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सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर SC में सुनवाई, कोर्ट ने 'अंधविश्वास', सती प्रथा पर बड़ी टिप्पणी की

 Reported By: Atul Bhatia Edited By: Kajal Kumari
 Updated : Apr 08, 2026 06:23 pm IST

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर दायर की गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में दूसरे दिन सुनवाई शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म पर तर्क लागू नहीं किया जा सकता है। जानें पल पल के अपडेट्स...

सुप्रीम कोर्ट में अहम...- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई Image Source : PTI

LIVE: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों के पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू कर दी है। कल भी इस मामले की सुनवाई हुई थी, जिसमें कोर्ट ने कई अहम बातें कही थीं। नौ जजों की पीठ विशेष रूप से अनुच्छेद 25 और 26 पर विचार करेगी, जो धर्म और धार्मिक संप्रदाय की स्वतंत्रता से संबंधित हैं। मंगलवार (7 अप्रैल, 2026) को पिछली सुनवाई में, केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी विशेष आयु वर्ग के किसी खास जेंडर को पूजा स्थल में प्रवेश करने से रोकना भेदभाव नहीं है।

जानें आज की सुनवाई से जुड़े पल पल के अपडेट्स...

सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर SC में सुनवाई शुरू

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  • 3:33 PM (IST)
    Posted by Vineet Kumar

    'अदालत केवल ‘अंधविश्वास’ के आधार पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती'

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सॉलिसिटर जनरल से महत्वपूर्ण सवाल पूछा। उन्होंने कहा कि अगर जादू-टोना को धार्मिक प्रथा का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास माना जाएगा या नहीं? उन्होंने आगे पूछा कि यदि ऐसे मामलों में विधायिका चुप रहती है, तो क्या अदालत ‘अछूते क्षेत्र’ के सिद्धांत का सहारा लेकर सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर ऐसी प्रथाओं पर रोक नहीं लगा सकती?

    इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंध लगा सकती है, लेकिन केवल ‘अंधविश्वास’ के आधार पर नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि अदालतों के पास यह अधिकार नहीं है कि वे तय करें कि कोई ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ अंधविश्वास है या नहीं, चाहे जज कितने भी विद्वान क्यों न हों।

  • 3:03 PM (IST)
    Posted by Kajal Kumari

    संविधान में 'आवश्यक' शब्द का कोई उल्लेख नहीं है

    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि संविधान में 'आवश्यक' शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। जस्टिस अमानुल्लाह ने सॉलिसिटर जनरल से असहमति जताई कहा-अदालत को यह तय करने का अधिकार है कि कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं। इसके बाद विधायिका अदालत के फैसले के आधार पर कानून बना सकती है। एसजी मेहता ने कहा कि वह इससे सहमत नहीं हैं। जो बात मेरे लिए अंधविश्वास है, वह नागालैंड के लिए धार्मिक प्रथा हो सकती है।

    एसजी तुषार मेहता ने कहा कि महाराष्ट्र में काला जादू कानून लागू है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि फिर, मान लीजिए कि विधायिका इसे अंधविश्वास या  धार्मिक प्रथा करार देते हुए कोई कानून पारित करती है, तो वह कानून न्यायोचित हो जाएगा। इसलिए, जैसा कि आप कहते हैं, अदालतें पूरी तरह से इस मामले से बाहर नहीं हैं।

  • 2:21 PM (IST)
    Posted by Kajal Kumari

    राज्य का हस्तक्षेप धर्म पर नहीं

    एसजी तुषार मेहता ने कहा, राज्य का हस्तक्षेप धर्म पर नहीं, बल्कि केवल धार्मिक अनुष्ठानों पर है। मेहता ने नौ न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष संवैधानिक संदर्भ में उठाए गए सात प्रश्नों पर अपनी बात रखी। पहला प्रश्न अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे और सीमा से संबंधित है। मेहता का कहना है कि संविधान में "धर्म" शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है, और इसकी कोई सटीक परिभाषा संभव नहीं है। मेहता ने कहा,  राज्य का हस्तक्षेप धर्म पर नहीं, बल्कि केवल धार्मिक अनुष्ठानों पर है।

  • 1:45 PM (IST)
    Posted by Kajal Kumari

    धार्मिक प्रथा का निर्धारण उस धर्म के दर्शन के आधार पर होना चाहिए

    न्यायमूर्ति नागरत्ना का कहना है कि 'अत्यावश्यक धार्मिक प्रथा' का निर्धारण उस धर्म के दर्शन के आधार पर होना चाहिए। न्यायमूर्ति ने कहा,  ऐसे मामलों में न्यायालय का दृष्टिकोण भी यही रहा है कि आवश्यक धार्मिक प्रथा का निर्धारण उस विशेष धर्म के दर्शन के परिप्रेक्ष्य से किया जाए। उन्होंने आगे कहा, आप किसी अन्य धर्म को लागू करके यह नहीं कह सकते कि यह आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। न्यायालय का यह दृष्टिकोण निश्चित रूप से सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।

  • 1:37 PM (IST)
    Posted by Kajal Kumari

    कोर्ट ने अंधविश्वास, जादू-टोना, नरभक्षण, सती प्रथा के बारे में क्या कहा

    पीठ ने कहा, "अदालत को यह तय करने का अधिकार है कि क्या यह प्रथा अंधविश्वास है। इसके बाद विधायिका को इस पर क्या करना है, यह तय करना होगा। लेकिन अदालत में आप यह नहीं कह सकते कि 'अंतिम निर्णय विधायिका का है'। ऐसा नहीं हो सकता..." पीठ ने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए अन्य अंधविश्वासी प्रथाओं - जादू-टोना, नरभक्षण और सती - के उदाहरण दिए।

  • 1:26 PM (IST)
    Posted by Kajal Kumari

    धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं, कोर्ट तय नहीं कर सकती-केंद्र सरकार

    केंद्र का कहना है कि अदालतों को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का तर्क है कि अदालतों को, चाहे न्यायाधीश कितने भी विद्वान क्यों न हों, यह तय करने का कोई अधिकार या क्षेत्राधिकार नहीं है कि कोई 'आवश्यक' धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। सॉलिसिटर जनरल ने न्यायमूर्ति बागची से कहा कि अदालत को किसी प्रस्ताव का परीक्षण अतिवादी आधार पर नहीं करना चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने जवाब दिया कि तर्क की तार्किक समझ का आकलन करने के लिए रिडक्टियो एड एब्सर्डम सिद्धांत का प्रयोग किया जाता है।

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