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मौसमी बीमारियों के बीच पंजाब में राहत बनी ‘मुख्यमंत्री सेहत योजना’, लोगों को भगवंत मान सरकार का बड़ा सहारा

 Edited By: Dhyanendra Chauhan
 Published : May 27, 2026 03:28 pm IST,  Updated : May 27, 2026 03:39 pm IST

पंजाब में मौसमी बुखार के मामले बढ़ने के साथ ही 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' हजारों लोगों के लिए कैशलेस इलाज सुनिश्चित कर रही है। पंजाब में 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' के तहत सबसे ज्यादा क्लेम 'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' के लिए किए गए।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान- India TV Hindi
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान Image Source : PTI

बदलते तापमान और उमस भरी गर्मी के आगमन के साथ ही पूरे पंजाब में एक जानी-पहचानी बेचैनी भी लौट आई है। सरकारी अस्पताल, जो पहले से ही रोजमर्रा की बीमारियों से राहत पाने आए मरीजों से भरे रहते हैं, अब बुखार से जुड़ी बीमारियों, सांस की तकलीफों और पेट के विकारों के नए मामलों में तेजी देख रहे हैं। यह मौसमी बीमारियों की ऐसी लहर है, जो डॉक्टरों के अनुसार, हर साल एक चिंताजनक नियमितता के साथ लौट आती है।

'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' (तेज बुखार वाली बीमारी) कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक चिकित्सीय स्थिति है जिसकी पहचान अचानक तेज बुखार आने से होती है। यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार, ऐसी बीमारियां वायरल, बैक्टीरियल या परजीवी संक्रमणों के कारण हो सकती हैं। कई मामलों में, मरीज आउटपेशेंट डिपार्टमेंट (OPD) में बुखार को ही अपना मुख्य लक्षण बताकर आते हैं, जबकि उनके शरीर में मौजूद असली संक्रमण शुरुआती चरणों में पकड़ में नहीं आ पाता।

'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' के 5,840 मामले दर्ज

पंजाब की 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' के हालिया आंकड़े बताते हैं कि पिछले चार महीनों में, 'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' कैशलेस इलाज के क्लेम की सबसे बड़ी श्रेणियों में से एक बनकर उभरी है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA) से प्राप्त हालिया डेटा के अनुसार, पंजाब में 'एक्यूट फेब्राइल इलनेस' के 5,840 मामले दर्ज किए गए, जिनके क्लेम का भुगतान 1.31 करोड़ रुपये के चौंकाने वाले आंकड़े तक पहुंच गया।

इसके अलावा, ये आंकड़े जल-जनित (पानी से फैलने वाली) और सांस से जुड़ी बीमारियों के मामलों को भी दर्शाते हैं। 'एंटेरिक फीवर' (आंत्र ज्वर) के 1,396 मामले दर्ज किए गए, जिनके क्लेम की राशि 30.47 लाख रुपये थी। इसके बाद 'निमोनिया' के 377 मामले सामने आए, जिन पर 11.06 लाख रुपये खर्च हुए, जबकि 'एक्यूट ब्रोंकाइटिस' के 326 मामले दर्ज किए गए, जिन पर 9.24 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च आया। 

चिंता का मुख्य कारण बनती हैं बीमारियां

दिलचस्प बात यह है कि जो बीमारियां अक्सर मॉनसून के महीनों में लोगों की चिंता का मुख्य कारण बनती हैं, वे इस बार अपेक्षाकृत सीमित ही रहीं। इनमें 'डेंगू बुखार' शामिल है, जिसके 12 मामले दर्ज किए गए और क्लेम की राशि 40,880 रुपये रही। 'मलेरिया' के केवल 3 मामले और 'चिकनगुनिया' के 6 मामले सामने आए। 'हीट स्ट्रोक' (लू लगने) के केवल 4 मामले दर्ज किए गए, जो इस डेटासेट में अत्यधिक गर्मी के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की अपेक्षाकृत कम संख्या को दर्शाता है।

हालांकि, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस स्थिति को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही न बरतने की चेतावनी देते हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के एक अध्ययन से पता चलता है कि मौसमी बीमारियां बारिश, मच्छरों के पनपने और स्थानीय साफ-सफाई की स्थितियों के आधार पर तेजी से बदल सकती हैं।

जानिए क्या बोले डॉक्टर

पटियाला के सिविल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉक्टर विकास गोयल ने कहा कि मौजूदा रुझान हर साल OPD में देखे जाने वाले 'अनुमानित मौसमी बोझ' को दिखाता है। उन्होंने आगे कहा कि ज्यादातर मामलों का इलाज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर ही किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि बहुत ज्यादा गर्मी के कारण तेज बुखार, उल्टी, दस्त, सिरदर्द, सांस की बीमारियां और त्वचा या आंखों की एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं। अक्सर, जब लोग गर्मी के कारण डॉक्टर से सलाह लेने में देर करते हैं, तो ये समस्याएं और भी गंभीर हो जाती हैं।

डॉक्टर विकास गोयल ने कहा कि 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' एक बड़ा सहारा बन सकती है। इसके तहत मरीज बिना किसी आर्थिक बोझ के अस्पताल में भर्ती होकर कैशलेस इलाज करवा सकते हैं। उन्होंने समझाया, 'यह योजना यह पक्का करती है कि लोगों को पहले से पैसे का इंतजाम करने की चिंता किए बिना, सही समय पर डॉक्टर की सलाह और इलाज मिल सके।' डॉक्टर विकास गोयल ने बताया, 'इस योजना के तहत तुरंत बीमारी का पता चलने और इलाज होने से कई लोगों की जान बचाई जा सकती है, क्योंकि मरीज़ पैसे की चिंता के कारण इलाज करवाने में देर नहीं करते।'

नवजात शिशु और छोटे बच्चों को संक्रमण का खतरा ज्यादा

बहुत ज्यादा गर्मी और उमस के मौसम में बच्चे खास तौर पर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। फरीदकोट के गुरु गोबिंद सिंह मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख डॉक्टर शशि कांत धीर ने चेतावनी दी है कि नवजात शिशु और छोटे बच्चों को संक्रमण होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। डॉक्टर शशि कांत धीर के अनुसार, इसके चेतावनी भरे लक्षणों में दूध न पीना, बार-बार उल्टी होना, तेज सांस लेना, शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन), दौरे पड़ना और लगातार बुखार रहना शामिल हैं। इन लक्षणों को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर शशि कांत धीर ने कहा, 'तीन महीने से कम उम्र के किसी भी बच्चे को बुखार होने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।'

आंगनवाड़ी कर्मचारियों और स्कूलों की भूमिका पर भी जोर

डॉक्टर शशि कांत धीर ने जागरूकता अभियान, साफ-सफाई की शिक्षा, टीकाकरण अभियान और मच्छरों को रोकने के उपायों के जरिए बीमारियों को फैलने से रोकने में माता-पिता, आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कर्मचारियों और स्कूलों की भूमिका पर भी जोर दिया।

फिलहाल, जब पंजाब एक और लंबी गर्मी के मौसम का सामना करने के लिए तैयार हो रहा है, तो अस्पतालों के गलियारों में उमड़ी भीड़ इस बात की याद दिलाती है कि मौसमी बीमारियां किस तरह परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, दोनों की ही परीक्षा लेती रहती हैं।

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