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Explainer: कजाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल करने के पीछे क्या है ट्रंप की रणनीति...रूस और चीन का इससे क्या होगा?

 Published : Nov 07, 2025 11:01 pm IST,  Updated : Nov 07, 2025 11:01 pm IST

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कजाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल करने की घोषणा करके मध्य-पूर्व एशिया में बड़ा रणनीतिक दांव खेला है। इससे वह रूस से लेकर चीन और ईरान तक को संतुलित करना चाह रहा है।

ह्वाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव।- India TV Hindi
ह्वाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव। Image Source : AP

Explainer: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 7 नवंबर (शुक्रवार) को कजाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल किए जाने की घोषणा करके बहुत बड़ी रणनीतिक चाल चल दी है। ट्रंप ने ऐलान में कहा कि कजाकिस्तान अब्राहम समझौते में शामिल होने वाला मध्य एशिया का पहला देश होगा। उन्होंने इस कदम को दुनिया भर में ताल-मेल सुधारने की दिशा में एक प्रमुख कदम" बताया। यह फैसला व्हाइट हाउस में कजाकिस्तानी राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव और ट्रंप के साथ हुई वार्ता के दौरान सामने आया, जो सी5+1 शिखर सम्मेलन का हिस्सा था। इस सम्मेलन में कजाकिस्तान, किर्गिजिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और अमेरिका के नेता शामिल थे।

अब्राहम समझौते क्यों है महत्वपूर्ण?

कजाकिस्तान भी इस अब्राहम समझौते में शामिल होने के लिए विशेष रूप से लालायित दिखा। कजाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे अपनी बहु-दिशात्मक विदेश नीति का "प्राकृतिक और तार्किक विस्तार" बताया। यह संवाद पारस्परिक सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता पर जोर देता है। हालांकि कजाकिस्तान के 1992 से ही इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध हैं, लेकिन यह कदम अमेरिका द्वारा प्रायोजित ढांचे में गहरे एकीकरण को औपचारिक बनाता है, जो इजरायल के साथ ही साथ मुस्लिम बहुल देशों के बीच सामान्यीकरण को बढ़ावा देता है। 

अब्राहम समझौता क्या है?

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में 2020 में अब्राहम समझौता शुरू किया गया था। इस दौरान इजरायल और कई अरब तथा मुस्लिम बहुल देशों के बीच द्विपक्षीय समझौते हुए, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और 2021 में सूडान भी शामिल हो गया। अमेरिका की मध्यस्थता में किए गए ये समझौते पारंपरिक "भूमि के बदले शांति" ढांचे को दरकिनार कर आर्थिक सहयोग, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदारी पर केंद्रित हैं। ट्रंप इन्हें अपनी मध्य पूर्व नीति का आधार स्तंभ मानते हैं, जो अक्टूबर 2023 में शुरू हुए इजरायल-हमास युद्ध के बीच शांति को बढ़ावा देने का श्रेय देते हैं। फिलिस्तीनियों को दरकिनार करने के लिए आलोचना झेलने के बावजूद, ये समझौते बने हुए हैं। गाजा में 65,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की मौत के बाद भी हस्ताक्षरकर्ता अरब देशों ने संबंध नहीं तोड़े।

कजाकिस्तान क्यों शामिल हो रहा है?

कजाकिस्तान को मध्य एशिया की संसाधन-समृद्ध, भूमि माना जाता है। कजाकिस्तान के संबंध इजरायल के साथ पहले से ही मजबूत हैं, जिसमें सालाना 100 मिलियन डॉलर से अधिक का द्विपक्षीय व्यापार और 2016 में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की अस्ताना यात्रा शामिल है। कजाकिस्तान का इस समझौते में शामिल होना अमेरिका के साथ संबंध स्थापित करने से अधिक ट्रंप के नेतृत्व वाले गठबंधन में अपने देश को ऊंचा उठाने का कदम है। अस्ताना इसे पश्चिमी निवेश आकर्षित करने के लिए व्यावहारिक मानता है, खासकर हालिया अमेरिकी सौदे से जो दुनिया के सबसे बड़े अनछुए टंगस्टन जमा को विकसित करेगा। अटलांटिक काउंसिल के यूरेशिया सेंटर के एंड्र्यू डी’एनीएरी के अनुसार कजाकिस्तान अधिक साझेदार चाहता है। वह विशेष रूप से अस्ताना अमेरिका और यूरोप के साथ अधिक सक्रिय संबंध चाहता है।" उसका यह "स्मार्ट व्यावहारिक कदम" कजाकिस्तान के खनिज, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में अमेरिकी एजेंसियों और निजी क्षेत्र की रुचि जगाएगा।

रूस और चीन को संतुलित करने का भू-राजनीतिक संकेत

कजाकिस्तान का यह कदम स्पष्ट संदेश देता है कि वह मॉस्को और बीजिंग पर अत्यधिक निर्भरता से बच रहा है। रूस कजाकिस्तान का सुरक्षा साझेदार है और चीन बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से उसका साझेदार है। इन दोनों के बीच फंसा तेल और यूरेनियम-समृद्ध यह देश अपनी "बहु-दिशात्मक" कूटनीति को पश्चिमी लंगरों से संतुलित करना चाहता है। इसलिए अब्राहम समझौते से जुड़कर कजाकिस्तान "उदारवादी मुस्लिम देशों के अमेरिका-समर्थक गठबंधन" में शामिल होना चाहता है, जो सहिष्णुता और समृद्धि के लिए समर्पित है। उसका यह कदम मॉस्को के ऐतिहासिक प्रभुत्व वाले मध्य एशिया में रूसी प्रभाव को कम कर सकता है। वहीं चीन के लिए, यह उसके यूरेशियाई महत्वाकांक्षाओं वाले क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा पैदा कर सकता है। 

अमेरिका और इजरायल की रणनीतिक बढ़त

अटलांटिक काउंसिल की सारा जाइमी के अनुसार कजाकिस्तान को अब्राहम समझौते में शामिल कराने के ट्रंप के फैसले से अमेरिका और इजरायल को "कैस्पियन सागर के पास संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में रूस और ईरान पर रणनीतिक बढ़त" मिल सकती है। समझौते का विस्तार मध्य पूर्व से परे "व्यापक पैन-अब्राहमिक ब्लॉक" का संकेत देता है, जो यूरेशिया में स्थिरता को बढ़ावा देगा।

आर्थिक टारगेट

यह समझौता भू-राजनीति से परे हाई-टेक और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में  इजरायली नवाचार के द्वार खोलते हैं , जो कजाकिस्तान के आधुनिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। इजरायल जल प्रबंधन, सटीक कृषि और साइबर सुरक्षा में उत्कृष्ट है, जो कजाकिस्तान के शुष्क स्टेप्स को बदल सकता है और खाद्य सुरक्षा बढ़ा सकता है। वहीं अमेरिकी खनिज निवेश के साथ यह हाइड्रोकार्बन से विविधीकरण को तेज करेगा। इसके अलावा अस्ताना और अल्माटी जैसे शहरों में नौकरियां और टेक हब पैदा करेगा। ट्रंप ने इसे "शांति और समृद्धि" अपनाने का मार्ग बताया। इस समझौते को लेकर हस्ताक्षर समारोह जल्द ही आयोजित होगा।

आगे की क्या है रणनीति?

ट्रंप ने संकेत दिया कि अब्राहम समझौते में कजाकिस्तान के अलावा उज्बेकिस्तान, अजरबैजान और संभवतः लेबनान या सीरिया जैसे कई देश शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं। औपचारिक हस्ताक्षर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की 18 नवंबर को अमेरिकी यात्रा के दौरान हो सकता है। हालांकि इस समझौते की अभी कई बड़ी चुनौतियां बाकी हैं। अधिकांश मुस्लिम राष्ट्र फिलिस्तीनी राज्य की मांग पर सामान्यीकरण की शर्त रख रहे हैं। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव इन समझौतों की मजबूती की परीक्षा लेंगे। कजाकिस्तान के लिए सफलता प्रतीकवाद को ठोस लाभों में बदलने पर निर्भर करेगी, जो मध्य एशिया के गठबंधनों को दशकों तक बदल सकती है। यह समझौतों के "नए चरण की शुरुआत" का प्रतीक है।

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