेख नहीं किया है कि गत सप्ताह हुई घटना के बाद राज्य सरकार ने कोई कदम उठाया है या नहीं उठाया है या जांच त्रुटिपूर्ण है जिससे लोगों में विश्वास कम हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता से पूछा कि क्या उन्होंने सीबीआई जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के पास कोई अभिवेदन किया है?
उपाध्याय को याचिका वापस लेने की इजाजत देते हुए अदालत ने कहा कि सार्वजनिक पार्क से स्वाधीन विधिक सत्याग्रही संगठन के सदस्यों का कब्जा हटाने से संबंधित मामला अब भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है और याचिकाकर्ता चाहे तो उस अदालत में पेश हो सकते हैं।