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हिंदुओं को ईसाई क्यों समझ बैठा था वास्को डि गामा? पढ़ें, उसकी भारत यात्रा के रोचक किस्से

 Published : Jul 08, 2025 11:27 am IST,  Updated : Jul 08, 2025 12:06 pm IST

वास्को डि गामा ने 1498 में समुद्री मार्ग से भारत पहुंचकर इतिहास रचा। कालीकट में हिंदुओं को मूर्ति पूजा करते देख उसने उन्हें ईसाई समझ लिया। उसकी यात्रा ने यूरोपीय व्यापार और उपनिवेशवाद की नींव भारत में रखी।

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भारत के लिए यात्रा की शुरुआत करता वास्को डि गामा और उसका दल। Image Source : FILE

Vasco da Gama India Journey: वास्को डि गामा एक पुर्तगाली नाविक और खोजकर्ता था, जिसने 1498 में भारत के लिए समुद्री रास्ता खोजकर इतिहास में अपनी अहम जगह बनाई है। उसकी यह यात्रा न सिर्फ यूरोप और भारत के बीच व्यापार को बढ़ावा देने वाली थी, बल्कि इसने विश्व इतिहास को भी बदल दिया। वास्को डि गामा जब भारत पहुंचा तो उसने हिंदुओं को ईसाई समझ लिया था, क्योंकि उसने इन्हें मूर्ति पूजा करते हुए देखा। इससे पहले वास्को डि गामा ने किसी भी हिंदू को कभी पूजा करते हुए नहीं देखा था, इसीलिए उसे यह गलतफहमी हुई। आइए, जानते हैं वास्को डि गामा की इस खास यात्रा की कहानी और इसके असर के बारे में।

भारत तक पहुंच क्यों चाहते थे यूरोप के देश?

15वीं सदी में यूरोप के देश मसालों, रेशम, और अन्य कीमती चीजों के लिए भारत और पूर्वी देशों तक पहुंचना चाहते थे। उस वक्त मसाले, जैसे काली मिर्च और दालचीनी, यूरोप में सोने-चांदी जितने कीमती थे। लेकिन इनका व्यापार ज्यादातर अरब और वेनिस के व्यापारियों के हाथ में था, जो इसे जमीन के रास्ते लाते थे। यह रास्ता लंबा, खतरनाक, और महंगा था। पुर्तगाल के राजा मैनुएल प्रथम ने समुद्री रास्ता खोजने का फैसला किया, ताकि सीधे भारत से व्यापार हो सके। इस काम के लिए वास्को डि गामा को चुना गया, जो एक अनुभवी नाविक और साहसी इंसान था।

4 जहाज लेकर भारत के लिए निकला था वास्को

वास्को डि गामा ने अपनी पहली भारत यात्रा 8 जुलाई, 1497 को लिस्बन, पुर्तगाल से शुरू की। उनके साथ 4 जहाज थे:

  1. साओ गैब्रियल (वास्को का मुख्य जहाज)
  2. साओ राफेल (उनके भाई पाउलो डि गामा के नेतृत्व में)
  3. बेरियो (एक छोटा जहाज)
  4. एक आपूर्ति जहाज (जो रास्ते में जरूरी सामान ले जा रहा था)

इन जहाजों पर करीब 170 लोग सवार थे, जिनमें नाविक, सैनिक, और अनुवादक शामिल थे। उनका मकसद था अफ्रीका के रास्ते समुद्र से भारत पहुंचना। यह यात्रा बेहद जोखिम भरी थी, क्योंकि उस वक्त समुद्री रास्तों की पूरी जानकारी नहीं थी।

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Image Source : FILEभारत के कालीकट में उतरता हुआ वास्को डि गामा का कारवां।

कई हिस्सों में बंटी थी वास्को की यात्रा

वास्को की यात्रा कई हिस्सों में बंटी थी, और इसमें कई मुश्किलें आईं।

1. पहले अफ्रीका के पश्चिमी तट तक गए: वास्को ने पहले केप वर्डे द्वीपों तक का रास्ता तय किया। यहां से उन्होंने एक साहसिक फैसला लिया। वे अटलांटिक महासागर में दूर तक गए, ताकि अफ्रीका के पश्चिमी तट की खतरनाक हवाओं और धाराओं से बच सकें। यात्रा का यह हिस्सा करीब 3 महीने का था, और इस दौरान नाविकों को भोजन और पानी की कमी का सामना करना पड़ा।

2. केप ऑफ गुड होप को पार किया: नवंबर 1497 में वास्को का बेड़ा दक्षिणी अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप तक पहुंचा। यह समुद्री रास्ता बहुत खतरनाक था, क्योंकि यहां तेज तूफान और ऊंची लहरें थीं। फिर भी, वास्को ने इसे पार किया और पूर्वी अफ्रीका की ओर बढ़े।

3. पूर्वी अफ्रीका में रुकावटों का सामना किया: पूर्वी अफ्रीका में वास्को को कई स्थानीय शासकों और व्यापारियों का विरोध झेलना पड़ा। मोजाम्बिक और मोम्बासा में स्थानीय लोग और अरब व्यापारी पुर्तगालियों पर भरोसा नहीं करते थे, क्योंकि वे अपने व्यापार को खतरे में देख रहे थे। मालिंदी में हालांकि वास्को को एक दोस्ताना सुल्तान मिला, जिसने उन्हें एक अनुभवी नाविक, अहमद इब्न माजिद, की मदद दी। यह नाविक भारत के समुद्री रास्ते को अच्छी तरह जानता था।

4. 1498 में भारत की धरती पर कदम रखा: 27 मई, 1498 को, वास्को डि गामा का बेड़ा भारत के कालीकट (आज का कोझिकोड, केरल) पहुंचा। यह पहली बार था जब कोई यूरोपीय समुद्री रास्ते से भारत आया। कालीकट उस वक्त मसालों का बड़ा व्यापारिक केंद्र था, जिसे जमोरिन (स्थानीय राजा) शासित करता था।

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Image Source : FILEवास्को डि गामा और जमोरिन की मुलाकात।

कालीकट में लोगों ने उड़ाया वास्को का मजाक

वास्को का कालीकट में मिलाजुला स्वागत हुआ। वास्को ने जमोरिन को कुछ सस्ते उपहार, जैसे कपड़े और टोपियां। स्थानीय लोगों ने इनका मजाक उड़ाया क्योंकि वे सोने, चांदी, और मसालों जैसे कीमती सामान की उम्मीद कर रहे थे। कालीकट से व्यापार करने वाले अरब व्यापारी पुर्तगालियों को दुश्मन मानते थे, क्योंकि वे उनके मसाला व्यापार को खत्म कर सकते थे। उन्होंने जमोरिन को वास्को के खिलाफ भड़काने की कोशिश की। एक बार तो अरब व्यापारियों ने वास्को के जहाजों पर हमला करने की साजिश भी रची, लेकिन वास्को सतर्क था और बच निकला।

हिंदुओं के मंदिरों को चर्च समझ बैठा वास्को

वास्को जब भारत पहुंचा तो उसे लगा कि कालीकट के हिंदू मंदिर ईसाई चर्च हैं, क्योंकि उसने वहां मूर्तियां देखीं। उन्होंने स्थानीय लोगों को 'गैर-परंपरागत ईसाई' समझ लिया। दरअसल, इसके पहले उसने कभी हिंदुओं को पूजापाठ करते देखा ही नहीं था। उसका सामना सिर्फ ईसाइयों और मुसलमानों से हुआ था और उसने इसी आधार पर अपनी समझ विकसित की थी।

वास्को की यात्रा का दुनिया पर क्या पड़ा असर?

वास्को ने कालीकट में कुछ महीने बिताए और मसाले जैसे काली मिर्च और दालचीनी खरीदे। वास्को के चार जहाजों में से सिर्फ दो ही पुर्तगाल वापस पहुंचे, और 170 में से केवल 55 लोग जिंदा बचे। उसकी यात्रा ने भारत के इतिहास और समाज पर गहरा असर डाला। वास्को की यात्रा ने भारत में यूरोपीय शक्तियों (पुर्तगाल, फिर डच, अंग्रेज, और फ्रांसीसी) के आने का रास्ता खोला। पुर्तगालियों ने गोवा, दमन, और दीव जैसे इलाकों पर कब्जा किया और वहां अपनी बस्तियां बनाईं। इस यात्रा ने यूरोप और भारत के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरुआत की। पुर्तगालियों ने भारत में ईसाई धर्म का प्रचार शुरू किया, और भारतीय मसाले, कपड़े, और संस्कृति यूरोप पहुंची।

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