मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में माहौल बड़ा दिलचस्प हो चला है। जहां एक ओर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आकर रैली कर रहे हैं, देवेंद्र फडणवीस और उद्धव ठाकरे में गुफ्तगू हो रही है वहीं इसी माहौल में ऐसे माहौल में शिवसेना (UBT) नेता अंबादास दानवे का बयान सामने आया है। उन्होंने शिवसेना शिंदे और शिवसेना उद्धव दोनों को फिर से एक साथ आने की अपील की है।
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एक ‘‘मजबूत’’ संगठन टूट गया
अंबादास दानवे ने कहा कि यह बात अब भी खटकती है कि बाल ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना जैसा एक ‘‘मजबूत’’ संगठन टूट गया और इसलिए इसके दोनों गुटों को एक साथ आना चाहिए। दानवे ने कहा, ‘‘संगठन में फूट अब भी खटकती है। किसी ने हमारे संगठन (शिवसेना) पर बुरी नजर डाल दी है।’’
यह जख्म किसी दिन भर जाना चाहिए
दानवे ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘हम सत्ता के लिए पैदा नहीं हुए हैं। यह (सत्ता) आती-जाती रहती है। यह जख्म किसी दिन भर जाना चाहिए। हमारा संगठन मजबूत और एकजुट था। सभी को एक साथ आना चाहिए। हमारी पार्टी सत्ता में होनी चाहिए। एक शिवसैनिक होने के नाते मैं यह महसूस करता हूं।’’ अंबादास दानवे ने कहा कि एकता की उम्मीद करना कोई मुद्दा नहीं है। शिवसेना में 2022 में उस वक्त विभाजन हो गया था। पार्टी के वरिष्ठ नेता और मौजूदा उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बगावत करते हुये 39 विधायकों के साथ अलग गुट बना लिया। इसके बाद, वह भाजपा की अगुवाई वाली राजग में शामिल हो गये।
ऐतिहासिक फूट के पीछे कई कारण
1. हिंदुत्व की विचारधारा से दूरी:
शिवसेना के अंदर विद्रोह का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख कारण रहा। बागी विधायकों का मानना था कि शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन करके बालासाहेब ठाकरे की कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा से भटक गई है। उनका तर्क था कि शिवसेना की स्वाभाविक सहयोगी भाजपा है।
2. महा विकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन में मतभेद:
शिवसेना के कई विधायकों को यह शिकायत थी कि MVA सरकार में असली शक्ति और मलाईदार मंत्रालय NCP और कांग्रेस के पास हैं। बागी गुट का आरोप था कि NCP के मंत्री (विशेषकर तत्कालीन वित्त मंत्री) शिवसेना विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए फंड जारी नहीं कर रहे थे, जिससे उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर हो रही थी।
3. नेतृत्व से नाराजगी और पहुंच की कमी:
बागी विधायकों का कहना था कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अपने ही विधायकों और मंत्रियों से नहीं मिलते थे, जबकि NCP और कांग्रेस के नेताओं को उनसे मिलने में आसानी होती थी। इससे पार्टी के भीतर अलगाव और असंतोष की भावना बढ़ी।
4. एकनाथ शिंदे की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और प्रभाव:
एकनाथ शिंदे शिवसेना के एक कद्दावर नेता थे और ठाणे क्षेत्र में उनका काफी प्रभाव था। उन्हें पार्टी में दरकिनार किए जाने का एहसास हो रहा था। उन्हें लगा कि पार्टी का नेतृत्व उन्हें और उनके समर्थकों को वह महत्व नहीं दे रहा है जिसके वे हकदार थे।
बगावत और सरकार गिरने का घटनाक्रम
20 जून 2022 को विधान परिषद (MLC) चुनावों में क्रॉस-वोटिंग के तुरंत बाद, एकनाथ शिंदे कुछ शिवसेना विधायकों के साथ सूरत (गुजरात) के एक होटल में चले गए। इसके बाद, वे सभी विधायक असम के गुवाहाटी चले गए, जहाँ धीरे-धीरे बागी विधायकों की संख्या बढ़ती गई। शिंदे ने दावा किया कि उनके पास शिवसेना के दो-तिहाई से अधिक विधायक हैं, जो दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए आवश्यक था।
विधायकों के बागी होने से उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली MVA सरकार अल्पमत में आ गई। राज्यपाल ने सरकार को बहुमत साबित करने के लिए फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। उद्धव ठाकरे ने 29 जून 2022 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे MVA सरकार गिर गई। 30 जून 2022 को, एकनाथ शिंदे ने भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री बने।इस फूट के बाद, शिवसेना दो गुटों में बंट गई थी।
इनपुट-भाषा