अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, चर्चा का केंद्र सिर्फ चोरी नहीं, बल्कि इस मुद्दे पर हो रही राजनीति और उसके संभावित चुनावी असर को लेकर है। इसी विषय पर 'कॉफी पर कुरुक्षेत्र' में हुई चर्चा में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। इस दौरान कार्यक्रम में शो के एंकर और इंडिया टीवी के सीनियर एग्जिक्यूटिव एडिटर सौरव शर्मा के साथ गेस्ट के रूप में विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय सह मंत्री एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय शंकर तिवारी, सेफोलॉजिस्ट अमिताभ तिवारी और पॉलिटिकल एनालिस्ट शांतनु गुप्ता मौजूद रहे।
'जमीन पर नहीं दिख रहा चढ़ावा चोरी मुद्दे का असर'
चर्चा के दौरान कार्यक्रम में मौजूद विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय सह मंत्री विजय शंकर तिवारी ने दावा किया कि जमीन पर इस मुद्दे का वैसा असर दिखाई नहीं दे रहा, जैसा टीवी और राजनीतिक चर्चाओं में दिखाया जा रहा है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए कहा कि एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में जाने से पहले उन्हें आशंका थी कि लोग उनसे इस मुद्दे पर सवाल पूछेंगे, लेकिन वहां किसी ने भी राम मंदिर चोरी मामले को लेकर कोई प्रश्न नहीं किया।
लोगों को भरोसा- योगी सरकार कराएगी निष्पक्ष जांच
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी ने माना कि मामला गंभीर जरूर है, लेकिन लोगों में यह भरोसा भी दिखाई देता है कि योगी सरकार निष्पक्ष जांच कराएगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि एफआईआर, गिरफ्तारियों और इस्तीफों के बाद यह संदेश गया है कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है।
चढ़ावा चोरी मुद्दे से राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं अखिलेश?
चर्चा के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव इस मुद्दे से राजनीतिक लाभ उठा सकते हैं। इस पर अलग-अलग राय सामने आई। कुछ वक्ताओं का कहना था कि विपक्ष ने इस मुद्दे को उजागर करने का काम किया, लेकिन इसका ज्यादा राजनीतिकरण जनता को पसंद नहीं आ सकता। शो के दौरान यह भी चर्चा हुई कि अखिलेश यादव अब तक राम मंदिर नहीं गए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सरकार के लिए कैसे अवसर बन सकता है यह मुद्दा?
पैनल में मौजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि राम मंदिर और हिंदुत्व भाजपा की मजबूत राजनीतिक पिच हैं। ऐसे में यदि सरकार त्वरित कार्रवाई और पारदर्शिता दिखाने में सफल रहती है, तो यह मुद्दा उसके लिए नुकसान की बजाय अवसर भी बन सकता है।
गड़बड़ी के लिए कौन जिम्मेदार? देखें सर्वे
कार्यक्रम में चर्चा के दौरान एक सर्वे का हवाला दिया गया, जिसके मुताबिक 63% लोगों ने इस मामले को गंभीर बताया। वहीं, करीब 49% लोगों का मानना था कि यदि आरोप साबित होते हैं तो इससे सरकार की छवि प्रभावित हो सकती है। हालांकि लगभग उतने ही लोगों का यह भी कहना था कि उनकी राय पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। सर्वे में जब लोगों से पूछा गया कि इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन है, तो करीब 34% लोगों ने राम मंदिर ट्रस्ट को जिम्मेदार माना, जबकि लगभग 10% लोगों ने स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। दिलचस्प बात यह रही कि लोगों ने सीधे तौर पर योगी सरकार को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना।
चर्चा के अंत में उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी बात हुई। पैनलिस्टों का मानना था कि लोकसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी को जो बढ़त मिली थी, वह अब काफी हद तक न्यूट्रलाइज होती दिखाई दे रही है। वहीं, योगी आदित्यनाथ की छवि हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, मजबूत प्रशासन और विकास के एजेंडे पर लगातार मजबूत बनी हुई है। कुल मिलाकर, राम मंदिर चोरी कांड ने राजनीतिक बहस को जरूर तेज किया है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा जनता की राय और चुनावी राजनीति को किस हद तक प्रभावित करता है।
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(डिस्क्लेमरः यह आर्टिकल कार्यक्रम में हुई चर्चा पर आधारित है और कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए गए विचार मेहमानों के निजी विचार हैं।)
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