दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने पर विचार करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि पुरातत्व सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा पुराना किला में की गई खुदाई में लगभग 1000 ईसा पूर्व के प्राचीन बसावट के प्रमाण मिले हैं, जिनमें पेंटेड ग्रे वेयर संस्कृति के अवशेष भी शामिल हैं, जिन्हें महाभारत काल से जोड़ा जाता है, ये खोजें इस ऐतिहासिक धारणा को मजबूत करती हैं कि प्राचीन इंद्रप्रस्थ इसी स्थान पर स्थित था जहां आज दिल्ली है। खंडेलवाल ने कहा कि 'दिल्ली' नाम अपेक्षाकृत बाद के मध्यकालीन दौर में प्रचलन में आया, जिसे इतिहासकार ढिल्लिका या देहली जैसे नामों से जोड़ते हैं। लेकिन यह इसकी मूल और प्राचीन सभ्यतागत पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली दिलवालों की है। यह एक तरह से सच भी है, क्योंकि देश की राजधानी हर राज्य के लोगों से, वहां की संस्कृति को अपने आप में समेटे हुए है। इसका इतिहास अगर आप देखें तो यह विदेशी आक्रांताओं की लूट-खसोट, सड़कों पर कत्लेआम, सत्ता के लिए हत्याएं की साक्षी रही है। दिल्ली की जमीन की जितनी परतें खोलेंगे उतना विस्तृत इतिहास सामने आएगा। यहां कई शासकों ने शासन किया, जिनकी अलग सभ्यता रही। हर शासक का शासन खत्म होता गया और उनकी सभ्यता संस्कृति दिल्ली की जमीन में दफ्न होती गई।

इंद्र के कहने पर विश्वकर्मा ने बनाया था इंद्रप्रस्थ
वहीं दिल्ली के इतिहास की बात करें तो यह महाभारतकालीन सभ्यता की गवाह रही है। यमुना नदी के किनारे स्थित दिल्ली का प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ माना जाता है। कहा जाता है कि इंद्रप्रस्थ का निर्माण पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के सहयोग से खांडवप्रस्थ नामक स्थान पर करवाया था, जिसके मुख्य वास्तुकार देवशिल्पी विश्वकर्मा और मयासुर थे, महाभारत में यह पांडवों की भव्य राजधानी थी। देवशिल्पी विश्वकर्मा और मयासुर ने बंजर खांडवप्रस्थ को एक दिव्य, भव्य और आधुनिक नगर बना दिया, जिसका नाम पांडवों ने इंद्रप्रस्थ रखा।। इन्द्र के कहने पर विश्वकर्मा ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था और मयासुर ने इसमें एक विशेष सभा का निर्माण भी किया था, जिसे 'मयासभा' कहा जाता है। हालांकि इंद्रप्रस्थ कैसे उजड़ा इसका इतिहास में कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

दिल्ली, बदलता रहा नाम, बनाए रखा मुकाम
- इतिहास में दर्ज है कि 13वीं सदी के अंतिम दशक में दिल्ली पर खिलजी वंश का राज रहा। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान मंगोल लुटेरे दिल्ली पर हमला करते रहते थे और उपनगरीय इलाकों में लूटमार किया करते थे। मंगोलों के हमलों से बचाव के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने कुतुब मीनार से कुछ ही दूर पर उत्तर-पूर्व में एक गोलाकार किले का निर्माण कराया और इस शहर का नाम रखा सिरी। इस नये शहर सिरी को खिलजी ने अपनी राजधानी बनाया। इस तरह से मुगलों का बसाया पहला शहर था सिरी। आज भी दिल्ली में इसके प्रमाण मौजूद हैं और इसे सिरी फोर्ट के नाम से जाना जाता है।
दिल्ली का लाल किला
- खिलजी के बाद दिल्ली की सल्तनत पर तुगलक वंश का आधिपत्य था। गयासुद्दीन तुगलक ने सिरी से हटकर तुगलकाबाद नाम से नई राजधानी बनाई। लेकिन पानी की कमी के कारण तुगलक वंश की राजधानी को वापस खिलजी के बसाए कुतुब मीनार के पास सिरी ले जाया गया। गयासुद्दीन के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने सिरी शहर किले में कुछ और हिस्से जोड़े। लेकिन फिर अचानक उसने अपनी राजधानी देवगिरी में बसा ली उसका नाम दौलताबाद रख दिया। इसके बाद मोहम्मद बिन तुगलक के बेटे फिरोज शाह तुगलक सिरी और दौलताबाद को छोड़ दिया और अपनी राजधानी दिल्ली में बसा लिया। फिरोज शाह तुगलक ने जहां अपनी राजधानी बसाई उसे आज फिरोज शाह कोटला कहा जाता है।
- इसके बाद मुगल शासक तैमूर लंग ने दिल्ली पर आक्रमण किया और जमकर लूटपाट की। उसके बाद दिल्ली में सैय्यद वंश का राज रहा और फिर लोदी राजवंश का। जब मुगल बादशाह बाबर भारत आया तो उसने दिल्ली नहीं, आगरा को अपनी राजधानी बना लिया। बाबर के पुत्र हुमायूं ने अपने शासनकाल की शुरुआत में यमुना के किनारे एक नया शहर बसाया, जिसका नाम दीन पनाह रखा। शेरशाह ने हुमायूं को हराकर उसकी सत्ता छीन ली और हुमायूं को पर्सिया भागना पड़ा। शेरशाह ने हुमायूं के बसाए दीन पनाह शहर का नाम बदलकर शेर शाही रखा और यहां एक किला बनाया, जो आज का पुराना किला है।
दिल्ली की पुरानी तस्वीर
- मुगल बादशाह अकबर और जहांगीर ने आगरा को ही अपनी राजधानी बनाया। लेकिन उनके उत्तराधिकारी शाहजहां को आगरा और लाहौर के बीच ऐसी जगह की तलाश थी, जहां का मौसम अच्छा हो। आखिर उसकी तलाश यमुना किनारे पर वहां आकर खत्म हुई, जो पुराना किला से कुछ ही दूरी पर था।शाहजहां ने यहीं अपनी राजधानी बनाई और यहां एक किला बनाया उर्दू-ए-मौला, जिसे आज हम लाल किला के रूप में देखते हैं। यह किला 8 साल में बनकर तैयार हुआ था। फिर शाहजहां ने अपनी नई राजधानी शाहजहानाबाद में बसाई और आज इसी शाहजहानाबाद को हम पुरानी दिल्ली के नाम से जानते हैं। शाहजहां ने दिल्ली में कई गेट बनवाए, जिनमें कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट, तुर्कमान गेट और अजमेरी गेट हैं जो आज भी ऐतिहासिक स्तंभ के रूप में मौजूद हैं।
दिल्ली का इंडिया गेट
- मुगल सल्तनत काल के बाद मराठों ने दिल्ली पर हमला किया और फिर नादिर शाह ने भी दिल्ली पर आक्रमण किया। मराठों के बाद जब अंग्रेज दिल्ली आए और बहादुर शाह जफर के नेतृत्व वाले मुगल शासन को खत्म कर दिया। अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में बसाई। इसके लिए अंग्रेजों के मुख्य वास्तुकार सर एडविन लुटियन्स ने ही नई दिल्ली को आकार दिया। इसी बिच दिल्ली में मशहूर इंडिया गेट का निर्माण हुआ, जिसे पहले विश्व युद्ध में मारे गए ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए वार मेमोरियल के तौर पर बनाया गया था और भारत की आजादी के बाद दिल्ली एक बड़े महानगर के रूप में उभरी और आज की दिल्ली चौबीसों घंटे दौड़ती भागती दिखती है। अब दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ करने की मांग हो रही है।