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उमर अब्दुल्ला के इस फैसले से खुश हुई BJP, महबूबा मुफ्ती का बुरी तरह चढ़ा पारा

 Published : Aug 23, 2025 07:19 pm IST,  Updated : Aug 23, 2025 07:19 pm IST

जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 215 स्कूलों का प्रबंधन अपने नियंत्रण में लेने के फैसले पर राजनीतिक घमासान मच गया है। बीजेपी ने इसे राष्ट्रहित में बताया, जबकि महबूबा मुफ्ती और सज्जाद लोन जैसे विपक्षी नेताओं ने इसे लोकतंत्र और शिक्षा व्यवस्था पर हमला करार दिया।

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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और PDP चीफ महबूबा मुफ्ती। Image Source : PTI

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार द्वारा प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी (JeI) से जुड़े 215 स्कूलों के प्रबंधन को अपने नियंत्रण में लेने के फैसले ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। कई राजनीतिक दलों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है और इसे वापस लेने की मांग की है, वहीं बीजेपी ने इसे राष्ट्रीय हित में जरूरी कदम बताया है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी कि PDP की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने इस फैसले को लेकर सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, 'यह बेहद दुखद है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस बीजेपी के एजेंडे को लागू कर रही है और एक स्थापित शिक्षा व्यवस्था को तबाही के कगार पर ले जा रही है।'

'दिल्ली के कहने पर ऐसा किया गया'

महबूबा ने सवाल उठाया कि जब उपराज्यपाल के शासन में इन स्कूलों पर कब्जा नहीं किया गया, तो अब चुनी हुई सरकार में ऐसा क्यों हो रहा है? उन्होंने शिक्षा मंत्री साकिना इट्टू से अपील की कि वे अपने लोगों के हक में खड़ी हों और इस फैसले को रद्द करें। उन्होंने कहा, 'यह JeI या फलाह-ए-आम ट्रस्ट का मसला नहीं है। आज दिल्ली के कहने पर यह किया गया, कल कुछ और करने को कहा जाएगा।' जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों द्वारा बनाए गए जस्टिस एंड डेवलपमेंट फ्रंट (JDF) ने इस कदम को 'प्रशासनिक अतिरेक' और 'नेशनल कॉन्फ्रेंस की विश्वासघात की याद' करार दिया।

'शर्म और बेशर्मी ने नए मायने हासिल किए'

JDF और कुछ अन्य संगठनों ने दावा किया कि इन स्कूलों पर 'प्रतिबंध' लगाया गया है, लेकिन शिक्षा मंत्री साकिना इट्टू ने इसे खारिज करते हुए कहा कि स्कूलों को स्थायी रूप से नियंत्रण में नहीं लिया जा रहा। उन्होंने भरोसा दिलाया, 'जब तक नई प्रबंधन समितियां नहीं बन जातीं, तब तक सरकार इन स्कूलों की देखरेख करेगी। इसके बाद इन्हें नई समितियों को सौंप दिया जाएगा।' पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख और हंदवारा से विधायक सज्जाद लोन ने भी एनसी पर निशाना साधा। उन्होंने X पर लिखा, '215 स्कूलों को जम्मू-कश्मीर सरकार ने जबरन अपने कब्जे में ले लिया। यह चुनी हुई सरकार का आदेश है। शर्म और बेशर्मी ने इस सरकार में नए मायने हासिल कर लिए हैं।'

'चुनी हुई सरकार ने ऐसा क्यों किया?'

सज्जाद लोन ने नेशनल कॉन्फ्रेंस पर तंज कसते हुए कहा कि यह सरकार बीजेपी की 'ए-टीम' है और पहले भी ऐसी हरकतों में शामिल रही है। 'अपनी पार्टी' के प्रमुख अल्ताफ बुखारी ने भी इस फैसले को 'बेहद खेदजनक' बताया। उन्होंने कहा कि 2019 में JeI पर प्रतिबंध के बावजूद उपराज्यपाल प्रशासन ने इन स्कूलों का प्रबंधन नहीं लिया, लेकिन चुनी हुई सरकार ने ऐसा क्यों किया? बुखारी ने सुझाव दिया कि सरकार को स्कूलों पर कब्जा करने की बजाय सख्त नियम बनाकर छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करना चाहिए था। उन्होंने मांग की कि सरकार इस फैसले को तुरंत रद्द करे और स्कूलों की निगरानी के लिए एक नियामक प्राधिकरण बनाए।

बीजेपी ने बताया राष्ट्रीय हित में कदम

दूसरी ओर, बीजेपी के जम्मू-कश्मीर प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया। उन्होंने इसे 'राष्ट्रीय हित में जरूरी हस्तक्षेप' करार देते हुए कहा कि इससे हजारों छात्रों को अलगाववादी विचारधाराओं से बचाकर एक सकारात्मक और सुरक्षित शैक्षिक माहौल मिलेगा। वैसे कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर सरकार के इस फैसले ने सियासी हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है, जहां विपक्षी दल इसे शिक्षा व्यवस्था और स्थानीय लोगों के हितों पर हमला बता रहे हैं, वहीं बीजेपी इसे देशहित में उठाया गया कदम करार दे रही है। यह मामला आगे क्या रुख लेता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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