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सिंहस्थ: भागवत बोले पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं विदेशी कंपनियां

 Written By: India TV News Desk
 Published : May 12, 2016 04:10 pm IST,  Updated : May 12, 2016 04:10 pm IST

उज्जैन के सिंहस्थ मेले में पहुंचे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमें विकास और पर्यावरण के आपसी टकराव को रोकने के लिए मध्यमार्ग निकालना होगा।

Mohan Bhagwat
- India TV Hindi
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निनोरा (मध्यप्रदेश): विकास और पर्यावरण के हितों का टकराव रोकने के लिए मध्यमार्ग के आधार पर नीतियां बनाने की वकालत करते हुए गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि लोक व्यवहार में पूरी प्रामाणिकता से इन नीतियों का पालन भी सुनिश्चित होना चाहिए। भागवत ने उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ मेले की पृष्ठभूमि में मध्यप्रदेश सरकार के आयोजित अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ के उद्घाटन समारोह में कहा, ऐसा कोई नहीं बोलता कि पर्यावरण को बर्बाद हो जाना चाहिए। लेकिन बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आती हैं, तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। विकास और पर्यावरण के टकराव का विश्व के पास फिलहाल कोई जवाब नहीं है। इस टकराव को रोकने के लिए हमें दोनों पक्षों (विकास और पर्यावरण) के हितों को देखते हुए मध्यमार्ग निकालना होगा और इस बीच के रास्ते पर चलकर आचरण करना होगा।

उन्होंने कहा, हमें ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिनसे (विकास और पर्यावरण के टकराव को रोकने के लिए) मध्यमार्ग निकले। तथागत बुद्ध ने धर्म को मध्यमार्ग ही कहा है। हमें ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनकी मदद से मध्यमार्ग पर चलना सुनिश्चित हो सके। भागवत ने कहा, नीतियां बनाने वाले शासक और प्रशासक हमारे समाज से ही आते हैं। आम लोगों को इन शासक-प्रशासकों को ठीक नीतियां बनाने के लिए बाध्य करना चाहिए। फिर आम लोगों को इन नीतियों का पूरी प्रामाणिकता से पालन भी करना चाहिए। जनता को इस बात की शिक्षा देने के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत होने चाहिए।

संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि विज्ञान और अध्यात्म को परस्पर विरोधी होने की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि दोनों के तालमेल से वैश्विक समस्याओं के समाधान खोजे जाने चाहिए। उन्होंने कहा, हमें विज्ञान और अध्यात्म का सहारा लेकर इस बात का चिंतन करना होगा कि हमारे सत्य सनातन आध्यात्मिक मूल्यों के आधार पर ऐसी जीवन पद्धति कौन सी होनी चाहिए जो देश, काल और परिस्थिति के भी अनुरूप हो। लेकिन केवल चिंतन से काम नहीं होगा, बल्कि हमें नीतियां बनाकर इस चिंतन को आचरण में भी बदलना होगा।

संघ प्रमुख भागवत ने कहा, विश्व की नई रचना कैसी हो, इस अवधारणा का मॉडल हमें मौजूदा हालात के परिप्रेक्ष्य में अपने देश के जीवन मूल्यों के आधार पर तय करना होगा। भागवत ने कहा कि विज्ञान को भी समझ आ रहा कि दुनिया में कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें प्रयोगशालाओें के सूक्ष्मदर्शी यंत्र देख नहीं सकते। विज्ञान जितना उन्नत होता जा रहा है, उतना ही अध्यात्म के निकट आता जा रहा है। विज्ञान सत्य को जानने का तरीका है। लेकिन उसकी जानकारी अभी सीमित है।

संघ प्रमुख ने इस बात पर भी जोर दिया कि वैश्विक मसलों के हल के लिए संघर्ष के बजाय समन्वय की राह चुनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा, दुनिया अब विचार कर रही है कि हमें विविधता को न केवल स्वीकार करना चाहिए, बल्कि इसे सम्मानित भी करना चाहिए। लोग धीरे-धीरे इस बात को मानने लगे हैं कि हमें अपने अस्तित्व के लिए परस्पर संघर्ष के बजाए आपसी समन्वय का रास्ता अख्तियार करना होगा।

संघ प्रमुख ने अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ के आयोजन के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ की और कहा कि इस कार्यक्रम से सिंहस्थ मेले की वैचारिक परंपरा फिर जीवित हो गई है। इस सम्मेलन में गायत्री परिवार के अंतरराष्ट्रीय प्रमुख प्रणव पंड्या ने कहा, हम इन दिनों परिवर्तन के महान क्षणों से गुजर रहे हैं। आने वाले 10 वर्षों में भारत विश्व गुरू के रूप में उभरेगा और दुनिया का मार्गदर्शन करेगा। वर्ष 2026 तक राजनीति शुद्ध होगी और मनुष्य का मानस परिष्कृत होगा।

राज्यसभा सांसद के रूप में अपने मनोनयन को अस्वीकार करने वाली हस्ती ने जोर देकर कहा कि भारत के इतिहास में धर्मतंत्र और राजतंत्र की भूमिका समान रही है। धर्मतंत्र की मदद से ही राजतंत्र अपना राज-काज चलाता रहा है। पंड्या ने इस बात पर भी जोर दिया कि देश में संस्कृति और विद्या को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर ऐसा किया गया, तो घोटाले नहीं होंगे और मनुष्य का जीवन सुखी हो जाएगा।

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