हिंदी में MBBS की पढ़ाई को लेकर बोले डॉक्टर, इससे क्षमता बढ़ेगी लेकिन....

हिंदी और क्षेत्रीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई को लेकर IMA के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जे.ए.जयलाल ने अपनी राय रखी उन्होंने कहा कि इससे बच्चों की नॉलेज और स्किल का दायरा सीमित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर आप क्षेत्रीय भाषा में ट्रेनिंग देते हैं, तो आप अपने नॉलेज और स्किल को अपडेट नहीं कर सकेंगे।

Shailendra Tiwari Edited By: Shailendra Tiwari @@Shailendra_jour
Updated on: November 20, 2022 22:28 IST
क्षेत्रीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई से सीमित हो जाएगा दायरा- India TV Hindi
Image Source : FILE PHOTO (PTI) क्षेत्रीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई से सीमित हो जाएगा दायरा

हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई अभी शुरू होने की घोषणा हुई ही थी कि कुछ डॉक्टरों ने इस फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई को लेकर डॉक्टरों का मानना है कि, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हिंदी में मेडिकल एजुकेशन प्रदान करने के लिए उठाए गए कदम से शुरुआत में ग्रामीण छात्रों को मदद मिल सकती है, लेकिन यह उनके विकास और ज्ञान के दायरे को काफी सीमित कर देगा। अभी अक्टूबर में ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हिंदी में मेडिकल एजुकेशन देने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना के हिस्से के रूप में MBBS कोर्स के प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए हिंदी में तीन विषयों की पाठ्यपुस्तक जारी की थी, जो कि देश में पहली बार हुआ।

शाह ने यह भी कहा कि देश में आठ अन्य भाषाओं में तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा शुरू करने पर काम चल रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश भर के छात्रों को अपनी भाषाई हीन भावना से बाहर आना चाहिए और अपनी भाषा में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए। 

नॉलेज और स्किल को नहीं हो सकेगी अपडेट

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जे.ए.जयलाल के मुताबिक, शाह ने कहा हो सकता है कि छात्रों की क्षमता "बढ़ेगी" लेकिन, इसके विपरीत, यह उनके विकास को रोक सकता है। "हम जिस बारे में बात कर रहे हैं वह आधुनिक चिकित्सा है, यह यूनिवर्सल मेडिसिन है। यह केवल भारत में ही नहीं, पूरे विश्व में प्रचलित है। यदि आप एक क्षेत्रीय भाषा में ट्रेनिंग देते हैं, तो आप पढ़ने और अपने नॉलेज और स्किल को अपडेट करने के लिए बाहर जाने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

केवल किताबों से नहीं होती मेडिकल की पढ़ाई

उन्होंने कहा कि मेडिकल एजुकेशन केवल किताबों के माध्यम से नहीं सिखाई जा सकती है, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों, पत्रिकाओं और लेखों को बार-बार पढ़ना भी जरूरी है, जो सभी अंग्रेजी में होते हैं। उन्होंने कहा कि "यह ठीक रहेगा यदि आप स्थानीय समुदाय स्तर पर रहने जा रहे हैं और कभी भी वैश्विक समुदाय से नहीं जुड़ेंगे। बुनियादी समझ आप एक क्षेत्रीय भाषा में दे सकते हैं, लेकिन अगर आप अपने स्किल को अपडेट करना चाहते हैं, तो यह आपकी मदद नहीं कर सकता।"

पहले चरण में जारी हुई थी हिन्दी में तीन किताबें

बता दें कि पहले चरण में मेडिकल बायोकैमिस्ट्री, एनाटॉमी और मेडिकल फिजियोलॉजी पर हिंदी पाठ्यपुस्तकें जारी की गई हैं। मध्य प्रदेश की अगुवाई के बाद, उत्तराखंड सरकार ने भी अगले शैक्षणिक सत्र से इसी तरह के उपायों को लागू करने की घोषणा की है। राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत के अनुसार मध्य प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों में एमबीबीएस हिन्दी के पाठ्यक्रम का अध्ययन कर महाविद्यालयों के लिए नये पाठ्यक्रम का प्रारूप समिति तैयार करेगी।

तमिल में भी शुरू होनी है पढ़ाई

पिछले हफ्ते, तमिलनाडु के उच्च शिक्षा मंत्री के पोनमुडी ने भी कहा था कि राज्य सरकार अब तमिल में एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरू करने में शामिल है और इस संबंध में तीन प्रोफेसरों की एक समिति बनाई गई थी।

शिक्षा में सुधार पर ध्यान देना चाहिए

एमबीबीएस डॉक्टर और आईएमए-जूनियर डॉक्टर्स नेटवर्क के राष्ट्रीय सचिव करण जुनेजा ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा देने के बजाय सरकार को बुनियादी ढांचे और स्कूली शिक्षा में सुधार पर ध्यान देना चाहिए। “हमने ऐसे छात्रों को देखा है जो ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, बिना किसी अंग्रेजी पृष्ठभूमि के, विषयों और भाषा के साथ अच्छी तरह से प्रबंधन करते हैं। वे पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और खुद को सुधारते हैं। उन्हें हिंदी या किसी अन्य भाषा में शिक्षा देना उनके विकास के लिए नुकसानदेय होगा।

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