पैंक्रियाटिक कैंसर दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में से एक है और भारत में इसके मरीजों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। दर्दनाक सच्चाई यह है कि यह बीमारी जितनी आम होती जा रही है, उतनी ही कम समझी और कम जागरुता वाली भी है। पैंक्रियाटिक कैंसर के शुरुआती लक्षण बेहद हल्के होते हैं और कई बार लोग इन्हें समझ नहीं पाते हैं। खट्टी डकारें, कमर दर्द, पेट में हल्की जलन और थकान को लोग सामान्य बात समझ बैठते हैं। यही वजह है कि पैंक्रियाटिक कैंसर को ‘साइलेंट कैंसर’ कहा जाता है।
डॉक्टर रमन नारंग (कंसल्टेंट मेडिकल एवं हेमेटोलॉजी ऑन्कोलॉजी, MOC कैंसर केयर एंड रिसर्च सेंटर, लाजपत नगर, नई दिल्ली) ने बताया कि अब कैंसर केयर की तस्वीर बदल रही है। प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी, जेनेटिक टेस्टिंग और एज के हिसाब से अलग अलग टेस्ट होते हैं जिससे यह समझने में मदद मिलती है कि किसे पैंक्रियाटिक कैंसर का ज़्यादा जोखिम है, शुरुआती बदलाव क्यों महत्वपूर्ण हैं और परिवार खुद को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
पैंक्रियाटिक कैंसर के शुरुआत लक्षण
डॉक्टर नारंग ने कहा जिन मरीजों को मैं देखता हूं, "उनमें ज्यादातर की एक जैसी कहानी सुनाई देती है। डॉक्टर साहब, लगा बस उम्र का असर है, तनाव है या गैस की प्रॉब्लम है।"
- बिना वजह वजन कम होना
- अचानक शुगर लेवल बढ़ जाना (50 की उम्र के बाद नई डायबिटीज़ खास संकेत है)
- भूख कम लगना
- हल्के रंग के मल
- पीलिया
अलग-अलग देखने पर ये सभी लक्षण आम लगते हैं, लेकिन अगर एक साथ हों, तो तुरंत जांच ज़रूरी है।
प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी क्यों महत्वपूर्ण है?
पैंक्रियाटिक कैंसर कई बार जेनेटिक बदलावों से प्रभावित होता है और आज इनमें से कई बदलावों का इलाज संभव है। मॉडर्न कैंसर केयर की शुरुआत अब सिर्फ कीमोथेरेपी से नहीं, बल्कि मॉलिक्यूलर टेस्टिंग से होती है। इससे पता चलता है।
- DNA रिपेयर जीन में बदलाव (BRCA1/2, PALB2)
- कौन-सा मरीज टार्गेटेड थेरेपी से लाभ लेगा
- किसे इम्यूनोथेरेपी उपयुक्त है
- कौन-से कैंसर पैटर्न परिवारों में चलते हैं
हर पैंक्रियाटिक कैंसर मरीज फिर उम्र चाहे जो हो उनके लिए जेनेटिक टेस्टिंग आज बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। बुजुर्ग मरीजों को इसे उम्र का असर समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जेरियाट्रिक ऑन्कोलॉजी में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोग उम्र के कारण लक्षणों को सामान्य मान लेते हैं। सिर्फ कमर दर्द तो होता ही है, इस उम्र में भूख कम लगना आम बात है, लेकिन सच यह है कि बुजुर्गों में पैंक्रियाटिक कैंसर की प्रगति अलग तरीके से होती है। आज फ्रेलिटी असेसमेंट की मदद से बुजुर्ग मरीजों के लिए सुरक्षित, व्यक्तिगत इलाज तय किया जाता है। कई लोग 70–80 साल की उम्र में भी सही इलाज करवाते हैं और ठीक हो जाते हैं।
युवाओं में पैंक्रियाटिक कैंसर
युवा में भी पैंक्रियाटिक कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। हालांकि यह बीमारी युवाओं में कम होती है, लेकिन जब होती है तो अक्सर ये कारण पाए जाते हैं।
- आनुवंशिक सिंड्रोम
- धूम्रपान
- मोटापा
- क्रॉनिक पैंक्रियाटाइटिस
- हाई-फैट डाइट
- अत्यधिक शराब सेवन
युवा मरीजों में इलाज से पहले फर्टिलिटी प्रिज़र्वेशन, जेनेटिक काउंसलिंग और लंबे समय की हेल्थ प्लानिंग जरूरी है। डॉक्टर नारंग ने बताया कि एक घटना जिसने मेरी सोच बदल दी। 'कुछ साल पहले 58 वर्षीय मरीज आए। बस हल्की बदहजमी और शुगर अचानक बढ़ने की शिकायत थी। उन्हें लगा काम का तनाव है, कुछ नहीं। लेकिन जांच में पता चला कि कैंसर काफी बढ़ चुका था। उनकी एक बात आज भी मेरे मन में है “काश मैंने इन छोटे संकेतों को गंभीरता से लिया होता।” यही कारण है कि जागरूकता बेहद ज़रूरी है।'
पैंक्रियाटिक कैंसर से बचने के उपाय
- स्वस्थ वजन बनाए रखें
- धूम्रपान छोड़ें
- शराब सीमित रखें
- डायबिटीज़ को नियंत्रित रखें
- फाइबर और प्लांट-बेस्ड फूड बढ़ाएं
- परिवार का मेडिकल इतिहास डॉक्टर को जरूर बताएं
- सलाह मिलने पर जेनेटिक टेस्ट कराएं
पैंक्रियाटिक कैंसर में क्या न करें
- 2–3 हफ्ते से ज़्यादा चलने वाले नए लक्षणों को नज़रअंदाज़ न करें
- यह न मानें कि पैंक्रियाटिक कैंसर केवल बुजुर्गों में होता है
- बार-बार गैस-एसिडिटी समझकर जांच को टालें
- लगातार चल रही पाचन समस्या में सिर्फ घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें
- जितना जल्दी पहचानेंगे, उतना बेहतर परिणाम मिलेगा
- जागरूकता की, सही फैसलों की और समय पर कदम उठाने की
Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। इंडिया टीवी किसी भी प्रकार के दावे की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता है।)