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जानें कौन थे समर्थ गुरु रामदास स्वामी ? हर साल इस वजह से मनाई जाती है रामदास नवमी

 Written By: India TV Lifestyle Desk
 Published : Feb 25, 2022 10:57 am IST,  Updated : Feb 25, 2022 10:59 am IST

श्री रामदास नवमी 24 फरवरी को दोपहर 03.04 बजे से शुरू होकर 25 फरवरी को दोपहर 12.57 बजे तक प्रभावी रहेगी।

रामदास स्वामी - India TV Hindi
रामदास स्वामी  Image Source : TWIITER

Highlights

  • 24 फरवरी को दोपहर 03.04 बजे से शुरू होकर 25 फरवरी को दोपहर 12.57 बजे तक प्रभावी रहेगी
  • उन्होंने अपने जीवन का अंतिम समय महाराष्ट्र में सातारा के पास परली के किले पर बिताया
  • इस किले का नाम सज्जनगढ़ पड़ा और वहीं उनकी समाधि भी स्थित है

समर्थ गुरु रामदास स्वामी के भक्तों के लिए आज का दिन बेदह महत्वपूर्ण माना जाता है। रामदास स्वामी ने फाल्गुन कृष्ण नवमी को समाधि ली थी। देश में आज के दिन श्री रामदास नवमी मनाई जा रही है। श्री रामदास नवमी 24 फरवरी को दोपहर 03.04 बजे से शुरू होकर 25 फरवरी को दोपहर 12.57 बजे तक प्रभावी रहेगी। उन्होंने अपने जीवन का अंतिम समय महाराष्ट्र में सातारा के पास परली के किले पर बिताया। तभी से इस किले का नाम सज्जनगढ़ पड़ा और वहीं उनकी समाधि भी स्थित है। कहा जाता है की उन्हें बचपन में ही साक्षात् प्रभु रामचंद्रजी के दर्शन हुए थे। इसलिए उन्होंने अपना नाम रामदास रख लिया था। 

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कौन थे समर्थ गुरु रामदास स्वामी-

समर्थगुरु श्री रामदास स्वामी का जन्म औरंगाबाद जिले के जांब नामक स्थान पर हुआ था। वे बचपन में बहुत शरारती थे। रोज उनकी शिकायत लेकर गांव वाले उनकी माता के पास जाते थे। एक दिन माता राणुबाई ने उनसे कहा, 'तुम दिनभर शरारत करते हो, कुछ काम किया करो। तुम्हारे बड़े भाई गंगाधर अपने परिवार की कितनी चिंता करते हैं। यह बात नारायण के मन में घर कर गई। दो-तीन दिन बाद यह बालक अपनी शरारत छोड़कर एक कमरे में ध्यानमग्न बैठ गया। दिनभर में नारायण नहीं दिखा तो माता ने बड़े बेटे से पूछा कि नारायण कहां है। उन्होंने भी कहा मैंने उसे नहीं देखा। सबने उन्हें तलाशा पर वो नहीं मिले। शाम के समय माता ने कमरे में उन्हें ध्यानस्थ देखा तो उनसे पूछा, 'नारायण, तुम यहां क्या कर रहे हो ?' तब नारायण ने जवाब दिया, 'मैं पूरे विश्व की चिंता कर रहा हूं।' इस घटना के बाद नारायण की दिनचर्या बदल गई। उन्होंने समाज के युवा वर्ग को यह समझाया कि स्वस्थ एवं सुगठित शरीर के द्वारा ही राष्ट्र की उन्नति संभव है। इसलिए उन्होंने व्यायाम एवं कसरत करने की सलाह दी एवं शक्ति के उपासक हनुमानजी की प्रतिमा की स्थापना की। समस्त भारत का उन्होंने पैदल भ्रमण किया। अनेक स्थानों पर हनुमानजी की प्रतिमा की स्थापना की, अनेक मठ एवं मठाधीश बनाए ताकि पूरे राष्ट्र में नव-चेतना का निर्माण हो। वह भगवान राम और भगवान हनुमान के अनुयायी थे। 

संत की शक्ति ऐसी थी कि छत्रपति शिवाजी महाराज भी उनके पीछे हो लिए। उन दोनों ने एक साथ काफी समय बिताया और श्री रामदास ने शिवाजी के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काम किया। उन्होंने उसे ईश्वर का मार्ग दिखाया।

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हर साल मनाई जाती है रामदास नवमी-
हर साल श्री रामदास नवमी के पर देश के विभिन्न हिस्सों से लाखों लोग सज्जनगढ़ किले में आते हैं। समर्थ रामदास के उत्साही अनुयायी और भक्त त्योहार से दो महीने पहले अपने घरों को छोड़ देते हैं। वे विभिन्न स्थानों पर जाते हैं और लोगों से दान मांगते हैं। बदले में उन्हें जो दान मिलता है, उसका उपयोग सज्जनगढ़ किले को सजाने और त्योहार मनाने के लिए किया जाता है। लोग संत रामदास की पूजा करते हैं और श्री रामदास नवमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं।

प्रमुख ग्रंथ-
रामदासजी ने शिवाजी महाराज से कहा, 'यह राज्य न तुम्हारा है न मेरा। यह राज्य भगवान का है, हम सिर्फ न्यासी हैं।' शिवाजी समय-समय पर उनसे सलाह लिया करते थे। रामदास स्वामी ने कई ग्रंथ भी लिखे। इसमें 'दासबोध' प्रमुख है।

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