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Explainer: 80 साल बाद भी नहीं टला है खतरा? जानें, कहां छिपे हैं दूसरे विश्व युद्ध के जहरीले 'टाइम कैप्सूल'

 Published : Sep 02, 2025 01:53 pm IST,  Updated : Sep 02, 2025 01:57 pm IST

दूसरे विश्व युद्ध की 80वीं वर्षगांठ पर भी खतरा टला नहीं है। प्रशांत महासागर में डूबे जहाज, बम और रेडियोएक्टिव कचरा पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। रिसाव से समुद्री जीवन, खाद्य श्रृंखला और लोगों की सेहत पर असर हो रहा है।

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पर्ल हार्बर में जापान ने भीषण हमला किया था। Image Source : AP

ब्रिस्बेन: आज यानी कि 2 सितंबर 2025 को दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने की 80वीं सालगिरह है। 2 सितंबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध खत्म हो गया था जब जापान ने आधिकारिक तौर पर आत्मसमर्पण किया था। लेकिन इस युद्ध की कई विरासतें आज भी जमीन और समुद्र में मौजूद है। खास तौर पर प्रशांत महासागर में, जहां डूबे हुए जहाज, लड़ाकू विमान और जिंदा बम आज भी मौजूद हैं। ये अवशेष न सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर हैं, बल्कि खतरनाक जहरीले टाइम कैप्सूल भी हैं जिनसे ईंधन, भारी धातुएं और अन्य नुकसानदेह पदार्थ पर्यावरण में रिस रहे हैं। ये जैव विविधता और इंसानी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं।

प्रशांत महासागर बना हुआ है कूड़ाघर

दूसरे विश्व युद्ध में प्रशांत क्षेत्र में जापान और मित्र देशों की सेनाओं के बीच 4 साल तक जंग चली। यह लड़ाई दिसंबर 1941 में शुरू हुई, जब जापान ने हवाई के पर्ल हार्बर में अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर हमला किया। इस दौरान कोरल सागर की लड़ाई, मिडवे की लड़ाई और सोलोमन द्वीपों में ग्वाडलकैनाल कैंपेन जैसी बड़ी जंगें लड़ी गईं। प्रशांत महासागर के द्वीपों पर जंग के लिए हथियार जमा किए गए और खतरनाक सामग्री को छोड़ दिया गया। युद्ध खत्म होने के बाद, इनमें से ज्यादातर सामग्री को वहीं छोड़ दिया गया। अनुमान है कि प्रशांत महासागर की तलहटी में करीब 3,800 जहाजों के मलबे आज भी मौजूद हैं।

जहरीले प्रदूषकों का समुद्र में रिसाव

युद्ध के ये अवशेष धीरे-धीरे खराब हो रहे हैं और जहरीले प्रदूषक समुद्र और मिट्टी में रिस रहे हैं। ये प्रदूषक समुद्री जीवों में जमा हो रहे हैं, 'फूड चेन' में शामिल हो रहे हैं और जैव विविधता के लिए खतरा बन रहे हैं। पलाऊ के कोरर हार्बर में डूबा एक जापानी जहाज से, जिसे 'हेलमेट रेक' के नाम से जाना जाता है, आज भी तेजाब रिस रहा है। बाल्टिक सागर में भी युद्ध के बचे हुए बमों और गोला-बारूद के असर को देखा गया है, जहां करीब 3000 किलोग्राम जहरीले रसायन पानी में घुले पाए गए हैं। कोरल रीफ और मैंग्रोव इन रसायनों और भौतिक नुकसान से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। प्यूर्टो रिको में शोधकर्ताओं ने पाया कि वहां के बमों से रिसने वाले जहरीले पदार्थ समुद्री जीवों में पहुंच गए हैं, जो 'फूड चेन' को दूषित कर रहे हैं।

इंसानों के लिए भी है बहुत बड़ा खतरा

युद्ध के ये अवशेष इंसानों के लिए भी खतरा बने हुए हैं। पिछले साल, सोलोमन द्वीप में एक स्कूल के नीचे 200 से ज्यादा बम दबे पाए गए। पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी और सोलोमन द्वीप जैसे इलाकों में ऐसी खतरनाक चीजें अक्सर मिलती रहती हैं। खेतों में काम करने वाले किसान, खेलते हुए बच्चे या मछली पकड़ने वाले मछुआरे इनका शिकार होते रहते हैं। डूबे जहाजों, बमों और विमानों में मौजूद ईंधन और भारी धातुएं, जैसे लेड और कैडमियम, शरीर के हार्मोन सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

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Image Source : APजापान के हमले के बाद पानी में डूबती अमेरिका की वॉरशिप।

युद्ध के अवशेषों के इंसानी सेहत पर असर को लेकर प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा शोध नहीं हुआ है, लेकिन उपलब्ध अध्ययनों से गंभीर परिणामों का पता चलता है। मिसाल के तौर पर, गाजा और वियतनाम में युद्ध के रसायनों के संपर्क में आए माता-पिता के बच्चों में जन्मजात दोष देखे गए हैं। इस साल की शुरुआत में ब्रिटिश सेना के गोला-बारूद तकनीशियनों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उनमें ब्लैडर कैंसर की दर सामान्य आबादी से काफी ज्यादा थी।

साइक्लोन पैम से सतह पर आ गए थे कई बम

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का रुख बदलता जा रहा है और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, जिससे युद्ध के अवशेषों का खतरा और गंभीर हो रहा है। मिसाल के लिए, मार्च 2015 में आए साइक्लोन पैम ने किरिबाती और तुवालु में कई बम सामने ला दिए। जांच में वहां हाई-एक्सप्लोसिव प्रोजेक्टाइल, मोर्टार और 5300 राउंड गोला-बारूद मिले। 2020 में लॉर्ड होवे द्वीप के पास एक मछुआरे को एक बम मिला, जिसके बारे में तब के पर्यावरण मंत्री सुसान ले ने कहा कि इसे साइक्लोन या समुद्री धाराओं ने वहां पहुंचाया होगा। बाढ़ और भूस्खलन भी इन हथियारों को दूर तक ले जा सकते हैं, जिससे इनकी स्थिति का पता लगाना और सफाई करना मुश्किल हो जाता है।

प्रशांत क्षेत्र का सबसे जहरीला अवशेष मार्शल द्वीपों का रुनिट डोम है। 1970 के दशक में बने इस कंक्रीट ढांचे में अमेरिकी परमाणु परीक्षणों का रेडियोएक्टिव कचरा भरा गया था। शोध बताते हैं कि बड़े तूफान इस इलाके में रेडियोएक्टिव तलछट को सामान्य से 84 गुना ज्यादा बढ़ा सकते हैं। डोम की सतह में दरारों के कारण आसपास के पानी में रिसाव का भी खतरा है।

कैसे कम किया जा सकता है खतरे का असर?

प्रशांत क्षेत्र में खतरे के बावजूद सफाई का काम धीमा रहा है। युद्ध की 80वीं सालगिरह इस जहरीली विरासत पर कदम उठाने का मौका देती है। इस समस्या का दायरा इतना बड़ा है कि इसके लिए समन्वित और अच्छी तरह से फंड की गई कार्रवाई की जरूरत है। इसमें खतरनाक सामग्री को हटाने, क्षतिग्रस्त पर्यावरण को बहाल करने और लंबे समय तक सेहत पर नजर रखने का काम शामिल होना चाहिए। कुछ मदद मिली है, जैसे ऑस्ट्रेलियाई रक्षा बल के नेतृत्व में चलने वाला 'ऑपरेशन रेंडर सेफ' प्रोग्राम, जो युद्ध के अवशेषों को हटाने का काम करता है। लेकिन इसमें और ज्यादा प्रयासों की जरूरत है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और अमेरिका जैसे क्षेत्रीय साझेदारों के पास नेतृत्व करने का मौका है। (PTI-द कन्वर्सेशन)

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