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फिर छिड़ी बहस रमज़ान ग़लत या रमदान सही

 Written By: India TV News Desk
 Published : May 26, 2017 03:03 pm IST,  Updated : May 26, 2017 03:03 pm IST

रमज़ान में मुसलमान 29 से 30 दिन तक रोज़ा रखते हैं और फिर ईद मनाते हैं। हमेशा की तरह इस बार भी फिर बहस शुरु हो गई कि ये रमज़ान है या रमदान...? यानी सही शब्द क्या इसे लेकर दशकों से बहस चली आ रही है।

Ramzan- India TV Hindi
Ramzan

भारत में रमज़ान का महीना रविवार से शुरु है वाला है हालंकि ये निर्भर करेगा चांद दिखने पर। रमज़ान में मुसलमान 29 से 30 दिन तक रोज़ा रखते हैं और फिर ईद मनाते हैं। हमेशा की तरह इस बार भी फिर बहस शुरु हो गई कि ये रमज़ान है या रमदान...? यानी सही शब्द क्या इसे लेकर दशकों से बहस चली आ रही है।

ऐसा माना जाता है कि रमज़ान शब्द फ़ारसी भाषा की देन है और दुनिया के इस हिस्से में ज़्यादातर मुसलमान इस शब्द का उच्चारण रमज़ान ही करते हैं। इस बीच रमज़ान अचानक बदलकर रमदान हो गया जोकि अरबी भाषा का शब्द है। सैकड़ों बरस पहले अरब में द का उच्चारण जिस तरह से किया जाता था वैसा उच्चारण न तो हिंदी में होता है और न ही अंग्रेज़ी में। भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान इसे ‘द’ कहते हैं तो पश्चिमी देशों के मुसलमान ‘द’ को ‘ड’ कहते हैं।

 
'अरबी भाषा में 'ज़्वाद' अक्षर का स्वर अंग्रेज़ी के 'ज़ेड' के बजाए 'डीएच' की संयुक्त ध्वनित होता है इसीलिए अरबी में इसे रमदान कहते हैं जबकि उर्दू में आमतौर पर इसे रमज़ान कहते हैं।

सऊदी संस्कृति का असर
 
इसके अलावा इसका एक कारण भारत और सऊदी अरब से बीच बढ़ते सांस्कृतिक संबंध भी है। भारत से अब काफी संख्या में मुसलमान अरब जाते है और ज़ाहिर लौटने पर वहां की बोलचाल, वेशभूषा और वहां के रहन-सहन का असर उन पर देखा जा सकता है।

क़ुरान जिस उच्चारण के साथ उस समय पढ़ी जाती रही होगी वैसी अब नहीं पढ़ी जाती
 
कुछ शोधपत्रों से पता चलता है कि जब कुरान लिखी गई थी उस समय कई शब्दों का उच्चारण आज से एकदम अलग था। इस बात के कई उदाहरण मिल जाएंगे कि कैसे समय के साथ शब्दों, अक्षरों और उच्चारण में बदलाव आते रहे हैं। क़ुरान जिस उच्चारण के साथ उस समय पढ़ी जाती रही होगी वैसी अब नहीं पढ़ी जाती।

जानें क्या है रमज़ान और कैसे रखे जाते हैं रोज़े

भारतीय इस्लाम में फ़ारसी भाषा का दबदबा
 
भारती में इस्लाम मूल रूप से अरब के बजाय मध्य एशिया और ईरान से आया है। भारत में एक लंबे समय तक फ़ारसी भाषा का दबदबा रहा था और यही वजह है कि भारती में इस्लाम की भाषा पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। क़ुरान में नमाज़ के लिए अरबी शब्द 'सालाह' है न कि नमाज़ लेकिन सालाह को फ़ारसी ने नमाज़ बना दिया। इसी तरह रोज़ा को अरबी में 'साउम' कहते हैं लेकिन फ़ारसी में ये रोज़ा हो गया।

खाड़ी में सऊदी अरब सबसे संपन्न, प्रभावशाली और धर्म के लिहाज़ से सबसे कट्टर देश माना जाता है जहां कट्टर विचारधारा वहाबी का बोलबाला है। सऊदी अरब में मुसलमान वहाबी धारा को सबसे ज्यादा मानते हैं।
 
बताने की ज़रुरत नहीं कि तेल के अकूत भंडार की वजह से सऊद अरब बेहद समृद्ध और मज़बूत हो गया है। आज विश्व में तेल की क्या क़ीमत होगी ये वो तय करता है। औद्दोगिकिकरण के युग में विश्व अर्थ-व्यवस्था तेल पर ही निर्भर करती है। दूसरी तरफ भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान लगातार पिछड़ते हुए आर्थिक रुप से बहुत कमज़ोर हो गए हैं। शायद यही वजह है कि यहां के मुसलमानों का एक तबका अरबी शब्दों को अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाने में लगा हुआ है। वे ''अरब वाले मुसलमान'' बन रहे हैं। इसीलिए ‘रमज़ान’ तेज़ी से 'रमदान' हो रहा है। ख़ुदा जैसे बेहद प्रचलित शब्द पर भी अरबी का मुलम्मा चढ़ रहा है और इसीलिए ‘ख़ुदा हाफ़िज़’ भी ‘अल्लाह हाफ़िज़’ हुआ जाता है।
 
भारतीय उपमहाद्वीप में ये बदलाव इस उपमहाद्वीप की संस्क़ति पर हमले के रुप में देखा जा सकता है।

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