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श्रीनगर में दशहरा की धूम, रावण दहन के लिए मुस्लिम कारीगर बना रहे रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले

 Reported By: Manzoor Mir,  Written By: India TV News Desk
 Published : Oct 19, 2026 07:38 pm IST,  Updated : Oct 19, 2026 07:38 pm IST

श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर क्रिकेट स्टेडियम में दशहरा उत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं, जहां लोगों में भारी उत्साह और सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। आने वाले उत्सव के लिए, मुस्लिम कारीगर राक्षस राज रावण के साथ-साथ मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले बनाने में जुटे हुए हैं।

श्रीनगर दशहरा- India TV Hindi
श्रीनगर दशहरा Image Source : REPORTER INPUT

श्रीनगर में दशहरा मनाने की जोर-शोर से तैयारी चल रही है, जिसमें हजारों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। शेर-ए-कश्मीर क्रिकेट स्टेडियम में तैयारियां जोरों पर हैं, जहां का माहौल लोगों की सक्रिय भागीदारी और त्योहार को लेकर बढ़ते उत्साह को दर्शाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा 20 अक्टूबर को पूरे देश में मनाया जाएगा। इससे पहले साल 2025 में 1990 के बाद पहली बार दिल्ली, मुंबई और देश के अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित विजयादशमी मनाने के लिए कश्मीर पहुंचे।

मुस्लिम कारीगरों ने बनाए रावण के पुतले

इस साल की तैयारियों के केंद्र में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले हैं। मुस्लिम कारीगर इन पुतलों को बनाने में पूरी लगन से जुटे हैं, जो कश्मीर घाटी में इस त्योहार से जुड़ी साझा सांस्कृतिक भावना को दर्शाता है। इस साल रावण का पुतला 35 फीट ऊंचा है, जबकि मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले क्रमशः 35 फीट और 30 फीट ऊंचे हैं। इन पुतलों की कारीगरी न केवल इनके विशाल आकार की वजह से, बल्कि उस संदेश के कारण भी चर्चा में है जो ये देते हैं कि कश्मीर में त्योहार आज भी अलग-अलग समुदायों को एक साथ लाते हैं। उत्तर प्रदेश और मुजफ्फरपुर जैसी जगहों से आए कारीगर, पूरी निष्ठा और लगन के साथ इन पुतलों को तैयार करने में लगे हुए हैं।

श्रीनगर में रावण दहन

मंगलवार को एक भव्य शोभा यात्रा निकाली जाएगी, जो श्रीनगर के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए चर्च लेन क्रिकेट स्टेडियम पहुंचेगी। इस शोभा यात्रा के बाद पारंपरिक 'रावण दहन' होगा, जो शाम 5:00 बजे से 6:00 बजे के बीच आयोजित किया जाएगा। आयोजकों को पिछले साल की तरह ही बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की उम्मीद है, जिसमें कश्मीरी पंडित समुदाय और स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोग एक साथ हिस्सा लेंगे। यह आयोजन धीरे-धीरे श्रीनगर के प्रमुख सांस्कृतिक कार्यक्रमों में से एक बन गया है, जो घाटी की मिली-जुली परंपराओं को दर्शाता है।

2007 से पुनर्जीवित एक परंपरा

श्रीनगर में दशहरा उत्सव का आयोजन 2007 से 'कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति' (KPSS) द्वारा किया जा रहा है। यह संगठन उन कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधित्व करता है जो घाटी में ही रह गए थे। इस संगठन ने आस्था और सांस्कृतिक गौरव के साथ इस त्योहार की परंपराओं को जीवित रखने का काम किया है। कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजू टिक्कू ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में माहौल काफी बदल गया है। 2007 की स्थिति को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय इस त्योहार को मनाना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन जैसे-जैसे माहौल बेहतर हुआ है, लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ी है।

सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश

टीकू ने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग, सिखों, हिंदुओं और कश्मीरी पंडितों के साथ मिलकर पूरे उत्साह से इन उत्सवों में हिस्सा लेते हैं। उन्होंने कहा कि यह त्योहार कश्मीर की साझा विरासत को दर्शाता है, जहाँ लोग एक-दूसरे के उत्सवों में शामिल होते हैं और मिलकर इस मौके का आनंद लेते हैं। हाल ही में बसों से जुड़ी घटनाओं का जिक्र करते हुए, टीकू ने इन हरकतों की निंदा की और कहा कि ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के साथ-साथ असामाजिक तत्वों की विचारधारा को भी आग के हवाले कर दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि अगर ऐसी घटनाएं फिर से होती हैं तो कश्मीर के लोग—बिना किसी जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के विरोध जताने के लिए एकजुट हो जाएंगे।

देश के लिए प्यार का संदेश

संघर्ष समिति के सदस्य और पीडीपी के प्रवक्ता मोहित भान ने कहा कि दशहरा लंबे समय से जम्मू-कश्मीर की साझा सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे त्योहारों के दौरान लोग एक साथ आते हैं, एक-दूसरे से बातचीत करते हैं और घाटी के मिले-जुले अतीत को याद करते हैं। भान ने कहा कि कश्मीर में दशहरा मनाना पूरे देश को प्यार और एकता का संदेश देता है। उन्होंने बस वाली घटना की भी निंदा की और इसे बेहद निंदनीय बताया। उन्होंने कहा कि ऐसी हरकतें उस समाज के सामाजिक माहौल को बिगाड़ सकती हैं, जहाँ लोग पारंपरिक रूप से भाईचारे और आपसी सम्मान के साथ रहते आए हैं।

साझा संस्कृति का प्रतीक

जैसे-जैसे श्रीनगर रावण दहन की तैयारी कर रहा है। इस आयोजन को केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में ही नहीं, बल्कि घाटी की साझा सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। विभिन्न समुदायों के एक साथ मिलकर इन उत्सवों का आयोजन करने और उनमें भाग लेने से उम्मीद है कि इस साल का दशहरा सद्भाव, सह-अस्तित्व और सामूहिक गौरव का एक सशक्त संदेश देगा।

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