पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इस समय सिर्फ कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन बनाने में जुटे हुए हैं। इसी बीच प्लाज़्मा थेरेपी का नाम सामने आया है। इस थेरेपी के आते ही लोगों के मन में एक उम्मीद जग गई है। जानें आखिर क्या है प्लाज़्मा थेरेपी और कैसे किया जाता है डोनेशन। एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया से इस प्रोसेस के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
क्या है प्लाज़्माथेरेपी?
एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने बताया कि यह एक तरह का एंटीबॉडी होता है जिसे थेरेपी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह खून का 55 प्रतिशत भाग होता है। यह शरीर में जाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
यह एंटीबॉडी तभी बनता है जब वह व्यक्ति उस वायरस या बैक्टीरिया से पीड़ित हो। ऐसे में जो मरीज कोरोना की वजह से बीमार हुआ था, जब वह ठीक हो जाता है तो उसके शरीर में इस वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बन जाते है। जिसके बाद इसी एंटीबॉडी के द्वारा दूसरे मरीजों को सही किया जा सकता है।
क्या होगा प्लाज़्मा डोनेशन?
जब कोई मरीज सही हो जाता है और वह प्लाज्मा डोनेट करना चाहता है तो सबसे पहले उसके खून का टेस्ट किया जाता है। जिसके बाद उसके शरीर से ऐस्पेरेसिस तकनीक से खून निकाला जाता है। जिसके खून से प्लाज़्मा जैसे अवयवों को निकालकर बाकी खून को फिर से वापस मरीज को डाल दिया जाता है। साधारण शब्दों में कहें तो एक हाथ से खून निकाला जाता है और दूसरे हाथ से उस खून को वापस कर दिया जाता है। इस प्रोसेस को करने से 60 से 90 मिनट लगते हैं।
डॉक्टर रणदीप के अनुसार एंटीबॉडी खून के प्लाज़्मा में मौजूद होता है, डोनर के शरीर से लगभग 800 मिलीलीटर प्लाज़्मालिया जाता है। जिसके जरिए 3-4 व्यक्तियों को सही किया जा सकता है।