ढाका: जब एक फर्जी पोस्ट, एक अफवाह या बिना पुख्ता सबूत का आरोप, भीड़ को 'ईशनिंदा' जैसा हथियार थमा दे, तो इंसाफ नहीं मिलता बल्कि इंसानों की जिंदगियां तबाह हो जाती हैं। बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हुई हिंसा की ये वारदातें बताती हैं कि कैसे मनगढ़ंत झूठे आरोप, प्रशासनिक सुस्ती और भीड़ की मानसिकता ने मिलकर पूरे के पूरे गांवों को उजाड़ दिया। हिंदुओं को जान बचाने के लिए अपने घर छोड़ने पड़े। उनको घरों को लूटा गया और जला दिया गया। ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज के मुताबिक, ऐसे तमाम मामले हैं जहां हिंदुओं पर जो आरोप लगाकर मारा गया, उनके घर उजाड़े गए, वो बाद में झूठे निकले। आइए बांग्लादेश के ऐसे मामलों के बारे में जानते हैं।
हिंदुओं के गांव पर सबसे भयानक हमला!
सुनामगंज के शाल्ला में हैक किए गए एक फेसबुक पोस्ट के बाद पूरे हिंदू गांव तबाह कर डाला गया। उनके घरों में लूटपाट हुई और उनमें आग लगा दी गई। सुनामगंज की घटना को हाल के सालों में अल्पसंख्यकों पर हुए सबसे क्रूर हमलों में से एक माना जाता है। दावा है कि शाल्ला, सुनामगंज के हमले के दौरान 400 से ज्यादा अल्पसंख्यक परिवारों को निशाना बनाया गया। उनके घरों को लूटने के बाद तोड़ दिया गया।
22 हिंदू घरों को दंगाइयों ने तोड़ डाला
रंगपुर के गंगाचरा की घटना में एक 17 साल के हिंदू किशोर पर पहले आरोप लगाए गए और बाद में 22 अल्पसंख्यकों के घरों में तोड़फोड़ हुई। इसकी वजह से सभी परिवारों को रातोंरात अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। जान बचान के लिए उनके पास दूसरा कोई रास्ता नहीं था।
खुलना और बरिशाल की घटना
डाकोप की घटना में सबूत थे कि मुस्लिम व्यक्ति ने हिंदुओं की आराध्य देवी काली का अपमान किया, लेकिन इस मामले में गिरफ्तार हिंदू पक्षकार पुरबायन मंडल को किया गया। जबकि असली आरोपी पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। वहीं, बरिशाल के गौरनदी में एक नाबालिग हिंदू युवक को बिना पुख्ता सबूत के तुरंत अरेस्ट कर लिया गया।
जब एक पैटर्न को फॉलो करके 4 जगह हुए हमले
मौलवीबाजार, फरीदपुर, चांदपुर और कुमिल्ला जैसे जिलों में बिकाश धर दीप्तो, सागर मंडल, शुभो और नारायण दास से जुड़े मामलों में एक बेहद चिंताजनक पैटर्न सामने आया। इसमें पहले आरोप लगता है, फिर एकदम से भीड़ इकट्ठा होती है, इसके बाद पुलिस, अल्पसंख्यक व्यक्ति को बिना पुख्ता जांच के हिरासत में लेती है और फिर अल्पसंख्यक घरों व गांवों पर हिंसक हमले होने लगते हैं।
सबूतों के अभाव या विरोधाभासी होने के बाद भी, अल्पसंख्यक परिवारों को धमकी दी गई। अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया।
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