ईरान में खराब होती अर्थव्यवस्था और मुद्रा 'रियाल' की गिरती कीमत को लेकर भड़के विरोध-प्रदर्शनों ने अब हिंसक रूप ले लिया है। एक सप्ताह से जारी इस उथल-पुथल के बीच ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने चुप्पी तोड़ते हुए सुरक्षा बलों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही है। यह तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी। इसके साथ ही, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो (जो ईरान के करीबी सहयोगी हैं) को पकड़ने का दावा किया।
"दंगाइयों को उनकी जगह दिखानी होगी"
86 वर्षीय सर्वोच्च नेता खामेनेई ने सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित एक संबोधन में प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों के बीच स्पष्ट अंतर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, "अधिकारियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से बात करनी चाहिए, लेकिन दंगा करने वालों से बात करने का कोई फायदा नहीं है। उन्हें उनकी जगह दिखानी होगी।" खामेनेई ने दावा किया कि इजराइल और अमेरिका जैसी विदेशी ताकतें ईरान में अशांति फैला रही हैं। उन्होंने रियाल की गिरती कीमत के लिए भी "दुश्मनों" को जिम्मेदार ठहराया।
हिंसा में अब तक 10 की मौत
ईरान के 31 में से 22 प्रांतों में प्रदर्शन फैल चुके हैं। शनिवार रात हुई ताजा हिंसा में दो और लोगों की मौत के साथ कुल मृतकों की संख्या 10 पहुंच गई है। शिया मदरसों के गढ़ माने जाने वाले कोम शहर में एक ग्रेनेड फटने से एक व्यक्ति की मौत हो गई। सरकारी मीडिया का दावा है कि वह व्यक्ति लोगों पर हमला करने के लिए ग्रेनेड ले जा रहा था। वहीं, हरसिन में रिवोल्यूशनरी गार्ड की 'बासिज' विंग का एक सदस्य बंदूक और चाकू के हमले में मारा गया।
डोनाल्ड ट्रंप ने दी चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को चेतावनी दी थी कि यदि तेहरान ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हत्या की, तो अमेरिका उनकी मदद के लिए आगे आएगा। इसके ठीक बाद शनिवार को ट्रंप द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी की घोषणा ने ईरान के नेतृत्व को और अधिक चौकन्ना कर दिय है। ईरानी अधिकारियों ने जवाबी कार्रवाई के रूप में मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने की धमकी दी है।
2022 के बाद का सबसे बड़ा प्रदर्शन
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, 100 से अधिक स्थानों पर प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि यह 2022 के महसा अमीनी विरोध प्रदर्शन जितना तीव्र नहीं है, लेकिन आर्थिक बदहाली और रियाल के ऐतिहासिक गिरावट ने आम जनता के गुस्से को चरम पर पहुंचा दिया है।
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