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अमेरिका की नई चाल हुई फेल? H-1B पर $100000 की फीस भी नहीं रोक पाएगी भारतीयों की राह! नई स्टडी का चौंकाने वाला दावा

Edited By: Shivendra Singh Published : Feb 12, 2026 06:56 am IST, Updated : Feb 12, 2026 06:56 am IST

अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर सख्ती बढ़ाने की चर्चा के बीच एक नई स्टडी ने बहस को नया मोड़ दे दिया है। प्रस्ताव है कि हर H-1B कर्मचारी को हायर करने पर कंपनियों से 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) की भारी फीस वसूली जाए, ताकि विदेशी स्किल्ड लेबर पर कॉर्पोरेट निर्भरता कम हो।

H-1B वीजा पर महंगी पड़ेगी...- India TV Paisa
Photo:CANVA H-1B वीजा पर महंगी पड़ेगी नौकरी?

अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। विदेशी कुशल श्रमिकों पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिकी नीति-निर्माताओं के बीच यह प्रस्ताव चर्चा में है कि कंपनियों से हर H-1B कर्मचारी के लिए 1 लाख डॉलर की भारी-भरकम फीस वसूली जाए। माना जा रहा था कि इससे कंपनियां विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीय आईटी इंजीनियरों को कम हायर करेंगी। लेकिन एक नई स्टडी ने इस सोच पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

इकोनॉमिस्ट जॉर्ज बोरजास की रिसर्च ‘The H-1B Wage Gap, Visa Fees and Employer Demand’ के मुताबिक, इतनी बड़ी फीस भी कंपनियों की मांग को खास प्रभावित नहीं करेगी। अध्ययन में पाया गया है कि औसतन H-1B कर्मचारी समान योग्यता और एक्सपीरिएंस वाले अमेरिकी नागरिकों की तुलना में करीब 16% कम वेतन पाते हैं। यही वेतन अंतर कंपनियों के लिए बड़ी बचत का कारण बनता है।

बड़ी टेक कंपनियों बनाम आईटी सर्विस फर्म

रिपोर्ट बताती है कि मेटा, एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और टेस्ला जैसी बड़ी टेक कंपनियों में वेतन अंतर बेहद कम है। यहां H-1B प्रोफेशनल्स का औसत वेतन 1.5 लाख डॉलर के आसपास है। लेकिन भारतीय मूल की आईटी सर्विस कंपनियां जैसे इंफोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल में यह अंतर ज्यादा है। कई मामलों में H-1B कर्मचारियों को करीब 80,000 डॉलर का वेतन मिलता है, जो समान अमेरिकी कर्मचारियों से काफी कम है।

केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं

चौंकाने वाली बात यह है कि यह वेतन अंतर सिर्फ बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों तक सीमित नहीं है। लगभग 75% H-1B हायरिंग टॉप 25 कंपनियों के बाहर होती है। यहां तक कि जिन कंपनियों ने सिर्फ एक H-1B कर्मचारी रखा, वहां भी औसतन 18.5% का वेतन अंतर दर्ज किया गया।

$100000 फीस क्यों बेअसर?

स्टडी के मुताबिक, छह साल की वीजा अवधि में एक H-1B कर्मचारी से कंपनियां लगभग 1 लाख डॉलर तक की पेरोल बचत कर लेती हैं। यानी अगर 1 लाख डॉलर की फीस लग भी जाए, तो वह इस बचत के बराबर ही होगी और कंपनियों का फायदा खत्म नहीं होगा। बोरजास का कहना है कि 1.5 से 2 लाख डॉलर की फीस भी हायरिंग पर बड़ा असर नहीं डाल पाएगी, क्योंकि कंपनियों के लिए कुशल विदेशी कर्मचारियों की रणनीतिक अहमियत बनी रहेगी।

भारतीय पेशेवरों पर असर

H-1B वीजा धारकों में बड़ी संख्या भारतीयों की है, खासकर सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की। टेक सेक्टर में H-1B वर्कफोर्स का बड़ा हिस्सा भारतीय इंजीनियरों का है। ऐसे में यह स्टडी संकेत देती है कि भारी फीस के बावजूद भारतीय पेशेवरों की मांग बनी रह सकती है।

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