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Explainer: मंगल के चंद्रमा से मिट्टी लाएगा जापान, क्या है MMX मिशन? जानिए क्या खुलेगा राज

 Written By: Niraj Kumar
 Published : Oct 18, 2026 02:56 pm IST,  Updated : Oct 18, 2026 03:23 pm IST

जापान अब अंतरिक्ष अभियान में एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है। जापान की स्पेस एजेंसी मंगल ग्रह के चंद्रमा फोबोस की मिट्टी को धरती पर लाएगी। इस सैंपल का अध्ययन कर कई संभावनाओं का पता लगाया जा सकेगा।

Japan, Mars- India TV Hindi
जापान अंतरिक्ष मिशन Image Source : AP

Explainer: जापान अपनी तकनीकी क्षमताओं से पूरी दुनिया को समय-समय पर अचंभे में डाल देता है। इस जापान अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतिहास रचने की तैयारी कर रहा है। जापान एयरोस्पेस एक्सफ्लोरेशन एजेंसी (JAXA) मंगल ग्रह के चंद्रमा फोबोस से मिट्टी के सैंपल्स लाने के लिए अपना महत्वाकांक्षी मिशन लॉन्च करने जा रही है। यह विश्व का पहला ऐसा मिशन होगा जिसके तहत मंगल के किसी चंद्रमा की मिट्टी के सैंपल धरती पर लाए जाएंगे। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन नमूनों से मंगल के इतिहास, चंद्रमाओं के निर्माण और सौरमंडल में जीवन की उत्पत्ति से जुड़े सवालों को समझने में मदद मिलेगी। यह मिशन भविष्य में मंगल पर मानव अभियान की संभावनाओं के लिहाज से भी अहम है।

क्या है जापान का MMX मिशन?

MMX मिशन का पूरा नाम मार्टियन मून्स एक्सप्लोरेशन (Martian Moons eXploration) है। जापान एयरोस्पेस एक्सफ्लोरेशन एजेंसी (JAXA) इस मिशन को संचालित कर रही है। इसके तहत एक अंतरिक्ष यान मंगल के चंद्रमा फोबोस तक जाएगा और वहां की सतह की अध्ययन करेगा। साथ ही लौटते वक्त मिट्टी के सैंपल अपने साथ लेकर धरती पर वापस आएगा। प्लानिंग के मुताबिक जापान अंतरिक्ष यान को एच-3 रॉकेट के जरिए लॉन्च करेगा। यह यान अगस्त 2027 के आसपास मंगल क्षेत्र में पहुंचेगा और 2031 तक धरती पर वापस लौटेने की उम्मीद है। मंगल के किसी चंद्रमा से मिट्टी लेकर वापस लौटने का यह दुनिया का पहला मिशन होगा। इस मिशन में फ्रांस और जर्मनी का संयुक्त रूप से विकसित इडेफिक्स रोवर भी शामिल है। इसके अलावा अमेरिका और यूरोप की अंतरिक्ष एजेंसियां उपकरणों तथा संचार व्यवस्था में सहयोग कर रही हैं।

मंगल के दो चंद्रमा कौन-कौन?

बता दें कि मंगल के दो प्राकृतिक चंद्रमा हैं- एक फोबोस और दूसरा डीमोस। इनका साइज अनियमित है और ये आलू की तरह दिखाई देते हैं। अगर पृथ्वी के चंद्रमा से इनकी तुलना की जाए तो इनके मुकाबले ये दोनों बहुत छोटे हैं। फोबोस मंगल के ज्यादा करीब है।  एक दिन में यह मंगल के तीन चक्कर लगाता है। डीमोस मंगल से अपेक्षाकृत दूर है। वैज्ञानिकों के लिए दोनों चंद्रमाओं की उत्पत्ति अब भी एक पहेली के समान है। यही कारण है कि इनकी मिट्टी और संरचना का अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रहस्य बने हुए हैं मंगल के Moon

1960 के दशक से मंगल ग्रह पर दर्जनों मिशन भेजे गए हैं, लेकिन इसके चांद ज़्यादातर एक रहस्य ही बने हुए हैं। फोबोस और डीमोस के नाम ग्रीक पौराणिक कथाओं में डर और आतंक के प्रतीक से लिए गए हैं, जो युद्ध के देवता एरेस के बेटे हैं, जिनका रोमन समकक्ष मंगल है। फोबोस पर उतरने की रूस की कई कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं, जिसमें 2011 में की गई एक कोशिश भी शामिल है।

फोबोस और डीमोस बने कैसे?

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि फोबोस और डीमोस बने कैसे? इसे समझने के लिए दो प्रमुख सिद्धांत हैं। पहला सिद्धांत ये है कि किसी बड़े खगोलीय पिंड के मंगल से टकराने के बाद निकले मलबे से दोनों चंद्रमाओं का निर्माण हुआ होगा। अगर ऐसा है, तो फोबोस की मिट्टी में मंगल से निकले पदार्थ के निशान मिल सकते हैं। वहीं दूसरे सिद्धांत के मुताबिक फोबोस और डीमोस दरअसल क्षुद्रग्रह हो सकते हैं, जो सौरमंडल के किसी दूसरे हिस्से से मंगल के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में आकर उसकी परिक्रमा करने लगे। फोबोस से मिट्टी के सैंपल्स का विश्लेषण करके वैज्ञानिक इन दोनों संभावनाओं की जांच कर सकेंगे। इससे यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि मंगल के आसपास के क्षेत्र का निर्माण और विकास कैसे हुआ।

सैम्पल्स कैसे इकट्ठा करेगा अंतरिक्ष यान?

इस मिशन का लक्ष्य फोबोस (मंगल के चंद्रमा) से कम से कम 10 ग्राम मिट्टी इकट्ठा करना है। इसके लिए दो अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। पहली तकनीक के तहत अमेरिकी उपकरण दबाव वाली गैस की मदद से सतह की धूल को एक कंटेनर में पहुंचाएगा। वहीं दूसरी तकनीक के तहत जापानी उपकरण मिट्टी में करीब दो सेंटीमीटर तक प्रवेश करके नमूने इकट्ठा करेगा। नमूनों को एक विशेष कैप्सूल में सुरक्षित रखा जाएगा। पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय पैदा होने वाली गर्मी से बचाने के लिए इसे खास तौर पर डिजाइन किया गया है। योजना के मुताबिक ये कैप्सूल्स वापसी में ऑस्ट्रेलिया में उतरेंगे उसके बाद सैम्पल्स को जापान ले जाया जाएगा।

फोबोस पर उतरना मुश्किल क्यों?

दरअसल, मंगल के चंद्रमा फोबोस पर गुरुत्वाकर्षण धरती के मुकाबले लगभग 2,000 गुना कम है। इतनी कम गुरुत्वाकर्षण वाली सतह पर उतरना आसान नहीं है। अंतरिक्ष यान को उतरते समय अस्थिर होने से बचाना होगा। इसके लिए MMX के लैंडिंग मॉड्यूल में झटके सहने वाले चार पैरों वाला सिस्टम लगाया गया है। रोवर को भी कम गुरुत्वाकर्षण में चलने और पलट जाने पर खुद को सीधा करने के लिए डिजाइन किया गया है।

क्यों अहम है यह अभियान?

बता दें कि अमेरिका, चीन और अन्य देश भविष्य में मंगल पर मानव मिशन भेजने की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। ऐसे में मंगल के चंद्रमा का अध्ययन वैज्ञानिक और व्यावहारिक, दोनों लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। वैज्ञानिक यह भी समझना चाहते हैं कि क्या मंगल के किसी चंद्रमा का इस्तेमाल भविष्य में मानव मिशन के लिए एक पड़ाव या संचालन केंद्र के रूप में किया जा सकता है।

बता दें जून 2025 में जापान का एक प्राइवेट लैंडर चंद्रमा पर उतरने का प्रयास करते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। टोक्यो स्थित कंपनी आईस्पेस ने लैंडर से संपर्क टूटने के कई घंटे बाद मिशन को विफल घोषित किया था। लॉन्च कंट्रोलर्स ने लैंडर से संपर्क करने के तमाम प्रयास किए लेकिन उन्हें कोई संदेश नहीं मिला जिसके बाद उन्होंने कहा कि वो मिशन को समाप्त कर रहे हैं। 

(इनपुट-एपी)

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