-1B Visa : अमेरिका में H-1B वीजा लॉटरी के सिलेक्शन रेट इस साल बड़ा बदलाव देखने को मिला है। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नई आप्रवासन नीतियों के चलते H-1B वीजा का सिलेक्शन रेट कई मामलों में बढ़कर 75% तक पहुंच गया है। पहले जहां यह दर करीब 33 प्रतिशत के आसपास रहती थी, वहीं इस साल अधिकांश आवेदकों के लिए यह 50 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई।
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क्या कहती है ब्लूमबर्ग लॉ की रिपोर्ट?
ब्लूमबर्ग लॉ की रिपोर्ट को मानें तो सिलेक्शन रेट में इस भारी उछाल के पीछे सबसे बड़ी वजह वजह आवेदनों की संख्या में आई भारी गिरावट है। कई प्रमुख इमिग्रेशन लॉ फर्मों और कंपनियों ने इस साल लॉटरी में पहले के मुकाबले कहीं बेहतर सफलता दर दर्ज की है। ट्रंप प्रशासन द्वारा विदेशी भर्ती पर लगाई गई एक लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस ने अंतरराष्ट्रीय भर्ती को बेहद महंगा बना दिया है। इसके चलते कई अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और टेक कंपनियों ने विदेश से नए कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना कम कर दिया है।
ब्लूमबर्ग लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले चुनने की संभावनाएं हर तीन में से एक के आस-पास, यानी लगभग 33 प्रतिशत रहती थीं। हालांकि, इस साल कई जानी-मानी इमिग्रेशन लॉ फ़र्मों और सेवा देने वालों ने बताया कि हर तरफ चुनने की दर 50 प्रतिशत से काफ़ी ज़्यादा रही। Berry Appleman & Leiden (BAL) के कुछ क्लाइंट्स के लिए चयन दर 60% से ऊपर रही, जबकि Ogletree Deakins, Erickson Immigration Group और Boundless Immigration जैसी फर्मों ने भी बेहतर नतीजे दर्ज किए। उच्च वेतन और मास्टर्स डिग्री वाले आवेदकों के लिए यह दर कई मामलों में 75 प्रतिशत से अधिक रही।
ट्रंप प्रशासन की H-1B नीतियों ने वीज़ा चुनने की दरों को कैसे बढ़ाया?
मंज़ूरी दरों में यह बढ़ोतरी किसी इत्तेफ़ाक या अचानक नहीं हुई। बल्कि, यह ट्रंप प्रशासन की उन नीतियों का असर है जिन्होंने H-1B कार्यक्रम को नया रूप दिया है। प्रशासन ने एक नईweighted lottery system शुरू की थी, जिसे ज़्यादा वेतन पाने वाले और ज़्यादा अनुभवी कर्मचारियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन सिलेक्शन रेट को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका आवेदकों की कुल संख्या में आई भारी कमी ने निभाई। इसके पीछे मुख्य वजह व्हाइट हाउस द्वारा अमेरिका के बाहर से हायर किए गए सभी नए H-1B कर्मचारियों पर लगाई गई 100,000 डॉलर की फीस थी।
इस भारी फीस ने कई एम्प्लॉयर्स के लिए इंटरनेशनल हायरिंग को बहुत ज़्यादा महंगा बना दिया। इसने यूनिवर्सिटीज़ और हॉस्पिटल्स द्वारा विदेश से होने वाली ज़्यादातर नई हायरिंग को लगभग रोक ही दिया; ये ऐसे सेक्टर थे जो लंबे समय से H-1B वीज़ा प्रोग्राम पर निर्भर थे। टेक कंपनियों और दूसरे बिज़नेस, जो सालाना वीज़ा कैप के दायरे में आते थे, उन्होंने विदेश से कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना काफी हद तक बंद कर दिया। ब्लूमबर्ग लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, यह वह ग्रुप था जिसका हाल के सालों में नए H-1B कर्मचारियों में लगभग 40% हिस्सा था। नतीजतन, लॉटरी रजिस्ट्रेशन की कुल संख्या में भारी गिरावट आई।
इस बार कितने आवेदन आए?
ब्लूमबर्ग लॉ द्वारा बताई गई इमिग्रेशन लॉ फर्म 'लॉफुली' के अनुमानों के मुताबिक, इस बार H-1B वीज़ा के लिए 195,000 से 235,000 के बीच आवेदन आए जो पिछले साल के मुकाबले 43 प्रतिशत तक की गिरावट है और 2020 में ऑनलाइन लॉटरी सिस्टम शुरू होने के बाद से सबसे कम आंकड़ा है। सिर्फ़ तीन साल पहले, इस वीज़ा कैटेगरी के लिए आवेदन करने वालों की संख्या 750,000 से ज़्यादा थी।
अब, सालाना कैप के तहत सिर्फ़ 85,000 वीज़ा उपलब्ध होने के कारण, आवेदकों का यह छोटा पूल स्वाभाविक रूप से चयन की ज़्यादा संभावनाओं में बदल गया। इसके अलावा, नई “वेटेड लॉटरी सिस्टम” भी लागू किया गया है, जिसमें उच्च वेतन और अनुभवी पेशेवरों को प्राथमिकता दी जाती है। इससे फ्रेशर्स की तुलना में सीनियर और हाई-स्किल्ड उम्मीदवारों को ज्यादा फायदा मिला है।
टेक सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में बढ़ते निवेश और सीनियर रोल्स पर फोकस के चलते भी H-1B वीजा की मांग में कमी आई है। कई कंपनियों ने नीतिगत अनिश्चितता के कारण इस साल लॉटरी में भाग लेने से परहेज किया।हालांकि, इस 1 लाख डॉलर शुल्क को लेकर अमेरिकी अदालतों में कई याचिकाएं लंबित हैं। आने वाले समय में अदालतों के फैसले और नए नियम H-1B वीजा प्रोग्राम की दिशा तय करेंगे। अब कानूनी अड़चनें दूर होने के बाद ही यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकेगा कि ट्रंप की नीतियां कितनी सफल रहीं।