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Toaster Movie Review: नया आइडिया, हल्कि कॉमेडी और अजीब सस्पेंस, कैसी है राजकुमार और सान्या की 'टोस्टर'?

 Written By: Anindita Mukhopadhyay
 Published : Apr 15, 2026 03:59 pm IST,  Updated : Apr 15, 2026 03:59 pm IST

Toaster Film Review: राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा ​​नेटफ्लिक्स की इस अनोखी डार्क कॉमेडी में मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का विचार तो नया है, लेकिन इसकी गति थोड़ी असमान है, फिर भी इसका मूल भाव दिल को छूने वाला और आकर्षक है।

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टोस्टर फिल्म रिव्यू Photo: INSTAGRAM/@NETFLIX_IN
  • फिल्म रिव्यू: टोस्टर
  • स्टार रेटिंग 3/5
  • पर्दे पर: अप्रैल 15, 2026
  • डायरेक्टर: विवेक दासचौधरी
  • शैली: डार्क कॉमेडी

राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा स्टारर डार्क कॉमेडी 'टोस्टर' रिलीज हो चुकी है। एक टोस्टर जैसी साधारण सी चीज के इर्द-गिर्द बुनी गई पूरी कहानी वाली फिल्म में कुछ अजीब सा आकर्षण है। राजकुमार राव और पत्रलेखा द्वारा समर्थित, नेटफ्लिक्स की 'टोस्टर' अराजकता, अपराध और विचित्र किरदारों से भरपूर एक डार्क कॉमेडी बनने की पूरी कोशिश करती है। इस फिल्म का आइडिया तो नया है, लेकिन टोन धीरे-धीरे बदलता जाता है। तो चलिए जानते हैं राजकुमार राव और सान्या मल्होत्रा की 'टोस्टर' कैसी है?

टोस्टर की कहानी

'टोस्टर' रमाकांत (राजकुमार राव) की कहानी है, जो हद से ज्यादा कंजूस है। वह ऐसा व्यक्ति है जो अपने खर्च किए गए हर रुपये का हिसाब रखता है और उपहारों के रूप में मिले पैसे भी वापस चाहता है। उसका यह जुनून तब चरम पर पहुंच जाता है जब वह उस 'टोस्टर' को वापस लेने का फैसला करता है जो उसने कभी एक शादी में उपहार में दिया था, क्योंकि उस कपल ने तलाक की घोषणा कर दी है। जो बात हल्के-फुल्के ढंग से शुरू होती है, वह जल्दी ही उलझ जाती है। वही टोस्टर किसी तरह एक हत्या से जुड़ जाता है। घबराकर रमाकांत उसे अपनी मकान मालकिन के घर में छिपा देता है। लेकिन, फिर उसकी भी मृत्यु हो जाती है और मामला और भी पेचीदा हो जाता है। जल्द ही, मामला सिर्फ उसके पीछे भागने तक सीमित नहीं रह जाता। अन्य लोग भी इसके पीछे पड़े हैं - ऐसे कारणों से जिन्हें वह समझ नहीं पाता। इसके बाद अजीबोगरीब और अराजक घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है, जिसमें सब कुछ गलत होता चला जाता है।

टोस्टर: अभिनय

राजकुमार राव एक बार फिर साबित करते हैं कि वे आज के सबसे भरोसेमंद अभिनेताओं में से एक क्यों हैं। उन्होंने अपना पूरा जोर लगा दिया है। रमाकांत चिड़चिड़ा, जिद्दी और अजीब है - लेकिन राव ने उसे देखने लायक बना दिया है। कई बार तो पसंद भी आ जाता है। सान्या मल्होत्रा ​​अच्छी हैं, लेकिन उनकी भूमिका सीमित लगती है। काश उन्हें और कुछ करने को मिलता। अर्चना पूरन सिंह और सीमा पाहवा छोटी भूमिकाओं में अपना हमेशा वाला आकर्षण बिखेरती हैं। अभिषेक बनर्जी, जैसा कि उम्मीद थी, एक हटके भूमिका में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं। कलाकारों का काम ठीक है - लेकिन सभी को पर्याप्त मौका नहीं मिलता।

टोस्टर: निर्देशन

निर्देशन की बात करें तो आइडिया नया है और विवेक दासचौधरी ने इसे पर्दे पर उतारने का पूरा प्रयास किया है। एक छोटी सी वस्तु, एक टोस्टर जिससे बड़ा बवाल मच जाता है। और कई बार यह कारगर भी होता है। कुछ जगहों पर डार्क ह्यूमर अच्छा लगता है। लेकिन, फिल्म बीच में ही अपनी पकड़ खो देती है। गति धीमी हो जाती है। कुछ दृश्य खींचे हुए लगते हैं। यह अपनी शुरुआत की ऊर्जा को बरकरार नहीं रख पाती, जिससे कहानी का असर भी कम हो जाता है।

टोस्टर में क्या अच्छा है?

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी ओरिजिनैलिटी और अजीब आइडिया है। जब भी टोस्टर अपने डार्क ह्यूमर पर पूरी तरह से केंद्रित होती है, तो यह वाकई मनोरंजक बन जाती है। राजकुमार राव का अभिनय इस हलचल को संतुलित करता है, और बीच-बीच में तीखे, सिचुएशनल कॉमेडी के कुछ अंश देखने को मिलते हैं जो काफी प्रभावी हैं। फिल्म की अनिश्चितता आपको उत्सुक बनाए रखती है, भले ही कभी-कभी थोड़ी लड़खड़ाती हो।

'टोस्टर' में क्या अच्छा नहीं है?

फिल्म में कुछ कमियां हैं। बीच का हिस्सा थोड़ा धीमा है। कुछ किरदारों का सही इस्तेमाल नहीं हुआ है। कई जगह पर कॉमेडी भी बोझिल लगती है। और क्लाइमेक्स कन्फ्यूजन भरा है, जिसके चलते ये उतना असरदार नहीं है जितना होना चाहिए था।

टोस्टर: देखें या नहीं

टोस्टर में एक बेहतरीन डार्क कॉमेडी बनने के सारे गुण हैं, लेकिन फिल्म उनका पूरा फायदा नहीं उठा पाई है। कुछ हिस्से मनोरंजक हैं, कुछ धीमे, लेकिन फिल्म कभी भी दर्शकों का ध्यान पूरी तरह से नहीं भटकने देती। फिल्म का कॉन्सेप्ट तो बढ़िया है, लेकिन फिल्म उसका पूरा लाभ नहीं उठा पाई है। कुछ हिस्से मनोरंजक हैं, कुछ धीमे, लेकिन कभी उबाऊ नहीं। कुल मिलाकर ये वन टाइम वॉच है। खासकर अगर आपको थोड़ी अटपटी, किरदारों पर आधारित कहानियां पसंद हैं।

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