संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। डीलिमिटेशन बिल को लेकर जहां विपक्षी दलों के बीच मतभेद की खबरें आ रही हैं वहीं, सरकार सांसदों के जादुई आंकड़ा से महज छह सीट पीछे है। माना जा रहा है कि सरकार जरुरी नंबर का जुगाड़ आसानी से कर लेगी। इन्हीं सब मुद्दों को लेकर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' कार्यक्रम में चर्चा हुई। कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, MATRIZE के डायरेक्टर मनोज सिंह और इंडिया टीवी के पॉलिटिकल एडिटर देवेंद्र पाराशर मौजूद रहे।
क्या विपक्ष के भीतर है पहले जैसी एकजुटता
एक ओर जहां सरकार ने अभी तक आधिकारिक तौर पर अपने विधायी एजेंडे का पूरा खुलासा नहीं किया है, लेकिन कांग्रेस ने दावा किया है कि सरकार महिला आरक्षण, परिसीमन (डीलिमिटेशन), वन नेशन-वन इलेक्शन, एफसीआरए और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में संशोधन जैसे अहम विधेयक ला सकती है। कांग्रेस ने साफ संकेत दिया है कि वह इन सभी विधेयकों का विरोध करेगी।
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष के सभी दल कांग्रेस के साथ खड़े होंगे? हाल के घटनाक्रम इसके उलट तस्वीर पेश कर रहे हैं। एनसीपी (शरद पवार), डीएमके और उद्धव ठाकरे गुट जैसे दलों के नेताओं के बयान बताते हैं कि वे किसी भी विधेयक पर अंतिम फैसला उसका मसौदा देखने के बाद ही करेंगे। सुप्रिया सुले ने भी कहा कि यदि परिसीमन में सभी राज्यों की सीटें समान अनुपात में बढ़ाई जाती हैं तो उनकी पार्टी उस पर विचार कर सकती है। इससे यह संकेत मिलता है कि विपक्ष के भीतर पहले जैसी एकजुटता दिखाई नहीं दे रही।
तैयारियों में जुटी सरकार
'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में यह भी सवाल उठा कि कांग्रेस ने विपक्षी दलों के साथ समय रहते रणनीति क्यों नहीं बनाई। सरकार के संभावित एजेंडे की चर्चा पिछले कई महीनों से हो रही थी, लेकिन कांग्रेस ने संसद सत्र से ठीक पहले अपनी रणनीति बैठक की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पहले ही सहयोगी दलों के साथ बैठकर साझा रणनीति बनाई जाती, तो विपक्ष अधिक संगठित दिखाई देता। अब कई क्षेत्रीय दल अपने-अपने राजनीतिक हितों को देखते हुए स्वतंत्र रुख अपनाते नजर आ रहे हैं।
दूसरी ओर सरकार की तैयारियों को लेकर भी चर्चा हुई। बताया गया कि गृह मंत्री अमित शाह संसद सत्र शुरू होने से पहले भी अपने कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि सरकार आवश्यक राजनीतिक और संसदीय तैयारी पहले ही कर चुकी है। यही वजह है कि सरकार को अपने विधेयकों के लिए पर्याप्त समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।
संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट आने की संभावना
वन नेशन-वन इलेक्शन पर भी चर्चा का बड़ा हिस्सा केंद्रित रहा। संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट आने की संभावना और चुनाव आयोग की यह राय कि छह महीने की तैयारी में पूरे देश में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं, इस बहस को और महत्वपूर्ण बना रही है। वहीं परिसीमन और महिला आरक्षण को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए। एक पक्ष का मानना है कि ये कदम 2029 के चुनावों को ध्यान में रखकर उठाए जा रहे हैं, जबकि दूसरा पक्ष इसे लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक और प्रशासनिक योजना का हिस्सा मानता है।
दूरगामी राजनीतिक सोच के साथ आगे बढ़ रही सरकार
चर्चा में यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की कार्यशैली हमेशा लंबी अवधि की योजना पर आधारित रही है। उनके कई बड़े फैसलों का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया गया कि सरकार केवल अगले चुनाव को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि दूरगामी राजनीतिक और प्रशासनिक बदलावों की सोच के साथ आगे बढ़ती है। महिला आरक्षण, परिसीमन और वन नेशन-वन इलेक्शन को भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा बताया गया।
फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि संसद के मानसून सत्र में विपक्ष किस हद तक एकजुट रह पाएगा। यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अलग रुख अपनाते हैं, तो सरकार के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सरकार का विरोध करने की नहीं, बल्कि पूरे विपक्ष को एक मंच पर बनाए रखने की भी होगी। अब सबकी नजरें संसद सत्र पर टिकी हैं, जहां इन राजनीतिक समीकरणों की असली तस्वीर सामने आएगी।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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