नई दिल्ली: इंडिया टीवी के लोकप्रिय शो "कॉफी पर कुरुक्षेत्र" में मंगलवार (2 जून) को इस मुद्दे पर चर्चा हुई कि क्या तृणमूल कांग्रेस खाली हो गई है? क्या ममता बनर्जी अकेली हो गई हैं? चर्चा में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पराशर के साथ मेहमान के रूप में प्रदीप सिंह और मनोज कुमार सिंह (सेफोलॉजिस्ट) मौजूद रहे।
टीएमसी में मची भगदड़
चर्चा में इस बारे में बात हुई कि चुनाव नतीजों के महज 26-27 दिनों बाद टीएमसी में भगदड़ मची हुई है। दो विधायकों को पार्टी से निकाले जाने के बाद उनके साथ 52 विधायकों की बैठक हुई। ममता बनर्जी कोलकाता के केंद्र में धरने पर बैठीं, लेकिन उनके साथ मात्र 5-6 नेता ही दिखे—मदन मित्र, फरहाद हकीम, अशोक देव, शुभमन देव चटर्जी, कल्याण बनर्जी आदि।
आमतौर पर हजारों लोगों के साथ निकलने वाली ममता इस बार अकेली नजर आईं। धरने पर जनता या बड़े नेताओं की भीड़ नहीं उमड़ी। विपक्षी गुट सक्रिय है। ऋतब्रत मुखर्जी को लीडर ऑफ अपोजिशन बनाने की चर्चा है। बागी विधायक स्पीकर को चिट्ठी देने की तैयारी में हैं। कार्यक्रम में बताया गया कि टीएमसी के 80 विधायकों में से कई नाराज हैं और 50-60 के आसपास विधायकों के बागी गुट में शामिल होने की खबरें हैं। कुछ विधायकों ने तो चुनाव काउंटिंग के दिन ही बीजेपी से संपर्क साधने की कोशिश की थी।
महाराष्ट्र मॉडल की आशंका
चर्चा का एक बड़ा हिस्सा यह था कि क्या टीएमसी में एकनाथ शिंदे या अजीत पवार जैसा गठबंधन होगा? क्या कोई नेता पार्टी का नाम और सिंबल ले जाएगा? इस चर्चा पर मेहमानों ने कहा कि बीजेपी सीधे बड़े पैमाने पर टीएमसी नेताओं को नहीं लेना चाहती। उसका लक्ष्य ममता बनर्जी की राजनीति को खत्म करना है, पार्टी को पूरी तरह मिटाना नहीं। रणनीति है—टीएमसी के अंदर बड़ा गुट बनाकर ममता-अभिषेक के प्रभाव को कमजोर करना, फिर धीरे-धीरे और गुट निकालकर पार्टी को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटना। इससे वोट का ध्रुवीकरण होगा और बीजेपी को फायदा मिलेगा।
संकट के मुख्य कारण
मेहमानों ने टीएमसी के पतन के कई आंतरिक कारण गिनाए, जिसमें परिवारवाद और हाईजैक करना शामिल है। ममता बनर्जी ने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में अत्यधिक महत्व दिया। आईपैक के जरिए अभिषेक ने पार्टी चला ली। सांसद-विधायक उनके या उनके स्टाफ से मिलने को तरसते थे। टिकट, राज्यसभा सीट आदि फैसले आईपैक वाले करते थे। इससे पुराने कार्यकर्ता और नेता नाराज हुए।
सिंडिकेट राज और भ्रष्टाचार भी संकट का मूल कारण रहा। टोल बूथ, कटमनी, वसूली की शिकायतें आम थीं। केंद्रीय योजनाओं में कटौती, गुंडागर्दी और दादागिरी के आरोप लगे। संदेशखाली जैसे मुद्दों ने जनता में गुस्सा बढ़ाया। कार्यकर्ताओं से दूरी भी एक बड़ी वजह रही। सत्ता में आने के बाद ममता और अभिषेक दोनों कार्यकर्ताओं से दूर हो गए। चुनाव हारने के बाद भी 26 दिनों तक वे मौन रहे। अभिषेक पर अंडे फेंके गए। ये आंतरिक नाराजगी दर्शाता है।
इसके अलावा विचारधारा की कमी भी एक बड़ा मुद्दा रहा। माना जा रहा है कि टीएमसी कोई जड़ वाली पार्टी नहीं है। सत्ता और स्वार्थ पर टिकी थी। सत्ता जाते ही भगदड़ मच गई।
बीजेपी की रणनीति क्या है?
चर्चा के दौरान ये बात हुई कि बीजेपी टीएमसी नेताओं को सामूहिक रूप से नहीं जोड़ना चाहती क्योंकि इससे उसकी छवि खराब हो सकती है। वह अंदर से तोड़फोड़ को बढ़ावा दे रही है। 45 हिंदू और कुछ मुस्लिम विधायकों के साथ संपर्क की खबरें हैं, लेकिन आधिकारिक तौर पर इनकार किया जा रहा है। शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं का प्रभाव भी बढ़ता दिख रहा है।
ममता का भविष्य क्या है?
कार्यक्रम में मेहमानों का कहना था कि ममता अब 71 साल की हो चुकी हैं। पुरानी स्ट्रीट फाइटर वाली छवि लौट पाना मुश्किल है। अभिषेक उनके लिए सबसे बड़ी लायबिलिटी बने हुए हैं और वे उन्हें अलग नहीं कर पा रही हैं। धरना-प्रदर्शन अब असरदार नहीं लग रहे। पार्टी बचेगी या नहीं, यह सवाल है, लेकिन मौजूदा रूप में टीएमसी का अस्तित्व कमजोर हो गया है।
मेहमानों ने कहा कि पार्टियां अचानक नहीं टूटतीं, लेकिन जब जनाधार और कार्यकर्ता समर्थन चला जाता है तो पतन तेज होता है। टीएमसी में अब डर का माहौल है। पुलिस कार्रवाई, जांच एजेंसियों और भविष्य की अनिश्चितता का डर है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)