नई दिल्ली: आज अपने देश में अमेरिका की तर्ज पर राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपनाए जाने की जरूरत महसूस की जाने लगी है, क्योंकि हमारी मौजूदा संसदीय प्रणाली में ऐसी कई खामियां हैं जो हमें इसका विकल्प तलाशने को कह रही हैं। इस बारे में कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो हर भारतीय के जहन में उठ रहे हैं। इन सवालों के जवाब अब एक किताब के रूप में सामने आए हैं। (ये भी पढ़ें: भारत बना विश्व का चौथा शक्तिशाली देश, ये है इसकी सबसे बड़ी ताकत....)
वरिष्ठ लेखक एवं स्तंभकार भानु धमीजा ने अपनी पुस्तक 'भारत में राष्ट्रपति प्रणाली : कितनी जरूरी, कितनी बेहतर' में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की जरूरत और उससे जुड़े सवालों के जवाब विस्तार से दिए हैं। भानु धमीजा ने कहा, "यही सही समय है कि हम शासन के अपने मौजूदा तरीके पर विचार करें। इसका विकल्प ढूंढा जाना जरूरी है, जो राष्ट्रपति प्रणाली के रूप में हमारे सामने है।"
देश की मौजूदा संसदीय प्रणाली से असंतुष्ट धमीजा कहते हैं, "संसदीय प्रणाली में केंद्र सरकार के पास अत्यधिक शक्तियां होने से राज्यों की शक्तियां घट गई हैं। वह कहते हैं, "मैं राष्ट्रपति प्रणाली का हिमायती हूं, क्योंकि इससे शक्तियों का केंद्रीकरण नहीं होता और राज्यों को भी शक्तियां मिलती हैं।"
भारत जैसे विभिन्नता वाले देश में राष्ट्रपति प्रणाली कितनी कारगर हो सकती है? इसके जवाब में धमीजा कहते हैं, "अन्य देशों के लिए संसदीय प्रणाली कारगर हो सकती है, लेकिन जातियों और धर्मो में बंटे भारत जैसे देश के लिए राष्ट्रपति प्रणाली अधिक कारगर है। मौजूदा शासन प्रणाली ने हमारी पहलकदमी की क्षमता खत्म कर दी है।"
लेखक कहते हैं, "मैं 18 वर्षो तक अमेरिका में रहा हूं। इस दौरान मैंने अमेरिकी शासन व्यवस्था का अध्ययन किया है और उसे अनुभव किया है। मैंने भारत लौटने के बाद यहां की संसदीय प्रणाली की खामियों पर गौर किया और गहराई में जाने पर स्तब्ध रह गया। इस दिशा में वर्षो के शोध के बाद मुझे पता चला कि मौजूदा संसदीय प्रणाली न केवल हमारे जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश के लिए अनुपयुक्त है, बल्कि हम इसकी कमियों के दुष्परिणाम भुगतने के लिए भी अभिशप्त हैं। मेरे हर तर्क के पीछे वर्षो का गहन अध्ययन है।"
स्तंभकार भानु धमीजा ने कहा, "पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली को तरजीह देने की बात कह चुके हैं। महात्मा गांधी, अंबेडकर और पटेल भी संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली को ज्यादा तवज्जो देते आए हैं। मैंने भी अपनी किताब में अमेरिका की तरह अपने देश में राष्ट्रपति प्रणाली अपनाए जाने की वकालत की है।"
उन्होंने अपनी किताब में बताया है कि देश की मौजूदा संसदीय प्रणाली अस्तित्व में कैसे आई और यह किस तरह देश की समस्याओं का मूल कारण बनी। वर्षों के गहन शोध पर आधारित यह पुस्तक भारत के भविष्य को लेकर एक आमूल पुनर्विचार की दलील पेश करती है। इस पुस्तक में यह बताया गया है कि कैसे अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली हमारे देश में संसदीय प्रणाली का आदर्श विकल्प साबित हो सकती है।
धमीजा ने कहा, "मैंने लगभग 10 साल पहले मैंने इस विषय पर लिखने की सोची थी। इस पर मैंने सबसे पहले अंग्रेजी में एक किताब 'व्हाइ इंडिया नीड्स द प्रेजिंडेशियल सिस्टम' लिखी थी, जो 2015 में विमोचित हुई थी। इसे पढ़ने के बाद इसे हिंदी में भी प्रकाशित करने की सोची, ताकि एक बड़े वर्ग तक अपनी बात पहुंचा सकूं।"
वह कहते हैं, "सत्ता में बैठे नेताओं की इस प्रणाली को बदलने में जरा भी रुचि नहीं है। शासन में बदलाव इस तरह होना चाहिए कि जनता के हाथ में शक्तियां अधिक और नेताओं के हाथ में कम हो। राष्ट्रपति प्रणाली की सबसे बड़ी शक्ति यही मानी जाती है कि वह सत्ता को बांटती है। वह किसी एक संस्था को शक्तियां नहीं देती हैं।"
धमीजा कहते हैं कि मौजूदा प्रणाली के तहत देश का पतन हुआ है। देश के नागरिकों के अधिकारों, उनके जीवन की गुणवत्ता का पतन हुआ है। वह कहते हैं, "राष्ट्रपति प्रणाली का एक मूल सिद्धांत यह है कि सरकार का मुखिया सीधा जनता द्वारा चुना जाए। राष्ट्रपति प्रणाली लागू हो और देश का मुखिया जनता द्वारा चुनाव जाए जैसा कि अमेरिका में होता है।"
हालांकि, धमीजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से प्रभावित हैं। वह कहते हैं, "मोदी अच्छा काम कर रहे हैं। उनके सामने सुनहरा अवसर है कि वह भारत की मौजूदा प्रणाली की मूल समस्याओं का हल निकालें। उनके पास जनता का समर्थन भी है, वह उसका लाभ उठाएं।"
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