- फिल्म रिव्यू: एक्यूज्ड
- स्टार रेटिंग: 2 / 5
- पर्दे पर: 27/02/2025
- डायरेक्टर: अनुभूति कश्यप
- शैली: साइकोलॉजिक, सस्पेंस, मिस्ट्री थ्रिलर
अनुभूति कश्यप के निर्देशन में बनी फिल्म ‘एक्यूज्ड’ 27 फरवरी को नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हुई। यह फिल्म एक ऐसे विषय को उठाती है जो समाज और वर्कप्लेस के लिए हमेशा से संवेदनशील रहा है- यौन उत्पीड़न। अपनी पहली फिल्म 'डॉक्टर जी' में एक गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट के अकेले पुरुष डॉक्टर के संघर्ष को दिखाने के बाद अनुभूति एक बार फिर चिकित्सा जगत की पृष्ठभूमि में लौटी हैं। हालांकि इस बार कहानी का सुर और मिजाज गंभीर है, लेकिन क्या यह अपनी गंभीरता को अंत तक बनाए रख पाती है? आइए जानते हैं इस फिल्म रिव्यू में।
कहानी की पृष्ठभूमि
कहानी लंदन के एक प्रतिष्ठित अस्पताल में कार्यरत डॉ. गीतिका सेन (कोंकणा सेन शर्मा) के इर्द-गिर्द घूमती है। गीतिका एक सम्मानित गायनेकोलॉजिस्ट हैं। उनकी शादी डॉ. मीरा (प्रतिभा रान्टा) से हुई है, जो एक पीडियाट्रिशियन हैं। यह कपल एक आदर्श और खुशहाल जिंदगी जी रहा है और जल्द ही एक बच्चा गोद लेने की योजना बना रहा है। उनकी जिंदगी में सबकुछ वैसा ही है जैसा वे चाहते थे, लेकिन एक सुबह अस्पताल के HR विभाग को मिले एक गुमनाम ईमेल ने सब कुछ बदल कर रख दिया। इस ईमेल में डॉ. गीतिका पर सेक्शुअल मिसकंडक्ट का गंभीर आरोप लगाया गया था। दावा किया गया कि ईमेल भेजने वाला शख्स गीतिका का शिकार था। रातों-रात गीतिका दूसरों की जान बचाने और सम्मान पाने के लिए जानी जाती थीं, वे एक अपराधी की तरह देखी जाने लगीं। जैसे-जैसे जांच शुरू हुई, शिकायतों की झड़ी लग गई और मामला अस्पताल की चारदीवारी से बाहर निकलकर व्यक्तिगत संबंधों तक जा पहुंचा।
भारी थीम, लेकिन हल्का ट्रीटमेंट
‘एक्यूज्ड’ के साथ सबसे बड़ी समस्या इसकी ट्रीटमेंट है। फिल्म एक ऐसे मुद्दे को उठाती है जिसमें गहराई की बहुत गुंजाइश थी, लेकिन फिल्म आगे बढ़ने के बजाय पीछे हटती हुई महसूस होती है। जब आप यौन उत्पीड़न जैसे भारी विषय पर फिल्म बनाते हैं तो दर्शक उम्मीद करते हैं कि फिल्म उस मनोवैज्ञानिक दबाव और सामाजिक कलंक को गहराई से दिखाएगी। हालांकि यहां कहानी सतही होकर रह जाती है। लंदन की पृष्ठभूमि और एक हाई-प्रोफाइल अस्पताल की सेटिंग के बावजूद, फिल्म का नैरेटिव वह 'अर्जेंसी' या तनाव पैदा करने में विफल रहता है जिसकी एक थ्रिलर ड्रामा में जरूरत होती है। फिल्म में ऐसे कई पल हैं जो बेहद ड्रामैटिक और प्रभावी हो सकते थे, लेकिन वे पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए। ऐसा लगता है जैसे निर्देशक ने एक जटिल मानवीय व्यवहार को दिखाने के बजाय एक सुरक्षित रास्ता चुन लिया है।
मिस्ट्री जो अपनी चमक खो देती है
फिल्म के दूसरे हाफ में जब पूर्व-पत्रकार जयदीप भार्गव (मशहूर अमरोही) जांच का जिम्मा संभालते हैं तो फिल्म एक Who-done-it मिस्ट्री की ओर मुड़ जाती है। यहां से फिल्म का टोन लड़खड़ाने लगता है। मीरा जब अपनी पत्नी का सच जानने के लिए एक प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर हायर करती है तो पटकथा में सस्पेंस के बजाय बिखराव आने लगता है। फिल्म का पेसिंग काफी धीमा है। कई सीन ऐसे हैं जो कहानी को आगे नहीं बढ़ाते बल्कि वहीं खड़े रहते हैं। इसके अलावा मुख्य किरदार को समलैंगिक दिखाने का फैसला प्रगतिशील तो है, लेकिन पटकथा के स्तर पर यह कहानी में कोई विशेष मूल्य नहीं जोड़ता। अगर यह एक पारंपरिक पति-पत्नी की कहानी भी होती, तब भी आरोप और जांच की दिशा वही रहती। इस पहलू को फिल्म में बस एक 'सेटिंग' की तरह इस्तेमाल किया गया है, न कि कहानी के मुख्य द्वंद्व के रूप में।
परफॉर्मेंस: फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी
अगर ‘एक्यूज्ड’ देखने लायक बनी रहती है तो उसका एकमात्र कारण इसके लीड एक्टर्स की दमदार परफॉर्मेंस है। कोंकणा सेनशर्मा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे क्यों बेहतरीन अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। डॉ. गीतिका सेन के रूप में उन्होंने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है जो अंदर से टूट रही है, लेकिन बाहर से शांत रहने की कोशिश करती है। उनके हाव-भाव और उनकी खामोशी कई संवादों से ज्यादा प्रभावशाली है। प्रतिभा रन्टा ने भी कोंकणा जैसे दिग्गज कलाकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। एक ऐसी पत्नी का किरदार, जिसके मन में अपने पार्टनर के प्रति विश्वास और शक के बीच जंग चल रही है, उसे उन्होंने बहुत सूक्ष्मता से पर्दे पर उतारा है। प्रतिभा के चेहरे पर आने वाले छोटे-छोटे बदलाव उनके कैरेक्टर के आंतरिक संघर्ष को अच्छी तरह बयां करते हैं।
निर्देशन और तकनीकी खामियां
अनुभूति कश्यप का विजन स्पष्ट है, लेकिन स्क्रीनप्ले में जुड़ाव की कमी फिल्म को कमजोर बनाती है। फिल्म का टोन बहुत ज्यादा संयमित है, जिसके कारण दर्शकों को पात्रों के साथ वह भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं होता जिसकी जरूरत थी। इमोशनल सीन आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन वे दर्शकों पर कोई गहरा प्रभाव नहीं छोड़ पाते। फिल्म का क्लाइमेक्स और असली अपराधी का खुलासा भी काफी औसत दर्जे का लगता है। जिस तरह से मिस्ट्री को सुलझाया गया है, वह थोड़ा जबरदस्ती का और रूटीन लगता है। एक ऐसी फिल्म जिससे समाज में महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न पर एक तीखा नजरिया पेश करने की उम्मीद थी, वह अंत में एक साधारण और फीकी जांच-पड़ताल वाली कहानी बनकर रह जाती है।
फाइनल वर्डिक्ट: एक अधूरा अनुभव
‘एक्यूज्ड’ में संभावनाओं की कोई कमी नहीं थी। एक अच्छी कास्ट, एक गंभीर विषय और नेटफ्लिक्स जैसा प्लेटफॉर्म होने के बावजूद, यह अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाई। यह फिल्म न तो पूरी तरह से एक सामाजिक ड्रामा बन पाती है और न ही एक दमदार मिस्ट्री।
क्यों देखें: अगर आप कोंकणा सेनशर्मा और प्रतिभा रन्ता के अभिनय के मुरीद हैं तो उनकी परफॉर्मेंस के लिए इसे एक बार देख सकते हैं।
क्यों न देखें: अगर आप एक गहरी, भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाली या एक तेज तर्रार थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।
कुल मिलाकर ‘एक्यूज्ड’ एक ऐसी फिल्म है जो शुरू तो एक नई उम्मीद के साथ होती है, लेकिन अपने आखिरी पलों में लड़खड़ाकर रह जाती है