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विदेशियों का दिल जीते बगैर भारत नहीं बन सकता विश्व के विकास का इंजन

 Written By: India TV News Desk
 Published : Aug 19, 2016 01:20 pm IST,  Updated : Aug 19, 2016 01:20 pm IST

हाल में भारतीय प्रधान मंत्री का अमरीका-दौरा भारतीय कूटनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण और सराहनीय रहा है। इसमें अब कोई संदेह नहीं की प्रधान मंत्री भारतीय कूटनीति को नए आयाम दे रहें हैं।

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हाल में भारतीय प्रधान मंत्री का अमरीका-दौरा भारतीय कूटनीति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण और सराहनीय रहा है। इसमें अब कोई संदेह नहीं की प्रधान मंत्री भारतीय कूटनीति को नए आयाम दे रहें हैं। राजकीय एवं व्यापर-जगत के लोग भारत की प्रगति को बड़े ही करीब से देखने और समझने की कोशिश कर रहे हैं।  पिछले दो वर्षो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जितने राजनयिकों से मिले और जिस गति से राजनयिक और व्यापारिक संधियां हुई हैं, अभूतपूर्व एंव प्रशंसनीय है। विकास के सोपानों को नये आयामों को अंजाम देने के मध्य सरकार को यह समझना होगा कि यदि भारत को सचमुच विश्व के विकास का इंजन बनाना है तो अंतर्राष्ट्रीय नागरिकों के मन में भी जगह बनानी पड़ेगी।  यह ज़रूरी नहीं की राजनयिक एवं व्यापर जगत से मिल रहा समर्थन उन देशों की जनता का भी समर्थन दर्शाती हो। पिछले कुछ वर्षो में विदेशी सैलानियों एवं विद्यार्थियों के साथ भारत में जिस प्रकार का अशोभनीय व्यवहार किया गया है वह वसुधैव कुटुम्बकम की परंपरा का हिस्सा नहीं है। इससे हमारे देश की साख़ को धक्का लगा है ।

देश की राजधानी दिल्ली में अफ़्रीकी युवक की हत्या के बाद भारतीय मूल के लोगों के साथ एवं कांगो स्तिथ भारतीय दूतावास पर जो हमला हुआ एवं भारतीय मूल के व्यापारियों को दुकानें बंद रखने को कहा गया, वह बड़ी प्रतिक्रियाओं का संकेत है। जिस प्रकार से सभी अफ़्रीकी दूतावासों ने अपने नागरिकों के सुरक्षा की मांग की एवं अफ़्रीकी विद्यार्थयों को भारत आने से मना करने की बात की, इससे हमारी गरिमा को भी चोट पहुंच रही है। भारत में अफ़्रीकी देशों के लगभग २५,०००  छात्र प्रति वर्ष पढ़ने के लिए आते हैं जिसको बंद करने की धमकी अफ़्रीकी रजनायकों ने दे डाली है। वैश्वीकरण के युग में विदेशियों को अपने देश में सुरक्षित ना रख पाने में अक्षम होने से, भारत को विश्व के विकास का इंजन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है ।  

 
भारत में जिस प्रकार विदेशियों के प्रति दृष्टिकोण रखा जाता है एवं जिस प्रकार से विदेशियों के साथ व्यवहार किया जाता है वह सिर्फ दर्दनाक़ ही नहीं, देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए खतरनाक भी है। विदेशियों में भी हम रंग-भेद करने से नहीं चूकते। अफ़्रीकी  देशों के नागरिकों के साथ भिन्न व्यवहार होता रहा है जो हाल के दिनों में काफी बढ़ गया। काँगो के युवक ओलिविया को पिट-पिट कर मार देने की घटना रंग-भेद की मानसिकता एवं विदेशियों के साथ बदसलूकी का चरम उदाहरण है।इसका अर्थ कतई नहीं कि गोरों के साथ दुर्व्यवहार नहीं होता। २०१४ में डेनिश महिला के साथ बलात्कार एवं आये दिनों विदेशी के साथ छेडख़ानी की बात उनके ब्लोग्स एवं ख़बरों में सुनने को मिलता रहता है।  
 
देश में महिलाओं के साथ एवं विदेशी नागरिकों के साथ दुर्व्यवहार के कारण पर्यटन पर भी भरी नुकसान होता है। निर्भया काण्ड के बाद ही विदेशी सैलानियों के आगमन में ३५ प्रतिशत की कमी आ गयी थी। पर्यटन का हमारे देश के सकल घरेलु उत्पाद में लगभग ६.३ प्रतिशत का योगदान रहा है।  संगठित नौकरियों के कुल भागीदारी का लगभग १० प्रतिशत इस क्षेत्र में कार्य करते हैं जो की लगभग २ करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं । ६-७ करोड़ लोग असंगठित रोजगारों जैसे फोटो आदि खींचने का काम कर पर्यटन से जुड़े हुए हैं। हम आर्थिक नुकसानों का अनुमान तो आंकड़ों से जान जाते है लेकिन विश्व भर में विदेशियों के मन पर भारत के बारे में जो छवि बिगड़ती है उसका आंकड़ा नहीं मिल पाता।
 
भारतीय मूल के लोगों को विदेशों में महफूज़ रखने एवं अपनी अंतर्राष्ट्रीय साख़ को संरक्षित रखने के लिए हमें अन्य देशों के नागरिकों को भारत में संपूर्ण सुरक्षित माहौल देना  होगा। हमारे शहरों को भौतिक एवं मानसिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय बनाने की ज़रूरत है।  इसके लिए हमें सरकार, सामाजिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं नागरिकों के स्तर पर कार्य करने की ज़रूरत है। पहला, कई देश विश्व के लोगों को अपने देश बुलाकर देश के अलग-अलग सामाजिक, राजनितिक एवं आर्थिक मामलों से रु-ब-रु कराते हैं। इससे दूसरे देश के लोगो में मेज़बान देश की जानकारी एवं तालमेल बढ़ती है। अमेरीका के विदेश विभाग का आई. वी. एल. पी. कार्यक्रम एक अनूठा उदाहरण है जहां प्रतिवर्ष लगभग ६००० लोगों को दुनिया भर से अमेरिका बुलाते हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सभी भागीदारों को राजनेताओं, शोधकर्ताओं, विद्यार्थयों, सामाजिक संस्थानों एवं नागरिकों से मिलवाया जाता है।  भारतीय विदेश मंत्रालय अफ़्रीकी  देशों के विकास के लिए खर्च कर रही है और ऐसे में इस तरह के नए कार्यक्रम शुरू करने से भारतीय एवं अफ़्रीकी लोगो के तालमेल के लिए कारगर सिद्ध हो सकता है।

दूसरा, विदेश मंत्रालय दक्षिण-दक्षिण सहयोग के तहत  भारतीय समाजिक संस्थानों  एवं संगठनों के माध्यम से अफ़्रीकी देशों के सामाजिक संगठनों को विकास कार्यों के लिए सक्षम बनाने का कार्य कर रही है। इस कार्यक्रम में 'सेवा' जैसे प्रमुख संगठन सक्रिय है और 'सेवा' ने तो अपने प्रोजेक्ट का नाम भी 'सेतु अफ्रीका' दिया है ताकि भारत और  अफ़्रीकी देशों के बीच यह एक दोस्ती का रास्ता दिखा सके। भारत सरकार को ऐसे कार्यक्रमों को ज़्यादा सक्रिय एवं लोकप्रिय करना चाहिए जिससे की भारत एवं अफ़्रीकी देशों के लोगो के बीच तालमेल बेहतर हो सके।

तीसरा, कई देश प्रमुख शहरों में स्थानीय नागरिकों के घर पर मेहमानवाज़ी का कार्यक्रम चलाते हैं जिससे अन्य देशो से आये मेहमान एवं स्थनीय लोग एक-दुसरे के जीवन एवं संस्कृति से अवगत हो पाते हैं। अमेरिका के कई शहरों में यह कार्यक्रम नगर निगम एवं सामाजिक संस्थानें मिलकर चलाते हैं।  भारत में भी इस कार्यक्रम को शुरू करने का वक़्त आ गया है जिससे लोगों के बीच रिश्ता कायम करने में मदद मिलेगी । इसके अलावा विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की रंग-भेद जैसे जटिल समस्यायों का अंत करने में ख़ास भूमिका होनी चाहिये। शैक्षणिक संस्थानों में इन मुद्दों पर विद्यार्थयों को शिक्षित करना चाहिए एवं पाठ्यक्रम में भी डाला जाना चाहिये ताकि आने वाले समय में हमारे बच्चे अंतर्राष्ट्रीय नागरिकों को समझने योग्य बन सकें।
 
भारत अवश्य ही विश्व के विकास का इंजन बन सकता है लेकिन उसके लिए ईंधन भी उच्च कोटि का इस्तेमाल करना होगा। यह ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं बल्कि हम सबकी होनी चाहिए। संस्थानों एवं नागरिकों के सहयोग से ही विकास के इंजन बनने की बात वास्तविक रूप ले पाएगा।

(डॉ संजय कुमार हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मेसन फैलो रह चुके हैं एवं ‘सेवा’ भारत के निदेशक हैं।)

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