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Explainer: माउंट एवरेस्ट के शिखर पर क्यों होता है मौत का खतरा, क्यों कहते हैं इसे 'डेथ जोन'

 Edited By: Kajal Kumari @lallkajal
 Published : May 28, 2026 06:03 pm IST,  Updated : May 28, 2026 06:58 pm IST

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी, 8,849 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट पर कुछ दिनों पहले पांच पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी। इस सबसे ऊंची चोटी को डेथ जोन कहा जाता है। क्यों इस शिखर पर मौत का खतरा है, जानें इससे संबंधित एक एक बात...

माउंट एवरेस्ट का डेथ...- India TV Hindi
माउंट एवरेस्ट का डेथ जोन

पर्वतारोहण काफी रोमांचक होता है, कई लोगों को इसका शौक भी होता है। माउंटेनियरिंग वो भी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी, 8,849 मीटर ऊंचे माउंट एवरेस्ट की हो तो क्या ही कहने। माउंट एवरेस्ट की इस ऊंची चोटी की चढ़ाई के लिए हर साल पर्वतारोही काफी पैसे खर्च करते हैं और इस खतरनाक चोटी पर पहुंचने के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, लेकिन माउंट एवरेस्ट के सबसे ऊंचे शिखर के पास का सबसे हाई पीक न केवल कठिन है, बल्कि बेहद खतरनाक भी है। इसीलिए माउंट एवरेस्ट के 8,000 मीटर से ऊपर के इस पूरे क्षेत्र को "डेथ जोन (Death Zone)" कहा जाता है। यहां मानव शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है और मौत की भी संभावना होती है। ऑक्सीजन की कमी और अन्य कई कारणों से अब तक इस क्षेत्र में 340 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं।

माउंट एवरेस्ट
Image Source : INDIATVमाउंट एवरेस्ट

डेथ जोन में पांच लोगों की चली गई जान

अभी कुछ दिनों पहले ही इस डेथ जोन में मौत का एक बार फिर भयावह रूप सामने आया, जब एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान पांच पर्वतारोहियों की मौत हो गई, जिनमें से दो भारतीय पर्वतारोही थे। ये सभी शिखर पर तो पहुंच गए थे लेकिन  उतरते समय उनकी मौत हो गई। मृतक पर्वतारोहियों में से एक हिलेरी स्टेप के पास गिर गया था जो डेथ जोन के भीतर पहाड़ की सबसे खतरनाक संकरी जगहों में से एक है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक भीड़, थकावट, गलत निर्णय और ऑक्सीजन की गंभीर कमी के कारण आज भी एवरेस्ट पृथ्वी के सबसे खतरनाक स्थानों में से एक बना हुआ है।

क्या है एवरेस्ट का डेथ ज़ोन?

एवरेस्ट का डेथ जोन लगभग 8,000 मीटर (26,247 फीट) की ऊंचाई से शुरू होता है। इतनी ऊंचाई पर हवा में ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल पर उपलब्ध ऑक्सीजन की मात्रा का लगभग एक तिहाई होती है। कभी कभी यहां शरीर तापमान को सहन करने की क्षमता खोने लगता है। यहां आकर अनुभवी पर्वतारोहियों की शारीरिक और मानसिक स्थिति भी बिगड़ने लगती है। हार्ट को अधिक मेहनत करनी पड़ती है, ब्रेन को कम ऑक्सीजन मिलती है, पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, और निर्णय लेने की क्षमता तक कम हो जाती है। 

डेथ जोन
Image Source : INDIATVडेथ जोन
 

डेथ डोन में लंबे समय तक जीवित क्यों नहीं रह सकते

एवरेस्ट के पीक पर मौत का सबसे बड़ा घातक कारक हाइपोक्सिया है, जब ऑक्सीजन का स्तर इतना कम हो जाता है कि शरीर के ऊतकों और अंगों तक नहीं पहुंच पाता। साथ ही शिखर पर वायुमंडलीय दबाव इतना कम होता है कि हर सांस के साथ रक्तप्रवाह में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वहां पहुंचने वाला कोई व्यक्ति बस चार मिनट के भीतर बेहोश हो सकता है और छह मिनट में उसकी मौत हो सकती है। अत्यधिक हाइपोक्सिया के कारण वहां पहुंचे लोगों के लिए साधारण निर्णय लेना भी अचानक असंभव हो जाता है और कई लोग संतुलन खो देते हैं।

डेथ जोन के खतरे
Image Source : INDIATVडेथ जोन के खतरे

अगर कोई व्यक्ति अचानक शिखर पर ऑक्सीजन सहायता के बिना पहुंच जाए, तो वह कुछ ही मिनटों में बेहोश हो सकता है। शिखर तक का कठिन सफर दक्षिणी दर्रे पर स्थित कैंप IV से शुरू होता है, जो डेथ जोन के भीतर स्थित है। पर्वतारोही 10 से 15 घंटे अंधेरे, तूफानी हवाओं और -35 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे गिर चुके तापमान में  इस कठिन चढ़ाई के विभिन्न हिस्सों में खुद को लगभग घसीटते हुए आगे बढ़ते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई पर्वतारोही इसलिए मर जाते हैं क्योंकि वे इतनी थकान महसूस करते हैं कि वे ठीक से सोच नहीं पाते कि क्या करना है।

 

डेथ ज़ोन में मानव शरीर पर क्या असर होता है?

  • माउंट एवरेस्ट का डेथ ज़ोन पर्वतारोहियों के लगभग हर अंग प्रणाली को प्रभावित करता है। कम ऑक्सीजन के कारण हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा (HACE) हो सकता है, जिसमें मस्तिष्क खतरनाक रूप से सूज जाता है। इसके लक्षणों में भ्रम, मतिभ्रम, तालमेल की कमी के कारण पर्वतारोही कोमा में जा सकते हैं।
     
  • पर्वतारोहियों को हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा (HAPE) हो सकता है, जिसमें फेफड़ों में तरल पदार्थ भर जाता है, जिससे गंभीर सांस फूल सकती है।
     
  • शरीर ऊर्जा के लिए खुद को ही इस्तेमाल करने लगता है और मांसपेशियों की शक्ति तेजी से घटने लगती है। ऑक्सीजन सिलेंडर बदलने या हार्नेस बांधने जैसे आसान कार्य करने में भी कठिनाई होती है।
     
  • महत्वपूर्ण अंगों की रक्षा के लिए रक्त का प्रवाह उंगलियों, पैर की उंगलियों और त्वचा से हटकर दूसरी दिशा में चला जाता है और हाथ-पैर तेजी से जम जाते हैं।
     
  • ऑक्सीजन की कमी से निर्णय लेने की क्षमता इतनी बुरी तरह प्रभावित होती है कि पर्वतारोही कभी-कभी गलत दिशा में चलते रहते हैं या बचाव सहायता लेने से इनकार कर देते हैं।

क्यों कहते हैं इसे डेथ जोन
Image Source : INDIATVक्यों कहते हैं इसे डेथ जोन

अगर एवरेस्ट पर चढ़ाई करनी हो तो क्या करें

  • डेथ जोन में कभी भी बहुत देर तक न रुकें, तेजी से चढ़ें, जल्दी से शिखर पर पहुंचें और तुरंत नीचे उतरें।
     
  • यदि स्थिति बिगड़ती है तो वापस लौट जाएं, एवरेस्ट पर कई मौतें इसलिए होती हैं क्योंकि पर्वतारोही अभियान में वापस लौटने के समय को नजरअंदाज कर देते हैं।
     
  • पूरक ऑक्सीजन का सही उपयोग करें, शिखर के पास ऑक्सीजन खत्म होना जल्दी ही जानलेवा हो सकता है।
     
  • निर्जलीकरण ऊंचाई की बीमारी और मानसिक भ्रम को बढ़ा देता है।
     
  •  शिखर पर चढ़ने से पहले हफ़्तों तक धीरे-धीरे ऊंचाई के अनुकूल होने में समय बिताएं।
     
  •  पर्वतारोहियों की बेहतर जांच होनी चाहिए ताकि पहाड़ पर होने वाली मौतों को कम किया जा सके।
     
  • अपनी तमाम खूबसूरती के बावजूद, एवरेस्ट एक ऐसी जगह है जहां प्रकृति इंसानों की क्षमताओं की चरम सीमा तक परीक्षा लेती है। 8,000 मीटर से ऊपर, जीवन ही क्षणभंगुर हो जाता है, तो डेथ जोन तक पहुंचना और वापस लौट आना अपने आप में बड़ी बात है।
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