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Shani Jayanti: क्या है शनि कवच? इसका पाठ करने से जीवन की हर बाधा से मिल जाएगी मुक्ति

 Written By: Naveen Khantwal
 Published : Jun 05, 2024 04:02 pm IST,  Updated : Jun 05, 2024 06:44 pm IST

शनि जयंती 2024 में 6 जून को है, इस दिन अगर आप शनि कवच का पाठ करते हैं तो जीवन की कई विपत्तियों से आपको मुक्ति मिल सकती है।

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Shani Jayanti 2024: शनि ग्रह के बुरे परिणामों से बचने के लिए कई उपाय लोग करते हैं। लेकिन शनि जयंती के दिन इन उपायों को करने से विशेष लाभ व्यक्ति को प्राप्त हो सकते हैं। साल 2024 में शनि जयंती 6 जून को मनाई जा रही है। इस दिन शनि ग्रह के कई उपायों में से एक है शनि कवच का पाठ करना। शनि कवच क्या है, इसके पाठ से कैसे परिणाम आपको प्राप्त हो सकते हैं आइए विस्तार से जानते हैं। 

शनि कवच क्या है?

ऐसा माना जाता है कि शनि कवच एक तरह की अदृश्य शक्ति या कवच है। इसका पाठ करने से व्यक्ति को भय से मुक्ति मिलती है और शनि ग्रह के बुरे प्रभाव भी ऐसे लोगों पर नहीं पड़ते। इस कवच का पाठ अगर कोई व्यक्ति शनि जयंती के दिन करता है तो उसके जीवन समृद्धि आती है। इस कवच का पाठ आपको शनि जयंती के दिन सूर्यास्त के बाद करना चाहिए। पाठ करने के लिए सबसे अच्छी जगह यूं तो शनि मंदिर ही मानी जाएगी, लेकिन अगर आप मंदिर न जा सकते तो घर में किसी एकांत स्थान में बैठकर आपको शनि कवच का पाठ करना चाहिए।  

शनि कवच पाठ के लाभ 

शनि कवच का पाठ करने से रोग, विपत्ति और कष्टों से आपको छुटकारा प्राप्त हो सकता है। इसके साथ ही शनि देव की कृपा से आपको पारिवारिक जीवन और करियर में भी उन्नति प्राप्त होती है। जो लोग मानसिक समस्याओं से परेशान हैं उनके लिए शनि कवच का पाठ बेहद शुभ माना जाता है। वैसे तो इसका पाठ नियमित रूप से या हर शनिवार के दिन आप कर सकते हैं, लेकिन शनि जयंती के दिन इसका पाठ करने से जीवन की सभी दुख विपदाएं दूर हो सकती हैं। शनि कवच का पाठ करने से साढ़ेसाती और ढैय्या के बुरे प्रभाव भी कम हो जाते हैं। साथ ही दुर्घटनाओं, अचाानक से होने वाले खर्चों से भी आप निजात पा सकते हैं।  

शनि कवच

नीलाम्बरो नीलवपु: किरीटी गृध्रस्थितत्रासकरो धनुष्मान्।

चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रसन्न: सदा मम स्याद्वरद: प्रशान्त:।।

श्रृणुध्वमृषय: सर्वे शनिपीडाहरं महंत्।
कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम्।।

कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम्।
शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम्।।

ऊँ श्रीशनैश्चर: पातु भालं मे सूर्यनंदन:।
नेत्रे छायात्मज: पातु कर्णो यमानुज:।।

नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा।
स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठ भुजौ पातु महाभुज:।।

स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु शुभप्रद:।
वक्ष: पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्थता।।

नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा।
ऊरू ममाSन्तक: पातु यमो जानुयुगं तथा।।

पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल:।
अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दन:।।

इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य य:।
न तस्य जायते पीडा प्रीतो भवन्ति सूर्यज:।।

व्ययजन्मद्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोSपि वा।
कलत्रस्थो गतोवाSपि सुप्रीतस्तु सदा शनि:।।

अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे।
कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्।।

इत्येतत् कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा।
जन्मलग्नस्थितान्दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभु:।।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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